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आरबीआई, वित्त मंत्रालय और नागरिकों की मुसीबत

देवाशिष बसु /  November 28, 2018

अक्टूबर के अंत और नवंबर के आरंभिक दिनों में वित्त मंत्रालय और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के बीच विवाद सार्वजनिक हुआ। ज्यादातर लोग आरबीआई अधिनियम की धारा 7 के इस्तेमाल के बारे में बात कर रहे थे और यह भी कि फंसे हुए कर्ज और नए डिफॉल्टरों के लिए प्रॉम्प्ट करेक्टिव एक्शन (पीसीए) यानी त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई कहीं बहुत अधिक कड़े तो नहीं हैं।

यह भी बहस का मुद्दा था कि क्या आरबीआई को छोटी कंपनियों को और अधिक नकदी उपलब्ध करानी चाहिए? इस पूरी बहस में आप खुद को कहां देखते हैं? अगर आप सामान्य नागरिक या उपभोक्ता हैं तो समूची बहस मुद्दाविहीन है। न तो आरबीआई और न ही वित्त मंत्रालय हमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करने वाले मुद्दों पर जरा भी ध्यान देते हैं। वित्तीय उपभोक्ता और निवेशकों को रोजाना ही छल कपट से दो चार होना पड़ता है। इसे लेकर न तो आरबीआई को कोई चिंता है और न ही वित्त मंत्रालय को।

पहला उदाहरण: तकरीबन 70 वर्ष का एक व्यक्ति बैंक में जाता है। वह अपने सावधि जमा का नवीनीकरण कराना चाहता है क्योंकि उसे नियमित आय की आवश्यकता है। वह जिस बैंकर पर भरोसा करता है, वह उससे कहता है कि वह जीवन बीमा की योजना खरीद ले जिसे बीमा नियामक ने मंजूरी दी है और जिसकी निगरानी वित्त मंत्रालय का वित्तीय सेवा विभाग करता है। 

वह बताता है कि यह योजना एकल प्रीमियम वाली है जो बैंक के सावधि जमा की तरह ही तयशुदा नियमित ब्याज देगी। कहा गया कि उसे एफडी की तरह कभी भी भुनाया जा सकता है। बाद में पता चला कि यह एक बीमा योजना थी जिसमें पांच साल तक भारी भरकम प्रीमियम चुकाना था। उसकी शिकायतों की कोई सुनवाई नहीं हुई। इस प्रकार उसे अपनी बचत का एक बड़ा हिस्सा गंवाना पड़ा। यह साफ धोखाधड़ी है।

यह देश भर में हो रहा है और नियामकों की नाक के नीचे हो रहा है। वे कोई मदद नहीं करते। आरबीआई गवर्नर के बारे में यह बात सब जानते हैं कि उन्होंने एक वित्तीय विशेषज्ञ से कहा था कि बीमा नियामक को इन मामलों से निबटना चाहिए भले ही बैंक ने धोखाधड़ी नहीं की हो। 

दूसरा उदाहरण: लाखों लोगों को फ्लोटिंग दर पर ऋण लेने के लिए प्रोत्साहित किया। फ्लोटिंग दर के अधीन जब ब्याज दरें या रीपो दर बढ़ती है तो ऋण लेने वाले की ब्याज दर भी बढ़ती है। साथ ही जब दरों में गिरावट आए तो ऋण लेने वाले की ब्याज दर भी घटनी चाहिए लेकिन व्यवहार में ऐसा नहीं होता।

आरबीआई की अपनी रिपोर्ट ने इस धोखाधड़ी के बारे में लिखा है। रिपोर्ट के मुताबिक: एक, दरों में कमी तमाम श्रेणियों में असमान थी। दूसरा, दरों में सख्ती के दौर में अधिक तेजी आई और सहजता के दिनों में गिरावट की दर बहुत धीमी रही। तीसरा, बैंकों ने दरों के आकलन में तदर्थ तरीके अपनाते हुए आरबीआई द्वारा उल्लिखित तरीकों का इस्तेमाल नहीं किया। उन्होंने अनुचित आकलन किए। चौथा, बैंकों को भी दरें कम करने में छह महीने से अधिक समय लगा। 

