बिजनेस स्टैंडर्ड - रिजर्व बैंक की स्वायत्तता और जवाबदेही
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रिजर्व बैंक की स्वायत्तता और जवाबदेही

नितिन देसाई /  November 27, 2018

सरकार ने वित्त मंत्रालय और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के मसले को एक बार फिर छेड़ दिया है। 19 नवंबर को हुई बोर्ड बैठक के पहले तक दोनों पक्ष सार्वजनिक रूप से एक दूसरे के खिलाफ आलोचनात्मक रुख अपनाए हुए थे। अच्छी बात यह है कि गंभीर संकट और इस्तीफे की आशंका गलत साबित हुई। आरबीआई के मुनाफे में से जोखिम प्रबंधन के प्रावधान की शुरुआत की गई। इसके अलावा सरकार अपने नामितों और चयनित बोर्ड निदेशकों की मदद से आरबीआई के नियामकीय प्राधिकार पर अपना दबदबा भी कायम करना चाह रही थी। 

आरबीआई के मुनाफे को हस्तांतरित करने को लेकर छिड़ा विवाद गलत था। यह सच है कि आरबीआई के मुनाफे का बहुत बड़ा हिस्सा सरकारी मुनाफे से आता है। यह मुनाफा नकदी के मूल्य और उसके उत्पादन और वितरण की लागत के अंतर के आधार पर आकलित किया जाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि सरकार ने आरबीआई को इसका अधिकार प्रदान कर रखा है। ऐसे में इससे होने वाला समस्त मुनाफा सरकार को हस्तांतरित कर दिया जाना चाहिए। 

वित्त मंत्रालय हमेशा से इस पैसे को इस्तेमाल करने की इच्छा रखता रहा है। इसकी वजह से बदलाव आया और अब आरबीआई कुछ राशि आपातकालीन भंडार में मसलन कुछ विकास संबंधी फंड और पुनर्मूल्यांकन फंड में रखने के अलावा अपने समस्त अधिशेष को हस्तांतरित कर देता है। पुनर्मूल्यांकन भंडार में वह पूंजीगत लाभ भी होता है जिसका वास्तवीकरण न किया गया हो। ऐसे में रुपये में इसकी विदेशी मुद्रा की धारिता में इजाफा होता है परंतु यह लाभ वितरणयोग्य नहीं होता है क्योंकि यह भंडार बाजार विनिमय हस्तक्षेप के लिए होता है और यह एक तरह से विदेशी मुद्रा विनिमय का ही मूल्य होता है। 

वर्ष 2017-18 के अंत में आरबीआई की बैलेंस शीट का आकार 36,176 अरब रुपये के बराबर था जो कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व की तुलना में जीडीपी के 22 फीसदी के बराबर था और यह यूरोपीय केंद्रीय बैंक और बैंक ऑफ जापान की बैलेंस शीट से काफी कम था। इसका 53 फीसदी हिस्सा देनदारी वाला है जिसमें जारी की गई नकदी का मूल्य और परिसंपत्ति का 73 फीसदी हिस्सा विदेशी मुद्रा वाली परिसंपत्तियों की धारिता से बना है। बैलेंस शीट में उतार या चढ़ाव इस बात पर निर्भर करेगा कि नकदी डाली जा रही है या उसकी निकासी हो रही है। 

आकस्मिक कोष 2,321 अरब रुपये का है। बैलेंस शीट का आकार देखते हुए यह बहुत अतार्किक नहीं नजर आता है। बहरहाल, संभावित जोखिम पर करीबी नजर डालें तो प्रॉविजनिंग का ऊंचा या नीचा स्तर होने का संकेत दे सकता है और इसका निरीक्षण उस समूह को करना होगा जिसकी स्थापना आरबीआई के आर्थिक पूंजी आधार का परीक्षण करने के लिए की गई हो। उम्मीद यही की जानी चाहिए कि यह स्वतंत्र पेशेवरों का समूह होगा जो बॉन्ड बाजार निवेशकों की दृष्टिï में आरबीआई की रेटिंग और विश्वसनीयता बरकरार रखने के लक्ष्य के साथ काम करेंगे। 

