बिजनेस स्टैंडर्ड - वैज्ञानिक से स्वामी, फिर आमरण अनशनकारी
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वैज्ञानिक से स्वामी, फिर आमरण अनशनकारी

कुमार संभव श्रीवास्तव /  12 02, 2018

मातृ सदन का गंगा संरक्षण अभियान

 गंगा बचाने की पहल से जुड़े रहे जी डी अग्रवाल की मौत के बाद अब हरिद्वार के एक आश्रम के संत इसी मकसद से बारी-बारी आमरण अनशन पर बैठते हैं

बिजनेस स्टैंडर्ड वैज्ञानिक से स्वामी, फिर आमरण अनशनकारीहरिद्वार में गंगा नदी के तट पर स्थित आश्रम 'मातृ सदन' में ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद आमरण अनशन पर बैठे  हैं। कंप्यूटर साइंस छात्र से संत बने 26 वर्षीय आत्मबोधानंद ने गंगा को बचाने के लिए आंदोलन चलाने का भार अब अपने कंधे पर ले लिया है। केंद्र सरकार की बेरुखी से नाराज होकर आमरण अनशन के दौरान 86 वर्षीय जी डी अग्रवाल की मृत्यु हो जाने के बाद उन्होंने यह 'जिम्मेदारी' उठाई है। इस अभियान में वह अकेले नहीं हैं। 39 साल के महंत गोपालदास भी पिछले पांच महीनों से आमरण अनशन पर हैं। उन्हें ऋषिकेश के आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में भर्ती कराया गया है। 61 साल के स्वामी पुण्यानंद भी इन दोनों की राह पर चलने की तैयारी कर रहे हैं। आत्मबोधानंद धीमी लेकिन संयत आवाज में कहते हैं, 'जब मेरी मृत्यु हो जाएगी तो स्वामी पुण्यानंद सिलसिला जारी रखेंगे।'

मातृ सदन आश्रम के 71 वर्षीय प्रमुख स्वामी शिवानंद गंगा के मुद्दे को नजरअंदाज करने के सरकारी रवैये से काफी खफा हैं। वह कहते हैं, 'यह सरकार खून चाहती है। हम उसे खून मुहैया कराएंगे।' वह और उनके तमाम शिष्य यही चाहते हैं कि गंगा नदी का हिमालय से निकलने के बाद अविरल प्रवाह हो। वहीं सरकार इस नदी पर कई बांध बनाना चाहती है। ऐसे में ये सभी अनशनकारी लंबे संघर्ष के लिए तैयार हैं। वे एक-एक कर अपनी जान निकलने तक अनशन करने की तैयारी में हैं।  यह मातृ सदन और उसके संतों का अपना तरीका है। वे उपवास करते हैं और कई बार यह मौत तक जारी रहता है।

वर्ष 1997 में इस  आश्रम की शुरुआत के बाद से अब तक यहां के संत अब तक कुल मिलाकर 1940 दिन यानी करीब पांच वर्षों का उपवास कर चुके हैं। वे अदालती लड़ाई के अलावा सूचना का अधिकार (आरटीआई) के तहत व्यापक जनहित से जुड़े मुद्दों पर जानकारी भी जुटाते हैं। गंगा को अक्षुण्ण बनाए रखना और इस नदी क्षेत्र को नष्ट कर रहे भ्रष्टाचार को खत्म करना उनके लक्ष्यों में शामिल है। अपनी इस कोशिश के चलते कई बार उन्हें मारपीट, धमकी और गिरफ्तारी का भी शिकार होना पड़ा है। कुछ आंदोलनकारियों की तो हत्या ही कर दी गई। लेकिन प्रो अग्रवाल उर्फ स्वामी सानंद की मौत ने उनके जज्बे को और मजबूत करने का काम किया है। 