पांचवां, कई बैंकों द्वारा लिया जा रहा शुल्क कई बार बहुत ज्यादा था। छठा, बैंक ने समान श्रेणी के कर्जदारों के लिए दरों में मनमाने अंदाज में बदलाव किया। सातवां, बैंक द्वारा ऋण की ब्याज दर निर्धारित करने की समूची प्रक्रिया ही अस्पष्टï है। आठवां, बैंकों ने ब्याज दर में संभावित कटौती को कम करने के लिए लागत बढ़ाचढ़ा कर पेश की।

इसके लिए कोई कागजी कार्रवाई नहीं की गई। नौवां, कई बैंकों में इस संबंध में बोर्ड द्वारा मंजूरी नीति भी नहीं है जबकि अन्य बैंकों के पास इस राशि के आकलन का सही तरीका तक नहीं था। रिपोर्ट का यह सिलसिला यहीं समाप्त नहीं होता लेकिन मैं अपनी बात को यहीं सीमित कर रहा हूं।

यह पूरी बैंकिंग व्यवस्था को कठघरे में खड़ा करता है और यह कर्जदारों के साथ बहुत बड़े पैमाने पर की जा रही धोखाधड़ी है। इस दौरान इस्तेमाल की जा रही व्यवस्था काफी अनुचित, भेदभाव वाली और अस्पष्टï है तथा इसकी मदद से 30,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त शुल्क वसूला जा रहा है। इस सिलसिले में सवाल उठाए जाने पर आरबीआई ने पूरी तरह खामोशी का परिचय दिया। आपको यह लग सकता है कि छह संयुक्त सचिवों, दो अतिरिक्त सचिवों, दो आर्थिक सलाहकारों और ढेर सारे कनिष्ठ अधिकारियों वाला वित्त मंत्रालय व्यापक जनहित में इस विषय में रुचि रखता होगा। परंतु ऐसा नहीं है।

आरबीआई इस बात से परिचित है कि बैंकों के ग्राहक इन मसलों से रोज ब रोज जूझ रहे हैं और ठगे जा रहे हैं। बैंक मनमाना शुल्क वसूल करते हैं, थर्ड पार्टी योजनाओं को गलत तरीके से बेचा जा रहा है, केवाईसी के नियम जटिल और अस्पष्ट हैं जिससे ग्राहक भी पीडि़त हैं। बैंकों को यह इजाजत दी गई है कि वे हास्यास्पद दर पर सोना बेचें जबकि उन्हें उसी दर पर ग्राहकों से यह सोना खरीदने की इजाजत नहीं है। तकनीकी तंत्र अस्पष्टï हैं, उनमें कई खामियां हैं और ग्राहक गलत आकलन से परेशान रहते हैं। पीडि़तों के संकट के निवारण की भी उचित व्यवस्था नहीं है। 

जब रघुराम राजन आरबीआई के गवर्नर बने तो हमारे पास अवसर था कि हम इनमें से कुछ मुद्दों को उसके पास ले जा सकें। उन्हें पता था कि 2008 के वित्तीय संकट के बाद पश्चिमी देशों ने वित्तीय संरक्षण को वित्तीय क्षेत्र के नियमन का केंद्रीय व्यवहार बनाया गया है। बहरहाल, मैंने पाया कि वह भी उपभोक्ता मुद्दों में बहुत अधिक रुचि नहीं रखते थे। उनके भाषणों में भी उनका जिक्र कभी नहीं आया। जब हमने उनके सामने उपभोक्ताओं से जुड़े कुछ मुद्दे उठाए तो उनका उत्तर था कि हमें उपभोक्ताओं के हित की कुछ ज्यादा ही चिंता नहीं करनी चाहिए। 

तथ्य यह है कि आरबीआई और वित्त मंत्रालय दोनों ही सरकारी बैंकों के फंसे हुए कर्ज की समस्या, आईएलऐंडएफएस जैसे संकट और नोटबंदी जैसी बड़ी चूक, तीनों के लिए जिम्मेदार हैं। अगर आप ध्यान दें तो वे इस संस्थागत चूक के पीछे की वजहों के लिए भी नहीं लड़ रहे हैं, जबकि आम जनता ऊंचे कर और ऊंची ब्याज दर के रूप में इसकी कीमत चुकाती है।

Keyword: RBI, Banking, IL&FS, Bad Debt, State run Bank, Finance Ministry,
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