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सार्थक पहल

संपादकीय /  December 03, 2018

निंदकों की दृष्टि में वैश्विक शिखर बैठकों का महत्त्व तस्वीर खिंचवाने के मौके से ज्यादा नहीं है, जहां दुनिया भर के नेता एकत्रित होते हैं। बहरहाल यह बात भी लगभग सब जानते हैं कि इन विशाल जमावड़ों में काम की बातें बड़ी बैठकों से इतर छोटी, अनौपचारिक मुलाकातों और सत्रों में होती हैं। अर्जेंटीना के ब्यूनस आयरस में जी20 समूह की 13वीं बैठक भी इससे अलग नहीं थी। निश्चित तौर पर इस बैठक से भी भारत के लिए कई उपयोगी लाभ निकल कर आए। उम्मीद के मुताबिक ही एजेंडे पर अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप का दबदबा रहा। उत्तर अटलांटिक मुक्त व्यापार समझौते के उत्तराधिकार समझौते पर हस्ताक्षर तथा चीन और अमेरिका के बीच चल रहे व्यापारिक युद्घ में अस्थायी युद्घ विराम उनका हासिल रहे। इस दौरान बड़ी-बड़ी सुर्खियां बनीं। ट्रंप द्वारा अर्जेंटीना के राष्ट्रपति को मंच पर अकेले छोड़ कर चले जाने का वाकया भी चर्चा में रहा। परंतु इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कुछ छोटी उपलब्धियां ऐसी चर्चाओं में दबी रह गईं। प्रधानमंत्री मोदी की ट्रंप और जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे के साथ मुलाकात भी इसका ही एक उदाहरण है। 

 
जापान, अमेरिका और भारत के नेताओं की बैठक और इस तिकड़ी को जय (जेएआई) का नाम देकर बहुत अधिक महत्त्व देने की आवश्यकता नहीं है। ये तीनों देश चतुर्भुजीय सुरक्षा पहल (क्वाड) के सदस्य भी हैं। इस पहल में ऑस्ट्रेलिया भी शामिल है। यह एक अनौपचारिक सुरक्षा व्यवस्था है जिसे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती आक्रामकता को साधने के लिए बनाया गया है। इस बीच कुछ संदेह भी उपजे हैं, खासतौर पर जापान के मन में। डोकलाम में सैन्य गतिरोध के पश्चात गत अप्रैल में वुहान में चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग के साथ मोदी की अनौपचारिक मुलाकात के बाद जापान के मन में यह संदेह उत्पन्न हुआ है। उस लिहाज से देखें तो यह तिकड़ी क्वाड को लेकर भारत की प्रतिबद्घता दोहराने का अच्छा अवसर था। मोदी वुहान शिखर वार्ता से हासिल हुए लाभ तथा जून और जुलाई में चीन के राष्ट्रपति के साथ वार्तालाप से हुए लाभ को आगे बढ़ाने में भी कामयाब रहे हैं। परंतु इन कूटनीतिक संतुलनकारी कदमों से इतर कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण बात थी मोदी द्वारा प्रस्तुत वह नौ बिंदुओं वाला एजेंडा जिसके तहत उन्होंने आर्थिक अपराध करके भागने वालों के खिलाफ संयुक्त कार्रवाई की मांग की। निश्चित तौर पर यह एजेंडा घरेलू कारकों से प्रेरित था। देश भर में भगोड़े आभूषण कारोबारी नीरव मोदी, उनके रिश्तेदार मेहुल चोकसी और यूबी समूह के कारोबारी विजय माल्या को लेकर बना आलोचना का माहौल इसकी वजह है। 
 
निश्चित तौर पर मोदी ने फाइनैंशियल ऐक्शन टास्क फोर्स के लिए जो एजेंडा तय किया है वह काफी चुनौतीपूर्ण है। यह वैश्वीकृत मानकों वाले द्विपक्षीय रुख की मांग करता है। इसके अधीन विभिन्न देश एक दूसरे के साथ विशिष्ट प्रत्यर्पण संधियों को लेकर बातचीत करते हैं। इसके लिए भगोड़े आर्थिक अपराधियों की एक सुसंगत परिभाषा की जरूरत है। साथ ही विधिक स्तर पर भी सहयोग आवश्यक होगा। उदाहरण के लिए अपराधियों की परिसंपत्ति जब्त करना, अपराधियों को जल्दी लौटाने और तीव्र प्रत्यावर्तन आदि शामिल हैं। इसमें वैश्विक स्तर पर सूचनाएं साझा करने की बात भी शामिल है। मोदी ने इस योजना को संयुक्त राष्ट्र के भ्रष्टाचार निरोधक समझौते और संयुक्त राष्ट्र के संगठित अपराध निरोधक समझौते के तहत अंजाम देने का प्रस्ताव रखा है। निश्चित तौर पर जी20 देश अवैध वित्तीय आवक से निपटने के मूल एजेंडे पर बहुत अधिक प्रगति नहीं कर सके हैं। यह बात मोदी की पहल को थोड़ा मुश्किल बनाती है। परंतु यह भी सच है कि उस कवायद के चलते कर वंचना वाले देशों को लेकर पत्रकारों ने एक से एक विस्फोटक खुलासे किए हैं। ऐसे में भगोड़े आर्थिक अपराधियों के एजेंडे पर प्रगति स्वाभाविक है। 
Keyword: g20, india, america, china narendra modi,,
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