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मध्यस्थता के लिए अधिनिर्णयन का होना अनिवार्य

अदालत से
एम जे एंटनी /  December 02, 2018

मध्यस्थता संबंधी मामले में जांच, पक्षों की सुनवाई, साक्ष्यों का परीक्षण और विवाद का अधिनिर्णयन इसके मुख्य अवयव हैं। एक प्राधिकार के निर्णय के खिलाफ अपील का प्रावधान होने भर से कोई समझौता मध्यस्थता के योग्य नहीं हो जाता है। उच्चतम न्यायालय ने दक्षिण दिल्ली नगर निगम बनाम एसएमएस टॉलवेज लिमिटेड मामले में यह टिप्पणी की है। उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को पलट दिया है। इस मामले में टॉल फर्म एसएमएस और नगर निगम के बीच एक राष्ट्रीय राजमार्ग के निर्माण को लेकर विवाद हो गया। समझौते की शर्तों में जिक्र था कि किसी भी विवाद का निपटारा पहले निगम के सक्षम अधिकारी करेंगे और फिर निगम आयुक्त के समक्ष अपील की जा सकेगी। टॉल कंपनी पहले चरण में हार गई जिसके बाद उसने मध्यस्थता का उल्लेख किया। उच्च न्यायालय ने समझौते में मध्यस्थता प्रावधान को निहित बताते हुए इसकी इजाजत दे दी। लेकिन निगम की अपील पर उच्चतम न्यायालय ने इस फैसले को निरस्त कर दिया है। उसने कहा है कि निगम आयुक्त के निर्णय में मध्यस्थता की कोई गुंजाइश ही नहीं रह गई। आयुक्त विवादित मुद्दों के समाधान की शक्ति से लैस थे और टॉल कंपनी एवं आयुक्त के बीच अधिनिर्णय की कोई गुंजाइश ही नहीं थी।

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