बिजनेस स्टैंडर्ड - अधिक प्रभावी होजी 20 समूह
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अधिक प्रभावी होजी 20 समूह

सुमन बेरी /  November 29, 2018

इस सप्ताह जब जी 20 देशों के नेता ब्यूनस आयरस में मिलेंगे, तो वॉशिंगटन में उनकी पहली मुलाकात के बाद एक दशक का सफर पूरा हो जाएगा। ब्यूनस आयरस में समूह की अध्यक्षता अर्जेंटीना से जापान के हवाले हो जाएगी। जापान के बाद सऊदी अरब की बारी है। ऐसे में यह सवाल पूछना उचित है कि इस अवधि में जी 20 ने किस प्रकार अपना अस्तित्व सफलतापूर्वक बचाए रखा।

साथ ही यह भी कि नाटकीय रूप से बदलती दुनिया में यह प्रासंगिक कैसे बना रहा। मैंने हाल ही में ब्रसेल्स के एक थिंकटैंक के लिए इसकी समीक्षा की है। मैंने दलील दी है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में बढ़ते कद और अपने आर्थिक हितों की बेहतर पूर्ति के लिए जी 20 के उभरते बाजार वाले सदस्यों को समूह के एजेंडे में और सक्रिय भूमिका निभानी होगी। 

जी 20 समूह में जी 7 देशों की तुलना में कहीं अधिक आर्थिक विविधता है। जी 20 के लक्ष्यों में भी काफी व्यापकता है लेकिन अपने मूल में जी 20 वैश्विक अर्थव्यवस्था को संचालित करता है। इस व्यापक विविधता के चलते वैश्विक आर्थिक प्रबंधन में भी काफी सुधार हुआ है। जी 20 के सदस्य देशों ने 2008 के संकट के समय जो सामूहिक प्रतिक्रिया दी थी वह काफी प्रभावशाली तालमेल दर्शा रही थी।

उसने दुनिया को दूसरी महामंदी से बचाया। चीन का भारी-भरकम प्रोत्साहन पैकेज दुनिया के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण साबित हुआ। यह एक दशक पहले की उसकी आर्थिक शक्ति का उदाहरण है। संकट के कम होने की शुरुआत के बाद जी 20 की विकसित अर्थव्यवस्थाओं के बीच विभाजन नजर आने लगा। खासतौर पर राजस्व नीति को लेकर जो सुधार को लेकर अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो गई थी।

उभरती अर्थव्यवस्थाओं वाले देश वैश्विक वृद्घि के वाहक होने के बावजूद  इनमें कम मुखरता से हिस्सेदारी कर रहे थे। आज पहली शिखर बैठक के एक दशक बाद चीन और भारत दुनिया की दूसरी और तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हैं। जी 20 के उभरते देश भी वैश्विक उत्पादन में उतना ही योगदान कर रहे हैं जितना कि विकसित देश। 

अतीत में इसमें अंतर क्यों रहा इसके बारे में भी मैंने कई बातें सुझाई। उदाहरण के लिए अगर जी 7 से तुलना की जाए तो भारत और चीन अभी भी बहुत गरीब मुल्क हैं। यही वजह है कि अपनी आबादी को ध्यान में रखते हुए वे व्यवस्थागत रूप से अहम दायित्वों से बचते रहे हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो उभरते देशों के बीच सहयोग की भावना अभी उतनी प्रबल और घनी नहीं है जितनी कि जी 7 देशों के बीच है। कहा जा सकता है कि यह काफी हद तक अनुभवहीनता का मामला भी है जो समय के साथ दूर हो जाएगा।

वैश्वीकरण के कारण जी 20 के देशों में आई गहरी आंतरिक अंतनिर्भरता ने सतत, स्थायी और संतुलित वैश्विक वृद्धि में साझा रुचि पैदा की है। वर्ष 2005 में अमेरिकी फेडरल रिजर्व के तत्कालीन प्रमुख बेन बर्नांके ने कहा था कि अमेरिका में चालू खाते के बढ़ते घाटे के लिए एशिया में बचत की प्रवृत्ति काफी हद तक उत्तरदायी है।

