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बड़े चूककर्ताओं के खुलासे में सावधानी की जरूरत

तमाल बंद्योपाध्याय /  November 30, 2018

कर्ज भुगतान में चूक करने वाले कुटिल कारोबारियों को गोपनीयता की ढाल से बचने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। इस पहलू पर रोशनी डाल रहे हैं तमाल बंद्योपाध्याय

 
दुनिया की छठी बड़ी अर्थव्यवस्था भारत में बैंकों के कर्ज नहीं चुकाने वाले कर्जदारों के खिलाफ जंग सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के मुख्य कार्याधिकारियों (सीईओ) को आरोपियों के खिलाफ लुकआउट सर्कुलर जारी करने का अनुरोध करने की शक्ति देने के साथ तेज हो गई है। बैंकों के सीईओ को यह शक्ति दी गई है कि वे देश छोड़कर भागने की आशंका वाले देनदारों के खिलाफ नोटिस के लिए गृह मंत्रालय से अनुरोध कर सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डों के आव्रजन काउंटर यह देखते हैं कि अमुक यात्री के खिलाफ लुकआउट सर्कुलर (एलओसी) तो नहीं जारी हुआ  है। मार्च 2016 के बाद चार बड़े बैंक चूककर्ताओं के भारत छोड़कर चले जाने से यह मामला और अहम हो चुका है। 
 
पंजाब नैशनल बैंक (पीएनबी) में सहमति पत्र (एलओयू) के जरिये करीब 2 अरब डॉलर की धोखाधड़ी का मामला मार्च 2018 में सामने आने के बाद 50 करोड़ रुपये से अधिक कर्ज लेने वालों के लिए पासपोर्ट का ब्योरा देना जरूरी हो चुका है। इनके देश छोड़कर भागने की आशंका खत्म करने के लिए ऐसा किया गया है। मंत्रिमंडल ने भगोड़े आर्थिक अपराधी विधेयक को भी मंजूरी दी है जिसमें बैंकों को भगोड़े चूककर्ताओं और धोखेबाजों की संपत्ति कुर्क करने और बेचने की शक्ति दी गई है। यह कानून उन सभी भगोड़े कर्जदारों पर लागू होता है जिन पर एक अरब रुपये से अधिक कर्ज बकाया है।
 
यह देखना होगा कि कोई कर्जदार एलओसी के नए नियम को अदालत में चुनौती देता है या नहीं। लेकिन 10 लाख करोड़ रुपये से अधिक कर्ज फंसने से बेहाल बैंकिंग प्रणाली को स्वच्छ करने की सरकार की प्रतिबद्धता इससे नजर आती है। यह कर्जदाता एवं कर्जदार के रिश्तों में बुनियादी बदलाव लाने की मंशा भी जताता है। दिवालिया कानून ने इस रिश्ते को पहले ही नए सिरे से परिभाषित किया है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने वर्ष 2010 में कहा था कि 'जब आरोपी जानबूझकर गिरफ्तारी से बच रहा है या गैर-जमानती वारंट जारी होने के बावजूद अदालत में मौजूद न हो रहा हो तो लुकआउट का रास्ता अपनाया जा सकता है। साथ ही आरोपी के गिरफ्तारी या सुनवाई से बचने के लिए देश छोड़कर भागने की आशंका भी हो।' हालांकि आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता के तहत कोई संज्ञेय अपराध दर्ज नहीं होने की स्थिति में लुकआउट सर्कुलर जारी होने पर भी उसे न तो हिरासत या गिरफ्त में लिया जा सकता है और न ही उसे विदेश जाने से रोका जा सकता है। इसका मतलब है कि बैंक के सीईओ को एलओसी की मांग के साथ यह भी स्थापित करना होगा कि बैंक डिफॉल्ट एक आपराधिक कृत्य है।
 
परंपरागत तौर पर भारत में बैंक बकाया कर्ज के भुगतान के लिए कर्जदारों को बाध्य करने के लिए उनका नाम सार्वजनिक कर उन्हें शर्मसार करने की नीति अपनाते रहे हैं। वर्ष 1990 के दशक में सिटीबैंक कर्ज नहीं चुकाने वाले लोगों के घर पर किन्नरों को भेजा करता था। इसी तरह कर्जदारों की तस्वीर वाले पोस्टर लगाने, दीवाली के दिन महिला कर्मचारियों को कर्जदारों के घर भेजने और कर्ज न चुकाने वाले ग्राहकों को पोस्टकार्ड भेजने के मामले भी देखे गए हैं। देश के सबसे बड़े कर्जदाता भारतीय स्टेट बैंक ने वर्ष 2013 में इरादतन चूककर्ताओं और उनके गारंटरों के भी नाम-पते एवं तस्वीरें अखबारों में प्रकाशित करनी शुरू की थी। अधिकांश बैंकों ने चूककर्ताओं के निवास की नजदीकी शाखाओं में उनकी तस्वीरें लगानी शुरू की। पीएनबी का वह रेडियो विज्ञापन काफी लोकप्रिय हुआ था जिसमें बैंक चूककर्ताओं को फूल देने और जल्द स्वस्थ होने का संदेश दिया गया था।
 