आश्रम

बिजनेस स्टैंडर्ड वैज्ञानिक से स्वामी, फिर आमरण अनशनकारीसीमेंट की बनी असमतल सड़क झुग्गियों के बीच से होते हुए गंगा किनारे बने आश्रम तक पहुंचती है। आश्रम में जगह-जगह बैनर लगे हुए हैं जिन पर गंगा पर बने बांधों और बालू खनन की वजह से हो रहे नुकसान के बारे में बताया गया है। ऐसे ही एक कमरे में आत्मबोधानंद कमजोर अवस्था में नजर आते हैं। उनके पीछे स्वर्गीय अग्रवाल और दो अन्य संतों की तस्वीर लगी हुई है। ये तीनों संत गंगा के लिए अनशन करते हुए अपनी जान दे चुके हैं। आत्मबोधानंद कहते हैं, 'गंगाजी और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में मरने से बेहतर भला क्या हो सकता है? मुझे इस समाज से कुछ भी नहीं लेना है।' आत्मबोधानंद कहते हैं, 'यह सरकार केवल पूंजीपतियों की मांग पूरा कर रही है। सरकार में बैठे लोग हमेशा धर्म की रट लगाए रहते हैं लेकिन गंगा के प्रति कोई फिक्र नहीं है। मोदी जी गंगा के ही नाम पर सत्ता में आए। उन्होंने खुद को गंगा का पुत्र कहा था लेकिन अब वह इस मां को ही बेचकर मुनाफा कमाने में लगे हुए हैं।'

प्रमुख मांगें
अनशन पर बैठे संतों की चार प्रमुख मांगें हैं। उनका कहना है कि इन मांगों को पूरा करने से गंगा की धारा को अविरल रखा जा सकेगा। वे ऊपरी हिमालय क्षेत्र में गंगा और उसकी सहायक नदियों पर बन रहे एवं प्रस्तावित सभी बांधों को निरस्त किए जाने के पक्ष में हैं। गोमुख से लेकर हरिद्वार तक गंगा के प्रवाह मार्ग में कोई भी नया बांध न बने। दूसरी मांग, गंगा से बालू एवं बजरी का खनन प्रतिबंधित किया जाए। तीसरी, संसद में गंगा सुरक्षा अधिनियम को पारित किया जाए। चौथी मांग, सरकार गंगा भक्त परिषद का गठन करे जो इस नदी से संबंधित नियामकीय मसलों पर नजर रखे।

प्रो अग्रवाल ने इन्हीं मांगों को लेकर अपनी जान दे दी थी। स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद का नाम धारण करने के पहले प्रोफेसर अग्रवाल भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) कानपुर के सिविल एवं पर्यावरणीय इंजीनियरिंग विभाग के प्रमुख हुआ करते थे। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) का पहला सदस्य सचिव होने के अलावा वह गंगा संरक्षण पर गठित विभिन्न सरकारी पैनलों में भी शामिल रहे थे। फिर उन्होंने खुद को गंगा के संरक्षण अभियान के लिए समर्पित कर दिया था।

प्रो अग्रवाल ने 2009 से लेकर 2013 के दौरान भी कई बार अनशन किया था। उस समय केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने उनकी कई मांगों को स्वीकार किया था। उत्तराखंड में गंगा की सहायक नदियों पर प्रस्तावित तीन बांधों के निर्माण को भी रोक दिया गया था। उनके जीवन का आखिरी अनशन साबित हुआ उपवास 22 जून को मातृ सदन में ही शुरू हुआ था। अनशन शुरू करने के बाद उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्री नितिन गडकरी को कई चिट्ठियां लिखी थीं लेकिन सरकार ने तब तक ध्यान नहीं दिया जब तक देर नहीं हो गई।

उन्हें अनशन पर बैठे हुए 100 दिन से अधिक हो चुके थे और उनके स्वास्थ्य में तेजी से गिरावट आ रही थी। हालात बिगड़ता देख 10 अक्टूबर को मंत्रालय ने अपना रुख नरम करते हुए एक अधिसूचना जारी की थी। इसमें कहा गया था कि सरकार तीन वर्षों के भीतर यह सुनिश्चित करेगी कि सभी मौसम में गंगा के औसत मासिक प्रवाह का कम-से-कम 20 फीसदी स्तर बना रहे। गडकरी ने कहा था कि सरकार ने प्रो अग्रवाल की अधिकांश मांगें मान ली हैं। लेकिन उसके अगले ही दिन अग्रवाल ने अस्पताल के अपने बिस्तर से जारी एक वीडियो में इस अधिसूचना को 'बेवकूफी से भरा' और 'किसी वैज्ञानिक आधार के बगैर' बताते हुए खारिज कर दिया था। उन्होंने कहा था कि आईआईटी के एक दल ने औसत मासिक प्रवाह का 50 फीसदी सुनिश्चित करने की सिफारिश की थी। ऐसे में इसे घटाकर 20 फीसदी करने का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। यह बयान सामने आने के कुछ घंटे बाद ही उनकी मौत हो गई थी। 

