बिजनेस स्टैंडर्ड - आरबीआई के नीतिगत रुख में बदलाव की उम्मीद कम
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Saturday, December 15, 2018 08:36 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

आरबीआई के नीतिगत रुख में बदलाव की उम्मीद कम

तमाल बंद्योपाध्याय /  December 03, 2018

केंद्रीय बैंक अपनी नीतिगत समीक्षा में मुद्रास्फीति और आर्थिक वृद्धि संबंधी अनुमानों को कम कर सकता है। आर्थिक परिदृश्य का विश्लेषण कर रहे हैं तमाल बंद्योपाध्याय

 
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने 5 अक्टूबर को जब अपनी पिछली द्विमासिक मौद्रिक नीति समीक्षा की घोषणा की थी तो उस दिन रुपया 74.22 प्रति डॉलर तक लुढ़कने के बाद 73.77 रुपये प्रति डॉलर के भाव पर बंद हुआ था। एक हफ्ते के भीतर भारतीय मुद्रा और भी गिरावट के साथ 74.48 रुपये प्रति डॉलर पर गिर चुकी थी। हालांकि पिछले हफ्ते यह 69.60 रुपये प्रति डॉलर पर बंद हुआ। कच्चे तेल के दाम में भी 5 अक्टूबर के बाद से 30 फीसदी गिरावट आ चुकी है। इस दौरान कच्चा तेल 84.16 डॉलर से सुधरकर साल के निम्नतम स्तर 58.80 डॉलर प्रति बैरल पर आ चुका है।
 
दस साल की परिपक्वता अवधि वाले बॉन्ड पर प्रतिफल 8.04 फीसदी से घटकर पिछले हफ्ते 7.61 फीसदी पर बंद हुआ था। इस दौरान 364 दिन की अवधि वाले ट्रेजरी बिल का प्रतिफल भी  7.77 फीसदी से घटकर 7.23 फीसदी पर आ चुका है। बैंकिंग प्रणाली में सालाना आधार पर ऋण वृद्धि नवंबर की शुरुआत में 14.9 फीसदी रही जबकि पिछले साल यह 8.3 फीसदी रही थी। सबसे अहम बात यह है कि खुदरा मुद्रास्फीति दर भी सितंबर के 3.77 फीसदी से गिरकर अक्टूबर में 3.31 फीसदी पर आ गई। अधिकतर विश्लेषकों का अनुमान है कि नवंबर में यह तीन फीसदी से भी नीचे आ जाएगी। 
 
कच्चे तेल में नरमी आने से आने वाले महीनों में प्रमुख मुद्रास्फीति भी कम होगी क्योंकि तेल कीमतों में भी गिरावट आएगी। इसके अलावा वैश्विक वृद्धि में सुस्ती आने और अमेरिकी फेडरल रिजर्व के सुर बदलने के संकेत भी दिख रहे हैं। फेड रिजर्व के भले ही दिसंबर में लगातार चौथी बार ब्याज दरों में बढ़ोतरी करने के आसार हैं लेकिन वर्ष 2019 में यह दरों को लेकर नरम रुख अपना सकता है। क्रिकेट की शब्दावली में कहें तो किसी भी देश के केंद्रीय बैंक के लिए ऐसे हालात एकदम माकूल पिच जैसे हैं। निश्चित रूप से आरबीआई मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की बैठक के बाद 5 दिसंबर को होने वाली मौद्रिक समीक्षा के दौरान नीतिगत दरों में कोई बदलाव नहीं करेगा।
 
जून और अगस्त में लगातार दो बार ब्याज दर बढ़ाने के बाद आरबीआई ने अक्टूबर में यथास्थिति बनाए रखने का फैसला किया लेकिन नीतिगत रुख को 'तटस्थ' से बदलकर 'सुविचारित सख्त' कर दिया था। इससे भविष्य में दरों में बढ़ोतरी के संकेत मिलते हैं। इसके उलट कोई यह कह सकता है कि आरबीआई को अक्टूबर में अपना रुख नहीं बदलना चाहिए था। लेकिन अगर इसने ऐसा नहीं किया होता तो वह अपनी विश्वसनीयता खो चुका होता। अधिकतर विश्लेषक ब्याज दरों में वृद्धि के अनुमान लगा रहे थे। इसकी संभावना कम ही है कि आरबीआई बुधवार को अपने रुख में कोई बदलाव करेगा लेकिन केंद्रीय बैंक के कम-से-कम फरवरी तक ठहराव की स्थिति में ही रहने के आसार हैं। कहा जा रहा है कि आरबीआई फरवरी में अपने रुख को दोबारा तटस्थ कर सकता है। उसके बाद के हालात के बारे में तो कोई भी महज अनुमान ही लगा सकता है।
 
