बिजनेस स्टैंडर्ड - हवाईअड्डा निजीकरण की शर्तों में ढील
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हवाईअड्डा निजीकरण की शर्तों में ढील

अरिंदम मजूमदार / नई दिल्ली 12 04, 2018

बोली प्रक्रिया के लिए मानदंड में नरमी का प्रस्ताव

हवाईअड्डों के परिचालन का पूर्व अनुभव नहीं होने वाले भी लगा सकेंगे बोली
50 साल के लिए संचालन का होगा अनुबंध, भूखंड इस्तेमाल की होगी स्वतंत्रता

बिजनेस स्टैंडर्ड हवाईअड्डा निजीकरण की शर्तों में ढीलएयर इंडिया के निजीकरण की विफलता से सीख लेते हुए सरकार ने 6 हवाईअड्डों के निजीकरण के मानदंड नरम करने का निर्णय किया है। अब हवाईअड्डे के विकास का पूर्व अनुभव नहीं रखने वाले बोलीदाता को भी इसके लिए बोली लगाने की अनुमति होगी यानी बोलीदाताओं के लिए अब केवल नेटवर्थ ही अहम शर्त होगी। हालांकि बोलीदाताओं को हवाईअड्डों के कर्मचारियों को कम से कम पांच साल तक बनाए रखने को कहा जाएगा। घटनाक्रम के जानकार एक शख्स ने कहा, 'भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण की बोली प्रक्रिया एक चरण की होगी जिसमें वित्तीय क्षमता के आधार पर योग्यता शर्तों का मूल्यांकन किया जाएगा। नेटवर्थ और सालाना कारोबार ही एकमात्र शर्त होने जा रही है और निजी कंपनियों को हवाईअड्डा के संचालन का पूर्व अनुभव नहीं होने पर भी बोली का मौका मिलेगा।'

इस माह की शुरुआत में सरकार ने छह हवाईअड्डों का निजीकरण करने का फैसला किया था। चुने गए बोलीदाताओं को लखनऊ, अहमदाबाद, जयपुर, मंगलूरु, तिरुवनंतपुरम और गुवाहाटी के हवाईअड्डों का विकास, परिचालन और प्रबंधन सार्वजनिक-निजी साझेदारी (पीपीपी) में करना होगा। करीब 12 साल पहले 2006 में दिल्ली और मुंबई हवाईअड्डे का पहली बार निजीकरण किया गया था। दिल्ली और मुंबई हवाईअड्डे के निजीकरण के लिए सरकार की ओर से अनिवार्य शर्त लगाई गई थी कि बोलीदाताओं या उसके कंसोर्टियम को किसी हवाईअड्डे के परिचालन का पहले से अनुभव होना चाहिए।

बोलीदाताओं को आकर्षित करने के लिए हवाईअड्डों को 50 साल के लिए दिया जाएगा और बोलीदाता को जमीन के उपयोग के संदर्भ में स्वतंत्रता दी जाएगी। यह निर्णय नीति आयोग के मुख्य कार्याधिकारी अमिताभ कांत की अध्यक्षता में सचिवों की समिति की बैठक में लिया गया। एक शख्स ने कहा, 'पहले की प्रक्रिया में हवाईअड्डा डेवलपरों की मांग थी कि जमीन उपयोग में उन्हें उदार दिशानिर्देश मिले। ऐसे में हवाईअड्डों के निजी मालिकों को गैर-विमानन इस्तेमाल, जैसे कि शॉपिंग मॉल आदि के लिए भूखंड के उपयोग की अनुमति दी जाएगी।' दिल्ली और मुंबई हवाईअड्डे 230 और 190 एकड़ भूखंड वाणिज्यिक इस्तेमाल के लिए विकसित करने की अनुमति दी गई थी।

हालांकि सरकार ने विमानन कंपनियों को हवाईअड्डों में बहुलांश हिस्सेदारी लेने की अनुमति नहीं होगी। ऐसे में टाटा रियल्टी प्रोजेक्ट हवाईअड्डों के लिए बोली लगाने की पात्र नहीं होगी क्योंकि इसकी एयर एशिया इंडिया और विस्तारा में हिस्सेदारी है।एयर इंडिया की बोली प्रक्रिया विफल रहने के पीछे मुख्य कारण बोली की कठोर शर्तों को बताया गया था। इसके लिए एक भी बोलीदाता सामने नहीं आई थी। इसी तरह भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण द्वारा कई बार प्रयास करने के बाद भी अहमदाबाद और जयपुर हवाईअड्डों के परिचालन एवं रखरखाव के लिए बोलीदाता नहीं तलाश सकी। इन हवाईअड्डों पर आय के कम स्रोत के कारण बोलीदाता आगे नहीं आए।

विशेषज्ञों ने कहा कि अनुबंध का लुभाना ढांचा होने से इन परियोजनाओं के लिए बोलीदाता आकर्षित होंगे। क्रिसिल इन्फ्रास्ट्रक्चर एडवाइजरी के निदेशक जगनारायण पद्मनाभन के अनुसार बीते समय में महानगरों के कुछ हवाईअड्डों के निजीकरण से निजी डेपलपरों को अच्छा रिटर्न मिला है। उन्होंने कहा, 'भारतीय विमानन बाजार दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा बाजार बन गया है और पिछली कई तिमाहियों से इसका विकास हो रहा है और आगे भी वृद्घि की संभावनाएं बरकरार है। ऐसे में भारतीय डेवलपरों के साथ ही अंतरराष्ट्रीय निवेशकों की भी इसमें दिलचस्पी बनी हुई है।' आगामी आम चुनाव से संभावित बोलीदाताओं की संभावनाओं को झटका लग सकता है क्योंकि आचार संहिता लागू होने से पहले प्रक्रिया पूरी होने पर संशय है। 
Keyword: aviation, flight, airport, AAI,,
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