लेकिन ये तरकीबें व्यक्तिगत कर्ज और छोटी एवं मझोली इकाइयों के मामलों में ही कारगर होती हैं। बड़े कर्जदारों में शामिल कंपनियों पर नाम जाहिर कर बदनाम करने की तरकीबों का कोई खास असर नहीं पड़ता है। केंद्रीय सूचना आयोग ने हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर को नोटिस जारी कर यह पूछा है कि इरादतन चूककर्ताओं की सूची जारी अब तक क्यों नहीं जारी हुई है?  आयोग ने फंसे कर्ज के बारे में प्रधानमंत्री कार्यालय को लिखी पूर्व गवर्नर रघुराम राजन की चिट्ठी जारी करने को भी कहा है। 
 
राजन के गवर्नर रहते समय मार्च 2016 में आरबीआई ने बड़े देनदारों की सूची एक सीलबंद लिफाफे में उच्चतम न्यायालय को सौंपी थी। रिजर्व बैंक ने कहा था कि इन कर्जदारों के नाम सार्वजनिक करने से कंपनियों की सेहत प्रभावित हो सकती है। आरबीआई का कहना था कि नाम जाहिर होने से कंपनियों के कारोबार की नाकामी बढ़ सकती है। सरकारी स्वामित्व वाले हुडको की तरफ से दिए गए कर्ज का मामला उठाने वाली एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान यह सूची सौंपी गई थी। भारत के बैंक 1990 के दशक में तकनीकी रूप से उतने उन्नत नहीं हो पाए थे। इसका फायदा उठाते हुए एक बैंक का कर्ज न चुकाने वाले लोग दूसरे बैंक से भी कर्ज ले लेते थे। फिर आरबीआई बैंकों के बीच चूककर्ताओं की सूची जारी करने लगा था। अब वित्तीय प्रणाली में सभी कर्जदारों का आंकड़ा दर्ज करने वाले क्रेडिट ब्यूरो हैं और यह सभी बैंकों की पहुंच में है। ऐसा होने से एक बार चूक करने के बाद दूसरे बैंक से कर्ज नहीं लिया जा सकता है। 
 
जब लेनदार अपने कर्जदारों के ठिकाने से परिचित हैं तो फिर उनके बारे में लोगों को जानने की जरूरत क्यों है? इससे कौन सा उद्देश्य पूरा होगा? इसका जवाब यह है कि बैंकिंग परिसंपत्ति में 70 फीसदी हिस्सेदारी रखने वाले सार्वजनिक बैंकों में लगातार करदाताओं के धन को उड़ेला जा रहा है लिहाजा उन्हें इसके बारे में जानने का हक है। लेकिन आरबीआई का मत है कि इससे कर्जदाता एवं कर्जदार के बीच के करार का उल्लंघन होता है।  बैंकिंग नियमन अधिनियम इस बारे में चुप है लेकिन परंपरा यही रही है कि बैंकर ऋण अनुबंध का सम्मान करते हुए अपने कर्जदारों के नाम सार्वजनिक नहीं करते हैं। यह एक वैश्विक परिपाटी है और किसी कर्जदार के खिलाफ कदम उठाने के बाद ही बैंक उसका नाम सार्वजनिक करता है। 
 
हालांकि इरादतन चूककर्ताओं की अवधारणा भारत के लिए अनूठी है। इसका मतलब है: कर्ज चुकाने की क्षमता रखते हुए भी न चुकाने वाला कर्जदार। इसका फैसला तो केवल फॉरेंसिक ऑडिट से ही हो सकता है। एक बार यह तय हो जाने के बाद भी क्या बैंक को अनुबंध की पवित्रता का सम्मान करने की जरूरत है? ऐसे भी मामले हो सकते हैं कि बाहरी वजहों से कारोबार पर असर पडऩे के कारण कंपनी कर्ज न चुका पा रही हो।  ऐसे में चूककर्ताओं के नाम सार्वजनिक करने से संबंधित आशंकाओं को सतर्कता बरतते हुए और विवेकपूर्ण तरीके से तिलांजलि देने का वक्त आ गया है। गंभीर उद्यमियों को इससे बाहर रखना होगा लेकिन चालबाजों को गोपनीयता की ढाल के इस्तेमाल की इजाजत न दी जाए।
 
(लेखक बिज़नेस स्टैंडर्ड के सलाहकार संपादक और जन स्मॉल फाइनैंस बैंक के वरिष्ठ सलाहकार हैं)
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