वहीं एक-वर्षीय सूचकांक विनिमय से लगता है कि अगले वित्त वर्ष में एक बार ब्याज दर बढ़ सकती है। डेरिवेटिव का पैमाना माने जाने वाले इस विनिमय का आशय निवेशकों द्वारा फ्लोटिंग भुगतान के लिए सावधि दरों में की जाने वाली अदलाबदली से है। अक्टूबर में कहा गया था कि दिसंबर तक दो बार दरें बढ़ सकती हैं जबकि अगले एक साल में ऐसा तीन-चार बार हो सकता है। कच्चे तेल के दाम बढऩे और मूल्यह्रास से गुजर रही मुद्रा के साथ ही फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में वृद्धि और सरकारी कर्मचारियों काआवासीय भत्ता बढऩे के बावजूद आरबीआई ने पिछली बार दरों में वृद्धि नहीं की थी। केंद्रीय बैंक ने अपना रुख कड़ा करते हुए इंतजार करने को तरजीह दी। इसने खुदरा महंगाई के वित्त वर्ष 2018-19 की दूसरी छमाही में 3.9-4.5 फीसदी और 2019-20 की पहली तिमाही में 4.8 फीसदी रहने का अनुमान जताया था जो अगस्त के नीतिगत अनुमानों से कम हैं। लेकिन इन अनुमानों से जुड़ा जोखिम अब नहीं दिखता है और तमाम संभावना यही है कि ये अनुमान से कम रहेंगे। मुझे अचरज नहीं होगा अगर आरबीआई दूसरी छमाही के लिए भी अपने नीतिगत अनुमान को कम कर दे। मौद्रिक समिति मध्यम-अवधि में 4 फीसदी खुदरा महंगाई का लक्ष्य लेकर चल रही है।
 
खाद्य कीमतों में बेमौसम की गिरावट से मुख्य खुदरा महंगाई अक्टूबर में एक साल के निम्न स्तर पर आ गई लेकिन गैर-खाद्य, गैर-तेल महंगाई अक्टूबर में 6.2 फीसदी पर पहुंच गई जबकि सितंबर में यह 5.8 फीसदी थी। कच्चे तेल में नरमी से प्रमुख मुद्रास्फीति भी आने वाले महीनों में कम होगी। आरबीआई अपने वृद्धि अनुमानों को संशोधित करते हुए कम कर सकता था। अक्टूबर की मौद्रिक समीक्षा के बाद जारी बयान में आरबीआई ने इस वित्त वर्ष के लिए वृद्धि दर के 7.4 फीसदी रहने का अनुमान जताया था जो अगस्त के अनुमान जितना ही है। लेकिन सितंबर तिमाही के आंकड़े आरबीआई अनुमान (7.4 फीसदी) से कम रहने पर अब पूरी संभावना है कि वह अपने आकलन में कटौती करेगा। दूसरी छमाही में जीडीपी वृद्धि आरबीआई के 7.1-7.3 फीसदी अनुमान से कम ही रहने के आसार हैं। 
 
सितंबर तिमाही में जीडीपी वृद्धि 7.1 फीसदी पर आ गई। सरकार का व्यय बढऩे के बावजूद कृषि एवं निजी क्षेत्र की अन्य गतिविधियों में संकुचन देखा गया था। यह अब भी आम-सहमति वाले अनुमान और जून तिमाही की 8.2 फीसदी वृद्धि से काफी कम है। असल में, दोपहिया और ऑटो वाहनों की बिक्री के आंकड़े सुस्ती के संकेत देते रहे हैं लेकिन किसी ने भी वृद्धि दर के इस स्तर पर आने की उम्मीद नहीं की थी। ब्याज दरों में कटौती होने पर हालात और खराब हो सकते थे लेकिन आरबीआई कदम उठाने के लिए अप्रैल समीक्षा तक इंतजार करने का फैसला कर सकता है। इसकी वजह यह है कि दिसंबर तिमाही में वृद्धि के आंकड़े फरवरी के अंतिम हफ्ते में ही जारी हो पाएंगे जबकि नीतिगत समीक्षा उस महीने के पहले हफ्ते में ही होगी।
 
अक्टूबर की समीक्षा में आर्थिक वृद्धि को लेकर एक तरह की चिंता देखी गई थी लेकिन उसके कारण कुछ और थे। आरबीआई आर्थिक प्रणाली में तरलता को बनाए रखने में सक्रिय बना रहेगा। उसने इस साल अपने मुक्त बाजार परिचालन के तहत बॉन्ड बेचकर 1.37 लाख करोड़ रुपये प्रणाली में डाले हैं। वह दिसंबर में 40,000 करोड़ रुपये और डालने वाला है। पिछले हफ्ते व्यवस्थागत तरलता घाटा करीब 84,000 करोड़ रुपये रहा।  आरबीआई तीन तरीकों से तरलता बढ़ाने के लिए कदम उठा सकता है। वह बैंकों के नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर) में कमी कर, ओएमओ के जरिये और बाजार से डॉलर की खरीद कर अर्थव्यवस्था में तरलता बढ़ा सकता है। आरबीआई ने इस साल अप्रैल से अब तक करीब 29 अरब डॉलर बेचे हैं ताकि विदेशी मुद्रा बाजार में रुपये की अस्थिरता को संभाला जा सके। हरेक डॉलर की बिक्री पर समान मूल्य का रुपया व्यवस्था से बाहर चला जाता है।
 
हालांकि सीआरआर में कटौती की संभावना नकारी जा सकती है लेकिन आरबीआई रुपये में आगे भी मजबूती जारी रहने पर फिर से डॉलर खरीद शुरू कर सकता है। वैसे ओएमओ का विकल्प आजमाने की ही संभावना अधिक नजर आती है। मौजूदा संदर्भ में यह देखना दिलचस्प होगा कि आरबीआई की नीतिगत समीक्षा में राजकोषीय चिंता को भी तवज्जो दी जाती है या नहीं। इस वित्त वर्ष के लिए रखे गए राजकोषीय घाटे का लक्ष्य सात महीनों में ही पार हो चुका है।
 
(लेखक बिज़नेस स्टैंडर्ड के सलाहकार संपादक और जन स्मॉल फाइनैंस बैंक लिमिटेड के वरिष्ठ परामर्शदाता हैं)
Keyword: INFLATION, india, RBI, bank,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या राफेल सौदे पर अब थम जाएगा विवाद?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.