बिजनेस स्टैंडर्ड - भारत-चीन ने सुलझाए प्रमुख कर विवाद
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भारत-चीन ने सुलझाए प्रमुख कर विवाद

शुभमय भट्टाचार्य / नई दिल्ली 12 02, 2018

चीन की कंपनियों ने भारत के साथ 12 मामलों को निपटाया है

बिजनेस स्टैंडर्ड भारत-चीन ने सुलझाए प्रमुख कर विवादबगैर किसी तामझाम के भारत व चीन ने पिछले दो महीने के दौरान तेजी से कुछ आपसी कारोबारी मसलों को सुलझाने की कवायद शुरू की और अक्टूबर व नवंबर में चीन की कंपनियों ने भारत के साथ आपसी समझौता प्रक्रिया (एमएपी) के तहत कर संबंधी 12 मामलों को निपटाया है। अमेरिका को छोड़कर इतने कम समय मेंं किसी अन्य देश ने भारत के सामने कर संबंधी इतने मामले नहीं उठाए हैं।

वहीं चीन ने उल्लेखनीय पेशकश करते हुए गैर शुल्क बाधाएं कम कर भारत के दो प्रमुख भारतीय उत्पादोंं, मछली और चावल के कारोबार के लिए बाजार खोल दिए हैं। जीडीपी के हिसाब से विश्व की दूसरी और छठी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच आपसी कारोबार के लिए नियामकीय वातावरण में सुधार आश्चर्यचकित करने वाला है क्योंकि दोनोंं देशों में तमाम क्षेत्रों में भारी मतभेद है, जिसमें सैन्य व ऊर्जा संबंधी जुड़े मसले शामिल हैं।  

इसके अलावा चीन की कंपनियों के लिए भारत के राजस्व विभाग में काम आासान कर दिया गया है। इस महीने दोनों देशों के बीच दोहरे कराधान से बचाव समझौते के कुछ प्रोटोकॉल संशोधित किए गए हैं। भारत और चीन ने 1995 में समझौता किया था, जिसमेंं 20 साल तक कोई बदलाव नहीं हुआ था, जैसा कि भारत के अन्य सक्रिय कारोबारी साझेदारों के साथ हुआ है।

बड़े पैमाने पर बदलाव की जगह देशों ने तात्कालिक विकल्प के रूप में देशों ने कर प्रोटोकॉल में बदलाव कर दिया है, जिससे कि उन्हें अंतरराष्ट्रीय बदलावों के अनुरूप किया जा सके, जिसके चलते निष्क्रियता बनी हुई थी। भारत सरकार ने एक विज्ञप्ति मेंं कहा, 'प्रोटोकॉल (भारत-चीन के) अद्यतन किए जाने से सूचनाओं के आदान प्रदान के मौजूदा प्रावधान नए अंतरराष्ट्रीय मानकों की तरह हो गए हैं।'

यह जरूरी हो गया था क्योंकि कई चीनी कंपनियां राजस्व विभाग से संपर्क कर रही थीं, जिससे कि कर को लेकर स्पष्टता हो सके। निश्चित रूप से यह बदलाव दोनों पक्षों के अनुरोध के आधार पर किए गए हैं। भारत के साझेदार देशोंं के साथ एमएपी के माध्यम से मामले निपटाने वाले देशों की सूची में चीन तीसरे स्थान पर है। ओईसीडी के आंकड़ों के मुताबिक सिर्फ अमेरिका व अमेरिका को चीन के ऊपर जगह मिल सकी है।  

डेलॉयट इंडिया में वरिष्ठ निदेशक संजय कुमार ने कहा, 'यह आंकड़े अहम हैं और इसमें ज्यादातर इंजीनियरिंग, खरीद और निर्माण परियोजनाएं हैं।' विदेश में कारोबार कर रही कंपनियां न्यायाल की प्रक्रिया से बचने के लिए एमएपी का सहारा लेती हैं, जिसे यह सुनिश्चित हो सके कि उन्हें कारोबार पर दोहरे कर का भुगतान न करना पड़े। यह किसी भी घरेलू कानून से मिलने वाले उपचार से अलग है, जो उन्हें विदेश में उपलब्ध होता है। सूचना तकनीक, निर्माण या विनिर्माण में कंपनियों को एमएपी समर्थन मिलता है, जहां कच्चे माल के आयात और अर्थनिर्मित सामान के मामले में प्राय: कर कानून की व्याख्या को लेकर मतभिन्नता होती है।

अमेरिका और ब्रिटेन के बाद भारत का बड़ा एमएपी साझेदार जापान और स्वीडन हैं। यहां तक कि पिछले साल तक डेनमार्क के मामले भी चीन से ज्यादा थे। यह धारणा भारत में विदेशी निवेश के अनुरूप है। अब इस तस्वीर से बदलाव के संकेत मिलते हैं। कुमार ने कहा कि इससे संकेत मिलता है कि चीन की कंपनियां भारत में बड़े निवेशक के  रूप में उभर रही हैं।  

भारत से चीन को मछली व मछली के तेल के निर्यात की सुविधा देने के लिए दोनों देशों के बीच एक अन्य प्रोटोकॉल पर नवंबर में हस्ताक्षर के बाद कर सरलीकरण हुआ है। चीन सालाना 263.43 डॉलर के  मछली के तेल का आयात करता है और भारत इसमें अपनी जगह बनाना चाहता है। पिछले 6 महीने में यह दूसरा उत्पाद है, जिसे चीन से मंजूरी मिली है। 

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