बिजनेस स्टैंडर्ड - निजी बैंक: निवेशकों को घटानी पड़ सकती हैं उम्मीदें
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निजी बैंक: निवेशकों को घटानी पड़ सकती हैं उम्मीदें

हंसिनी कार्तिक /  12 02, 2018

बढ़ता गतिरोध

बिजनेस स्टैंडर्ड निजी बैंक: निवेशकों को घटानी पड़ सकती हैं उम्मीदेंचालू वर्ष की ज्यादातर सुर्खियां निजी क्षेत्र के बैंकों से जुड़ी रहीं। चाहे यह नियामक का बार-बार हस्तक्षेप हो या वरिष्ठ स्तर के अधिकारियों के इस्तीफे, इस क्षेत्र को एक के बाद एक कई बड़े बदलावों से जूझना पड़ा है। पिछले तीन वर्षों में प्रमुख सूचकांक को भारी अंतर से मात देने के बाद एनएसई प्राइवेट बैंक्स सूचकांक का प्रदर्शन इस साल अपेक्षाकृत नरम रहा है। इस साल अब तक 9 प्रतिशत की तेजी के साथ यह सूचकांक एनएसई आईटी और एनएसई एफएमसीजी की तुलना में पीछे बना हुआ है। एनएसई आईटी और एनएसई एफएमसीजी सूचकांकों में अब तक 14 प्रतिशत और 28 प्रतिशत तक की तेजी आई है। इंडसइंड बैंक और येस बैंक जैसे शेयरों से दबाव में आने के बाद यह सूचकांक तीन साल में पहली बार शीर्ष विजेता की अपनी हैसियत गंवा चुका है। विदेशी ब्रोकरेज फर्म से जुड़े एक बैंकिंग विश्लेषक ने कहा, 'ऊंचा आधार प्रभाव कई शेयरों को लोकप्रिय बना रहा है और बैंकिंग उद्योग भविष्य में 15-20 प्रतिशत की वृद्धि की ओर बढ़ रहा है। हालांकि पहले 25 फीसदी की वृद्धि का अनुमान जताया गया था।

कई अन्य कारकों का प्रभाव 2018 में दिखना शुरू हो गया है जिससे इस क्षेत्र पर दबाव पड़ सकता है। इनमें से एक यह है कि रिजर्व बैंक शीर्ष प्रबंधन नियुक्तियों के संदर्भ में बैंकों पर सख्त बना हुआ है। इसका पहला उदाहरण ऐक्सिस बैंक का है। ऐक्सिस बैंक की निवर्तमान मुख्य कार्याधिकारी शिखा शर्मा का कार्यकाल घटाया गया है। जहां बैंक अब ने अब प्रबंधन स्तर पर बदलाव किया है, वहीं येस बैंक को भी आरबीआई की सख्ती का सामना करना पड़ रहा है। बैंक का नेतृत्व संकट गहरा गया है। इसके निदेशक मंडल से कई अधिकारी जा चुके हैं और वित्त कुप्रबंधन की खबरों से भी बैंक के शेयर में भारी गिरावट देखने को मिली है।

आईसीआईसीआई बैंक को भी अपनी छवि साफ-सुथरी बनाने की जरूरत है क्योंकि वीडियोकॉन से संबंधित ऋणों की मौजूदा जांच का परिणाम इस शेयर के लिए सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है।  2018 का वर्ष कई वरिष्ठï प्रबंधकों के इस्तीफे के लिए भी जाना जा रहा है। एचडीएफसी बैंक के उप प्रबंध निदेशक (डीएमडी) परेश सुकथनकर और ऐक्सिस बैंक के डीएमडी वी श्रीनिवासन जैसे प्रमुख बैंकर छोड़कर जा चुके हैं। इसके अलावा इस साल जनवरी से दोनों बैंकों में वरिष्ठï स्तर के कुछ अन्य अधिकारी भी जा चुके हैं। इनमें से कई पद खाली पड़े हुए हैं और इनकी नियुक्ति कब और कैसे होगी, इस पर निवेशकों की नजर लगी रहेगी।

निजी बैंकों में नेतृत्व शून्य का प्रभाव भविष्य में भी बना रहेगा। अब यह देखना जरूरी होगा कि 2020 में एचडीएफसी बैंक और इंडसइंड बैंक से आदित्य पुरी और रमेश सोबती के जाने के बाद कौन जिम्मेदारी संभालेगा। मौजूदा वर्ष कई अन्य मोर्चों पर भी असंतोषजनक रहा है। इन बदलते घटनाक्रम में एचडीएफसी बैंक के विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (एफपीआई) सुविधा को इस साल जून में पर्याप्त स्वीकार्यता नहीं मिली। बैंक का पात्र संस्थागत नियोजन (क्यूआईपी) उसके तत्कालाीन 2,179 रुपये के बाजार भाव के आसपास जारी किया गया। अमेरिकन डिपोजिटरी रिसीट (एडीआर) सफल रहे थे। इंडसइंड बैंक संकटग्रस्त इन्फ्रास्ट्रक्चर ऋणदाता आईएलऐंडएफएस के लिए अपने निवेश के लिए कीमत चुका रहा है। 

छोटे बैंकों को भी नियामक के गुस्से का शिकार होना पड़ा है। आरबीआई ने आईडीएफसी, आरबीएल बैंक, साउथ इंडियन बैंक और फेडरल बैंक पर इनकम रीकॉग्निशन ऐंड ऐसेट क्लासीफिकेशन (आईआरएसी) और नो यॉर कस्टमर (केवाईसी) मानकों के गैर अनुपालन से जुड़े कारणों की वजह से जुर्माना लगाया।  बंधन बैंक भी समस्याओं से अलग नहीं रहा है। बंधन बैंक के प्रवर्तकों को बैंक में अपनी हिस्सेदारी घटाकर 40 प्रतिशत लाने के लिए कई चुनौतियों से जूझना पड़ा। विश्लेषकों का कहना है कि 2018 के गतिरोध का प्रभाव 2019 में भी बैंकों पर बना रह सकता है।

प्रभुदास लीलाधर के शोध प्रमुख आर श्रीशंकर कहते हैं, 'जिन कंपनियों में अंडरराइटिंग क्षमताएं चुनौतीपूर्ण रहीं, उनके शेयर दबाव में बने रह सकते हैं। इसी तरह नेतृत्व से जुड़ी समस्याओं से भी निवेशकों को जूझना पड़ सकता है।' इसके अलावा मॉर्गन स्टैनली, सिटी और नोमुरा जैसे बड़े ब्रोकर कॉरपोरेट बैंकों पर सकारात्मक हैं। पिछले एक साल में अच्छा प्रदर्शन करने वाले रिटेल-केंद्रित निजी बैंकों के लिए भी भविष्य में राह चुनौतीपूर्ण रहने की आशंका है।

Keyword: share, market, sensex, बीएसई, कंपनी, शेयर,,
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