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राजनीतिक जीडीपी

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  November 30, 2018

वर्ष 2007 में पेइचिंग में पदस्थ अमेरिकी राजदूत ने ल्याओनिंग के लिए चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के सचिव (मौजूदा प्रधानमंत्री) ली कछ्यांग से मुलाकात की। ली ने राजदूत से कहा कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के आंकड़े विश्वसनीय नहीं हैं। उन्होंने अचल संपत्ति के तीन संकेतकों रेलवे कार्गो वॉल्यूम, बिजली की खपत और बैंकों के ऋण वितरण पर भरोसा करने की बात कही। इकनॉमिस्ट पत्रिका ने इसी आधार पर ली कछ्यांग सूचकांक बनाया। बाद के विश्लेषण ने दिखाया कि लगभग हर जिंस और मुद्रा के लिए यह सूचकांक जीडीपी की तुलना में कहीं अधिक प्रासंगिक है। 

 
क्या वक्त आ गया है कि ली कछ्यांग सूचकांक का कोई भारतीय संस्करण तैयार किया जाए? यह सवाल इसलिए उत्पन्न हुआ क्योंकि इस सप्ताह आए जीडीपी के संशोधित आंकड़ों को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया है। इन आंकड़ों में पिछले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल के दौरान देश की आर्थिक वृद्घि के आंकड़ों में भारी कमी की गई है। उनके कार्यकाल के 10 वर्षों के दौरान देश की औसत वृद्घि दर घटकर नरेंद्र मोदी के कार्यकाल की औसत दर से कम हो गई है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि इसके साथ ही सिंह सरकार का प्रदर्शन मोदी सरकार से बेहतर होने का आखिरी दावा भी अब हाथ से निकल गया है।
 
दिक्कत यह है कि बीते चार वर्षों के दौरान अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन उससे पहले के 10 वर्षों के प्रदर्शन से बेहतर रहने के दावे को अगर ली कछ्यांग की शैली के आंकड़ों के आधार पर वास्तविक अर्थव्यवस्था के मानकों पर कसा जाए तो सारे दावे हवा में उड़ जाते हैं। कॉर्पोरेट बिक्री, मुनाफे और निवेश के आंकड़े, कर राजस्व, ऋण वृद्घि, निर्यात एवं आयात आदि सभी के आंकड़े इसकी गवाही देते हैं। ऐसे संकेतकों पर भी निगाह डाली जा सकती है जिनका जिक्र ली ने किया था। उदाहरण के लिए रेलवे वैगन लोडिंग और बिजली की खपत। परंतु भारत में समस्या यह है कि कुल माल ढुलाई में रेलवे की हिस्सेदारी बहुत सीमित है। बिजली उत्पादन क्षमता का बड़ा हिस्सा भी ग्रिड से बाहर है इसलिए खपत वृद्घि का अंदाजा लगाना आसान नहीं है। 
 
जीडीपी के नए आंकड़ों के तकनीकी तौर पर पुराने अनुमानों से बेहतर होने के चाहे जितने भी दावे किए जा रहे हों लेकिन उनकी सार्वजनिक विश्वसनीयता के लिए जरूरी है कि उन्हें हकीकत की कसौटी पर कसा जाए। इस मोर्चे पर नए आंकड़े नाकाम साबित होते हैं। वर्ष 2007-08 के तेज वृद्घि वाले दौर की वृद्घि को 9.8 फीसदी से घटाकर अब 7.7 फीसदी कर दिया गया है। यह वृद्घि अत्यंत संकटग्रस्त वर्ष 2013-14 की 6.4 फीसदी की दर से थोड़ी ही अधिक है। निश्चित तौर पर तेजी और संकट के वर्षों के बीच तेजी का अंतर महज 1.3 फीसदी तो नहीं हो सकता। नए आंकड़ों के बचाव में दावा किया गया कि कॉर्पोरेट मुनाफा विश्वसनीय संकेतक नहीं माना जा सकता है क्योंकि हालिया दौर में अधिकांश राशि वेतन भत्तों में खर्च हो गई। इस बात पर यकीन करना मुश्किल है क्योंकि आम अनुभव यही है कि मनमोहन सिंह सरकार के पहले कार्यकाल में तेजी के वर्षों में वेतन में वृद्घि अधिक हुई। यह मानना भी तार्किक होगा कि जब कंपनियों का प्रदर्शन अच्छा रहता है तो वे बेहतर भुगतान करती हैं। पहले नोटबंदी और उसके बाद वस्तु एवं सेवा कर व्यवस्था लागू होने से बाजार में जो विसंगतियां उत्पन्न हुईं उनके आधार पर कहा जा सकता है कि असंगठित अर्थव्यवस्था ने संगठित क्षेत्र की शिथिलता की भरपाई नहीं की है।
 
एक असहज करने वाला तथ्य यह है कि वर्ष 2015 में भी मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल के अंतिम दो वर्षों को लेकर ऐसी ही कवायद की गई थी। उस वक्त भी वृद्घि दर में इजाफा देखने को मिला था। अब उससे पहले के वर्षों को लेकर वही कवायद की गई है। इस बीच पेशेवर अर्थशास्त्रियों ने अनिरंतरताओं की ओर इशारा किया है। उदाहरण के लिए असमायोजित और वास्तविक आंकड़ों में अंतर। असमायोजित आंकड़ों से पता चलता है कि पहले और बाद में बहुत अधिक अंतर नहीं आया जबकि वास्तविक आंकड़ों में तेज गिरावट देखने को मिली। आमतौर पर विशेषज्ञों की राय है कि इन हालात में वास्तविक आंकड़ों में इजाफा होना चाहिए। तो क्या पूरी चतुराई मुद्रास्फीति समायोजन करने के तरीके में छिपी हुई है?
 
इसके नतीजों से बचा नहीं जा सकता है: रोजगार निर्माण के कपटपूर्ण दावों (इसमें नीति आयोग की अहम भूमिका रही) के तर्ज पर ही अगर सरकारी सांख्यिकीय आंकड़ों को राजनैतिक रंग देने से बचाना है तो सरकारी थिंकटैंक को कुछ चीजों पर सफाई देनी होगी। 
Keyword: GDP, fiscal deficit, dollar, bond, राजकोषीय घाटा जीडीपी,
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