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बाजार करे फैसला

संपादकीय /  November 29, 2018

देश का हर नीति निर्माता बार-बार इस बात को रेखांकित करता है कि अर्थव्यवस्था को और अधिक उदार बनाने तथा बाजार की भूमिका बढ़ाने की जरूरत है। परंतु हकीकत यह है कि रोजमर्रा के वाणिज्यिक निर्णय भी अति नियमन के शिकार हैं। बीते कुछ दिनों में ही इसके दो उदाहरण सामने आए हैं। पहला दो विमानन कंपनियों से संबंधित है जिनका नाम है इंडिगो और स्पाइसजेट। इन कंपनियों ने अपनी ऑनलाइन चेक-इन सेवा पर शुल्क लगाने का निर्णय लिया। इसकी संभावित वजह कंपनियों की बढ़ती लागत से कुछ हद तक निजात पाना है।

यह खबर सामने आते ही यात्रियों ने विरोध करना शुरू कर दिया और नागरिक विमानन मंत्रालय ने कहा कि वह इस निर्णय की समीक्षा कर रहा है और देख रहा है कि यह अनबंडल्ड प्राइसिंग ढांचे के अधीन आता है या नहीं। इस ढांचे में हर सेवा का अलग शुल्क वसूल किया जाता है। बहरहाल, मंत्रालय के इतना कहते ही इंडिगो ने अपना निर्णय बदल दिया और कहा कि सभी सीटों के लिए वेब चेक इन करने वाले ग्राहकों को शुल्क नहीं देना होगा।

खेद की बात यह है कि विमानन कंपनी कोई असामान्य शुल्क नहीं ले रही थी। वेब चेक इन के समय मनोवांछित सीट के लिए शुल्क वसूल करना दुनिया भर की विमानन कंपनियों में मान्य व्यवहार है। इससे भी अहम बात यह है कि विशेष सेवाओं के लिए शुल्क वसूलने से रोकने के लिए कोई कानून भी नहीं है। इसके बावजूद मंत्रालय ने इस निर्णय पर समीक्षा का नोटिस जारी कर दिया। 

एक अन्य घटनाक्रम कन्फेडरेशन ऑफ एटीएम इंडस्ट्री (सीएटीएमआई) से जुड़ा हुआ है। सीएटीएमआई ने कहा कि चालू वित्त वर्ष के अंत तक मौजूदा में से आधे एटीएम बंद हो सकते हैं क्योंकि नियामकीय जरूरतें कड़ी कर दी गई हैं। अप्रैल में रिजर्व बैंक ने कहा था कि बैंकों की ओर से नकदी ढुलाई और प्रबंधन संभालने वाले सेवा प्रदाताओं और उनके अनुषंगियों की विशुद्ध पूंजी कम से कम 100 करोड़ रुपये होनी चाहिए।

उसने यह भी कहा था कि नकदी की ढुलाई करने वाले वाहनों में सीसीटीवी कैमरा, जीपीएस, ट्यूबलेस टायर, हूटर और वायरलेस संचार सुविधा उपलब्ध कराई जाए। नए दिशानिर्देश से लागत बढऩी तय है। दिक्कत यह है कि न तो एटीएम उद्योग और न ही बैंक इस बढ़ी हुई लागत को वहन करना चाहते हैं क्योंकि उनके लिए इस राशि को ग्राहकों से वसूलना बहुत मुश्किल है। एक बात जो यहां भुला दी जा रही है, वह यह कि अगर कोई सेवा दी जा रही है तो उपभोक्ता को उसकी लागत का बोझ उठाना चाहिए। संबंधित पक्ष इस अनुरोध के साथ आरबीआई के पास गए कि या तो अनुपालन मानक शिथिल किए जाएं या फिर समय सीमा को बढ़ाया जाए। यह कोशिश नाकाफी साबित हुई।

इससे दो सबक निकलते हैं। पहला सबक नीति निर्माताओं के लिए है। उन्हें रोजमर्रा के बाजार में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। उदाहरण के लिए अतीत में नागर विमानन नियामक ने विमानन कंपनियों द्वारा वसूले जाने वाले माल भाड़े को तय करने का प्रयास किया था। वेब चेक-इन या माल भाड़े के रूप में विमानन कंपनी क्या शुल्क वसूल करना चाहती है, यह निर्णय बाजार पर छोड़ दिया जाना चाहिए।

प्रतिस्पर्धी विमानन कंपनियों को यह तय करने देना चाहिए कि उनके लिए क्या बेहतर है। अगर कोई विमानन कंपनी बहुत अधिक शुल्क लेती है तो ग्राहक दूसरी कंपनी के पास जाने के लिए स्वतंत्र है। इसी प्रकार एटीएम एक सेवा प्रदान करता है और बैंकों को उसके लिए शुल्क वसूलने देना चाहिए। दूसरा सबक उपभोक्ताओं के लिए है। एटीएम उन्हें वह सुविधा उपलब्ध कराता है जिसके लिए शुल्क चुकाने को उन्हें तैयार रहना चाहिए। ठीक यही बात वेब चेक-इन पर भी लागू होती है।

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