हालांकि व्यवहार में देखा जाए तो संकट के अतिरिक्त तमाम संप्रभु सरकारों के बीच समन्वित आर्थिक नीति कायम कर पाना हमेशा मुश्किल होता है। अतीत की तमाम निराशाओं के बावजूद जी 20 देशों के नेताओं ने बार-बार अपने अधिकारियों को इस दिशा में आगे बढऩे को कहा है। जी 20 देशों द्वारा अंतरराष्ट्रीय संस्थानों की सहायता से की गई प्रतिबद्घताओं की समीक्षा के लिए एक प्रभावशाली विश्लेषण तंत्र विकसित किया गया। परंतु देश के नीतिगत चयन पर 

इसके प्रभाव का आकलन किया जाना अभी बाकी है। 

वित्तीय संकट के बाद उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों के मध्यम अवधि के विकास संबंधी अनुमानों पर बहुत नकारात्मक असर हुआ है। यह विकसित देशों की तुलना में काफी अधिक है। उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों के लिए उत्पादकता में वृद्घि सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है। विकसित देशों में वैश्वीकरण को लेकर समर्थन में ढांचागत कमी के बीच यह और अधिक महत्त्वपूर्ण हो गया है।

विकसित बाजारों और उभरते बाजारों के बीच वित्तीय खुलेपन का अंतर आने वाले वर्षों में वित्तीय सुधार के एजेंडे को तय करेगा। उदाहरण के रूप में लें तो अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक सुधार की बात करें तो विकसित देशों की तुलना में उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों का काफी कुछ दांव पर लगा हुआ है। व्यापार संचालन एक और ऐसा क्षेत्र है जहां उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों के हित विकसित देशों के हितों से अलग रह सकते हैं। जी 7 के भीतर का बंटवारा और ब्रिक्स देशों के आर्थिक प्रदर्शन में अंतर, जी 20 के लिए आने वाले वर्षों में और अधिक कठिनाइयां उत्पन्न करेगा। उनके लिए प्राथमिकता चयन मुश्किल होता जाएगा।

इस बीच जी 20 देशों के संगठनात्मक और नौकरशाही संसाधन तथा उससे जुड़ी गतिविधियों में इजाफा होता रहेगा। इसके बावजूद ऐसे समय में जबकि बहुपक्षीय संस्थान दबाव में हैं, अधिक केंद्रित और किफायती जी 20 समूह की भूमिका भी कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण होगी। 

उपरोक्त तमाम बातों के बाद मैं दो नतीजों पर पहुंचा। पहला, अब उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों के पास एक अवसर हो सकता है कि वे अपनी प्राथमिकताओं पर ध्यान केंद्रित करें और उन्हें लेकर अधिक आक्रामक अंदाज में काम करें। इस दौरान जी 20 की परंपरा के साथ-साथ उनको संतुलित वैश्विक वृद्घि के लक्ष्य को भी ध्यान में रखकर काम करना होगा। इसके लिए तमाम अन्य चीजों के साथ चीन और भारत के बीच बढ़े हुए सहयोग और संवाद की आवश्यकता होगी ताकि वैश्विक चुनौतियों से निपटा जा सके। दूसरी बात, जी 20 देशों की अपनी प्रक्रिया में भी सुधार की आवश्यकता है ताकि संसाधनों की खपत और आर्थिक प्रभाव के बीच बेहतर तालमेल कायम किया जा सके। 

गत अक्टूबर में बाली में जी 20 समूह के वित्त मंत्रियों के समूह को भेजी गई एमिनेंट पर्संस ग्रुप ऑन ग्लोबल फाइनैंशियल गवर्नेंस रिपोर्ट में वैश्विक वित्त में सुधार के कुछ प्रस्ताव रखे गए हैं। इनकी मदद से जी 20 समूह के प्रभाव को बढ़ाया जा सकता है। अगर जी 20 समूह को अगले एक दशक में फलना-फूलना है तो विकसित देशों को इस रिपोर्ट के प्रस्ताव को एक अवसर के रूप में इस्तेमाल करना चाहिए। उन्हें इसके जरिये अपना सामंजस्य, संबद्घता और नेतृत्व क्षमता सामने लानी चाहिए। 

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