बिज़नेस स्टैंडर्ड ने 1 नवंबर को गंगा संरक्षण मंत्री गडकरी को भेजे गए सवालों में यह पूछा था कि अग्रवाल की जगह आमरण अनशन पर बैठे दूसरे संत सरकार पर अग्रवाल की मांगों को अनसुना करने का आरोप लगा रहे हैं। इस पर मंत्रालय ने यह जवाब दिया था कि राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा अभियान गंगा नदी की अविरलता एवं निर्मलता को बनाए रखने के लिए युद्धस्तर पर काम कर रहा है। मंत्रालय ने गंगा विधेयक के मसौदे पर चर्चा जारी होने और नदी क्षेत्र में खनन को राष्ट्रीय हरित अधिकरण के निर्देशों के मुताबिक संचालित करने की भी बात कही थी। हालांकि पनबिजली परियोजनाओं के मसले पर मंत्रालय ने व्यापक परिप्रेक्ष्य को जरूरी बताते हुए कहा था, 'किसी भी निर्णय पर पहुंचने के पहले सभी हितधारकों के बीच समग्र विश्लेषण की जरूरत है।'

एक धोखा

मातृ सदन के संस्थापक स्वामी शिवानंद का मानना है कि सरकार ने प्रो अग्रवाल के साथ धोखा किया। वह कहते हैं, 'जल संसाधन मंत्रालय के कई अधिकारी उनसे मिलने के लिए आते थे लेकिन उन्हें कभी भी लिखित में अपने सवाल के जवाब नहीं मिले। '  खुद प्रो अग्रवाल ने भी प्रधानमंत्री मोदी को कई चिट्ठियां लिखी थीं। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का जिक्र करते हुए कहा था कि एक बांध का 90 फीसदी निर्माण होने के बाद भी उनके कहने पर उस परियोजना को रोक दिया गया था।

प्रोफेसर अग्रवाल की मौत के पहले भाजपा की पितृ संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तरफ से भी बीच-बचाव की पहल की गई थी। स्वामी शिवानंद के मुताबिक 'आरएसएस के सह-कार्यवाह कृष्णगोपाल सितंबर में मिलने आए थे। उस मुलाकात में कृष्णगोपाल ने सरकार के समक्ष यह मसला उठाने का आश्वासन देते हुए कहा था कि सानंद जी के कहने पर केंद्र सरकार चार परियोजनाएं स्थगित कर देगी। लेकिन अधिसूचना जारी होने के बाद उनके सुर बदल गए और उन्होंने हमें ही हालात से समझौता करने को कहा।' इन दावों पर आरएसएस की राय जानने के लिए जब बिज़नेस स्टैंडर्ड ने संघ के प्रचार प्रमुख अरुण कुमार से संपर्क साधा। उन्होंने इस सिलसिले में राजीव तुली से बात करने को कह दिया लेकिन तुली को भेजे गए ईमेल का कोई जवाब नहीं मिला।

विज्ञान से बलिदान तक

साउथ एशियन नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स ऐंड पीपुल के हिमांशु ठक्कर कहते हैं, 'आमरण अनशन पर बैठने वाले ये लोग वामपंथी या सरकार की नजर में विरोधी तेवर वाले एनजीओ से नहीं जुड़े हैं। अग्रवाल जी की तो तीन पीढिय़ां आरएसएस से जुड़ी रही हैं।' मातृ सदन की स्थापना करने वाले स्वामी शिवानंद अविवाहित रहे हैं। जादवपुर विश्वविद्यालय से एमएससी करने के बाद उन्होंने कोलकाता के एक स्कूल में रसायनशास्त्र पढ़ाया। लेकिन 1994 में उन्होंने मातृ सदन की स्थापना के इरादे से अपनी नौकरी छोड़ दी। वह बताते हैं कि बदरीनाथ में ध्यान लगाते समय उन्हें इसकी प्रेरणा मिली थी। दान में मिले पैसों से उन्होंने हरिद्वार में गंगा के किनारे 10 लाख रुपये में चार एकड़ जमीन खरीदी थी।

बिजनेस स्टैंडर्ड वैज्ञानिक से स्वामी, फिर आमरण अनशनकारीआश्रम की स्थापना के कुछ समय बाद ही शिवानंद ने अपने शिष्यों के साथ मिलकर गंगा नदी में चलने वाली नौकाओं से होने वाले तेल रिसाव का मसला उठाया था। उनके शिष्य स्वामी दयानंद कहते हैं, 'दूसरे धर्मगुरुओं ने गंगा को प्रदूषित कहने के लिए उनकी आलोचना की थी। मीडिया में भी उन्हें नास्तिक संत कहा गया था।' लेकिन शिवानंद इन सबसे बेअसर रहे।

