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अधिक कामकाजी घंटे ही बनाते कारोबार में अगुआ!

इंसानी पहलू
श्यामल मजूमदार /  December 02, 2018

एलन मस्क को पिछले हफ्ते किए गए अपने ट्वीट्स के लिए आलोचनाओं के घेरे में आना पड़ा है। उन्होंने ट्वीट में कहा है कि लोगों को हर हफ्ते 80 घंटे से लेकर 100 घंटे तक काम करने की जरूरत है। उन्होंने खुद हफ्ते भर में करीब 120 घंटे काम करने का हवाला देते हुए कहा कि टेस्ला कंपनी के बाकी लोग भी इस साल हफ्ते भर में अमूमन 100 घंटे काम करते रहे हैं। टेस्ला की मॉडल 3 सिडैन के उत्पादन में तेजी आने से कामकाजी घंटे बढ़ गए थे। टेस्ला के अलावा स्पेसएक्स के भी प्रमुख मस्क ने कहा कि काम करने की  आसान जगहें भी हैं लेकिन हफ्ते में 40 घंटे काम करते हुए कोई भी दुनिया को बदल नहीं पाया है।

 
मस्क को मिले जवाबों में सबसे उदार सलाह कुछ घंटे की नींद लेने की मिली है। लेकिन अधिकतर लोगों ने उन्हें हद से ज्यादा मेहनत को रोमांटिसाइज करने का आरोप लगाते हुए कहा है कि वह खुद के अलावा अपने कर्मचारियों पर भी भारी दबाव डालने की विषाक्त संस्कृति का नेतृत्व कर रहे हैं। मस्क के आलोचकों की बात में दम है: यह सच है कि दुनिया भर में कंपनियां यह संदेश फैलाने की कोशिश कर रही हैं कि अगर आप देर रात तक ऑफिस में रुकने को तैयार नहीं हैं तो आप उतने अच्छे कर्मचारी नहीं हैं।
 
इस संदेश को गलत साबित करने के लिए पर्याप्त वैज्ञानिक साक्ष्य हैं। किसी उन्मादी की तरह काम करने के नतीजे उल्टे भी हो सकते हैं और उससे कर्मचारी कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं, नींद न आने की समस्या और तनाव का भी शिकार हो सकता है। शोध बताते हैं कि एक सीमा से अधिक काम करने से असल में उत्पादकता घट जाती है। अत्यधिक तनाव से गुजर रहे लोगों का स्वास्थ्य खर्च आम लोगों की तुलना में करीब 50 फीसदी अधिक होता है। यह शोध मस्क जैसे उन लोगों के लिए बुरी खबर है जो अपने काम को इतना पसंद करते हैं कि बस काम, काम और काम ही करते हैं। उन्हें वह काफी आकर्षित करता है लेकिन उनके मातहत कर्मचारियों के लिए वह अक्सर डरावना होता है। मनोविज्ञानियों की नजर में ऐसे लोग ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर के शिकार हैं और लगातार काम के ही बारे में सोचते रहने से इसका करीबी नाता है। भारत में भी अब ऐसे अति-व्यस्त सीईओ का रुझान तेजी से बढ़ रहा है जो अपना मोबाइल फोन बंद ही नहीं करते हैं। लेकिन मस्क और उनकी जमात को मायूस होने की जरूरत नहीं है। उनकी नजर में तो ये तमाम बातें मानव संसाधन के शब्दजाल मात्र हैं। सुपरस्टार उद्यमी और अगुआ अपनी धुन में मगन रहते हैं और कड़ी मेहनत से अपना मुकाम हासिल करते हैं। उन्हें अपनी उपलब्धि पर गर्व होता है और उनकी नजर में कार्य-जीवन संतुलन की धारणा केवल महत्त्वाकांक्षा-रहित लोगों के लिए है। बेहद कामयाब लोग जानते हैं कि असाधारण प्रतिभा या किस्मत का साथ उन्हें एक सीमा तक ही ले जा सकता है लिहाजा सीमा से आगे बढऩे की चाहत ही उन्हें सामान्य प्रतिभावान लोगों से अलग करती है। इसलिए वे कार्यस्थल पर जल्दी जाते हैं, देर तक रुकते हैं और अन्य सभी लोगों से अधिक काम करते हैं। जीई के पूर्व सीईओ जेफ इमेल्ट ने कहा था कि वह 25 वर्षों से हफ्ते में 100-100 घंटे काम करते आए हैं। 
 
ऐसा करने वाले वह अकेले शख्स नहीं हैं। एपल में स्टीव जॉब्स की जगह लेने वाले टिम कुक ने काफी कड़ी मेहनत से यह पद हासिल किया है। वह ऑफिस में सबसे पहले पहुंचते थे और सबसे अंत में निकलते थे। ड्रॉपआउटडूड्स डॉट कॉम के इस लेख को पढ़ें: हाल ही में पेप्सी की सीईओ पद से मुक्त हुईं इंद्रा नूयी येल यूनिवर्सिटी में अपना मास्टर्स कोर्स करते समय कुछ पैसे कमाने के लिए आधी रात से तड़के पांच बजे तक रिसेप्शनिस्ट की नौकरी करती थीं। उन्होंने एक साक्षात्कार में अपने कामकाजी तरीके के बारे में बताया था। उसके मुताबिक, 'इंद्रा रोजाना सुबह सात बजे ऑफिस पहुंचती हैं और रात आठ बजे के पहले शायद ही कभी घर के लिए निकलती हैं। घर पर भी वह देर रात तक मेल पढ़ती रहती हैं और उन्हें लगता है कि दिन में 35 घंटे होते तो बेहतर होता।' खास बात यह है कि इंद्रा ने यह सारा कुछ अपनी दो बेटियों की परवरिश करते हुए किया। 
 
एमेजॉन के जेफ बेजॉस की तरह कुछ सीईओ अपने सहकर्मियों को 'कड़ी मेहनत करने, मौजमस्ती करने और इतिहास बनाने' की सलाह देते हैं। लेकिन खुद बेजॉस का जीवन यही बताता है कि उन्होंने मस्ती करने के बजाय अतिशय कड़ी मेहनत की है। एमेजॉन के शुरुआती दिनों में वह हफ्ते के सातों दिन 12-12 घंटे काम करते थे और कभी-कभी किताबों को समय पर भेजने के लिए तड़के तीन बजे तक रुकते थे। एमेजॉन का अगुआ बनने के बाद भी इस आदत में बदलाव आने के कोई सबूत नहीं हैं। साफ है कि उनके लिए काम ही मस्ती है। यह भी देखें कि मस्क ने अपनी कड़ी मेहनत से क्या कुछ हासिल किया है? उनके विरोधी भी यह मानेंगे कि मस्क एक नवोन्मेषक, विध्वंसक और गेम-चेंजर हैं। इस कहानी का निहितार्थ सीधा-सादा है। अगर आप अपने कार्यस्थल के कोने में बने ऑफिस तक सीढिय़ां चढ़ते हुए जाना चाहते हैं तो अपने काम से अधिक जीवन को अहमियत दें लेकिन अगर आप उसी ऑफिस में जाने के लिए एलीवेटर लेना चाहते हैं तो आपको जीवन से अधिक महत्त्व काम को देना होगा। अगर आप अपने हिस्से में आए केक को खा सकने वाले भाग्यशाली लोगों में से नहीं हैं तो फिर आपको अपनी प्राथमिकता तय करनी होगी।
Keyword: company, CEO, directors, employee,,
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