आने वाले वर्षों में मातृ सदन कहीं अधिक बड़े मसलों की लड़ाई का केंद्र बना। उनके शिष्यों को यह अहसास हुआ कि गंगा और उसके आसपास तेजी से बालू खनन, पत्थर तुड़ाई और जंगली इलाके की जमीन हड़पने का काम चल रहा है। अपने उपवासों के जरिये शिवानंद ने अपने शिष्यों के साथ मिलकर उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश और एक मुख्यमंत्री जैसे लोगों को भ्रष्टाचार के आरोप में हटाने की मांगें रखीं। वहीं ईमानदारी से काम करने वाले अधिकारियों को समर्थन और आरटीआई अधिनियम का इस्तेमाल कर उन्होंने कई घोटालों का पर्दाफाश भी किया। कई मौकों पर तो उन्होंने अदालतों में किसी वकील की मदद लिए बगैर खुद ही अपना केस भी लड़ा।

इस लड़ाई में इन संतों पर कई बार हमले भी हुए। उन्हें फर्जी मुकदमों में फंसाने की भी कोशिशें की गईं। यहां तक कि कुछ संतों को जहर देकर मारने की भी साजिश रचने के मामले सामने आए। वर्ष 2011 में इस आश्रम के ही एक संत स्वामी निगमानंद बालू खनन माफिया की गिरफ्तारी की मांग को लेकर अनशन पर बैठे हुए थे। आश्रम का आरोप है कि माफिया ने उन्हें जहर देकर मार दिया। आज भी उस मामले की सीबीआई जांच जारी है। इसी तरह स्वामी गोकुलानंद को भी वर्ष 2002 में नैनीताल के पास एक मंदिर में जहर देकर मारा गया था। वह भी उपवास और मुकदमों के जरिये खनन माफिया का मुकाबला करने में लगे हुए थे। खुद शिवानंद पर भी 1999 में आश्रम के बाहर कुछ गुंडों ने हमला किया था। उसके एक साल बाद ही उन्हें जेल के भीतर जहर देकर मारने की कोशिश का भी केस दर्ज हुआ।

स्थानीय प्रशासन आमरण अनशन पर बैठने वाले संतों को भारतीय दंड संहिता की धारा 309 के तहत आत्महत्या की कोशिश का मामला दर्ज कर गिरफ्तार करता रहा है। लेकिन मार्च 2017 में आत्महत्या की कोशिश को अपराध न मानने वाला मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम लागू होने के बाद अब उन पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है। स्वामी शिवानंद ने अपने आश्रम में कोई मंदिर नहीं बनवाया। वह कहते हैं, 'मंदिरों को काफी धन मिलता है लेकिन अगर साधू धर्म को धन कमाने का साधन बनाते हैं तो वे सच्चे साधू ही नहीं हैं।' मातृ सदन का पंजीकरण एक धर्मार्थ ट्रस्ट के तौर पर हुआ है और इसका खर्च मिलने वाले चंदे से चलता है। फंड की देखरेख करने वाले स्वामी दयानंद कहते हैं, 'हमें साल भर में उतना ही फंड मिल पाता है जिससे अपने खर्चे पूरे कर सकें। हरेक साल अपनी संस्था का हम ऑडिट कराते हैं और रिटर्न भी जमा करते हैं।' 

दरअसल प्रोफेसर अग्रवाल की मौत के बाद मातृ सदन के गंगा संरक्षण अभियान के केंद्र में आने के बाद प्रशासन ने भी इस पर कड़ी नजर रखनी शुरू कर दी है। प्रो अग्रवाल के निधन के बाद आमरण अनशन पर बैठे महंत गोपालदास ने यह आरोप लगाया था कि स्थानीय प्रशासन उन पर मातृ सदन का नाम लेने का दबाव डाल रहा है। वह मातृ सदन से सीधे तौर पर नहीं जुड़े हैं लेकिन अग्रवाल से प्रेरित होकर उन्होंने आश्रम में ही अपना अनशन शुरू कर दिया था। मातृ सदन के प्रशासन और पुलिस की निगरानी में आने का अहसास बिज़नेस स्टैंडर्ड की टीम को भी हुआ। जिस दिन हम आश्रम पहुंच थे उस दिन वहां दो महिलाएं भी मौजूद थीं जो अपने फोन पर वीडियो रिकॉर्ड कर रही थीं। उन महिलाओं ने खुद को स्थानीय खुफिया इकाई से संबद्ध बताया। 

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