सरकार के प्रतिनिधियों द्वारा उठाया गया दूसरा मुद्दा एमएसएमई और एनबीएफसी के लिए आसान ऋण की उपलब्धता से जुड़ा था। यहां असली प्रश्न इन चिंताओं की वैधता का नहीं बल्कि आरबीआई की नियामकीय कामकाज की स्वायत्तता और उससे हासिल नतीजों की जवाबदेही का है।

केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता हमेशा से सरकारों की चिंता का विषय रहा है। ऐसा न केवल भारत में बल्कि दुनिया भर में देखने को मिला है। इसका कारण यह है कि ये नकदी जारी करने और नियामकीय निगरानी जैसे काम करता है जबकि बाकी सारे संप्रभु अधिकार सरकार के पास रहते हैं। आशंका यह है कि लोकतांत्रिक ढंग से निर्वाचित सरकार के लक्ष्य मतदाताओं से बहुत हद तक प्रभावित होंगे और वे स्थिरता को शायद ही बहुत अधिक प्राथमिकता दें। मौद्रिक और बैंकिंग संबंधी नियमन को राजनीतिज्ञों से दूर रखने में वित्तीय स्थिरता को बरकार रखने, बैंकिंग संस्थानों और ब्याज दरों तथा विनिमय दरों को व्यवहार्य बनाए रखना आदि शामिल हैं। यह बात वित्तीय बाजारों की स्थिरता के लिए तब खासतौर पर आवश्यक है जबकि वे विदेशी पूंजी के लिए खुले हों। भारत में ऐसा ही मामला है।

भारत में एक अतिरिक्त चिंता यह है कि सरकार बाजार की सबसे बड़ी कर्जदार है और आम घरों की 80 फीसदी वित्तीय बचत पर उसका दावा है। इतना ही नहीं उसके पास बैंकों और बीमा कंपनियों का मालिकाना हक है जो वित्तीय मध्यस्थता की करीब 70 फीसदी की हिस्सेदार हैं और ये प्रत्यक्ष तौर पर सरकारी नियंत्रण में रहते हैं। 

ऐसे में वित्तीय बाजार नीति को लेकर सरकार के लक्ष्यों को लेकर सही मायनों में आशंका पैदा होती है। इसका निर्धारण इस बात से होगा कि उसके बड़े कर्जदारों और बैंक मालिकों के हित किस तरह के हैं। वोट जुटाने के लोकलुभावन उपायों का असर भी उस पर होगा। भारत अब खुली बाजार आधारित अर्थव्यवस्था वाला देश है। इसे पारदर्शी और विश्वसनीय वित्तीय बाजारों की आवश्यकता है। ऐसे में आरबीआई का स्वायत्त होना अत्यावश्यक है।

परंतु स्वायत्तता और जवाबदेही दोनों एक साथ आते हैं। सरकार द्वारा नियुक्त हस्तक्षेपकर्ता बोर्ड के साथ ऐसा नहीं है। हकीकत तो यह है कि वह केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता और विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाता है और राजनीतिक हस्तक्षेप की गुंजाइश में इजाफा करता है। बेहतर रुख यही होगा कि मौद्रिक नीति संबंधी प्रतिबद्धता के मॉडल का अनुसरण किया जाए जहां आरबीआई को सार्वजनिक रूप से तय लक्ष्य से विचलन का जवाबदेह ठहराया जाए। इस विचलन की मात्रा का भी उल्लेख हो।

वित्तीय स्थिरता के लक्ष्य अधिक कठिन हैं लेकिन इनको फंसे हुए कर्ज के संदर्भ में सह्य स्तर पर निर्धारित किया जा सकता है। परंतु इसका एक अन्य पहलू यह है कि आरबीआई को तय लक्ष्य के दायरे में बने रहने के लिए आवश्यक इजाजत भी मिले। इस दौरान सार्वजनिक और निजी बैंकों के बीच कोई भेदभाव न किया जाए और गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों का व्यापक नियामकीय निरीक्षण किया जाए। 

कड़ी जवाबदेही का ऐसा ढांचा भी सरकार की चिंता का पूर्ण समाधान नहीं करता। वह है कि वृद्धि की गति बरकरार रखने और निवेश को प्रोत्साहन देने से जुड़ा अनुषंगी दर्जा। इसके आकलन का कोई सीधा गणित नहीं है। परंतु जवाबदेही के कुछ उपाय हैं जो स्वतंत्र अर्थशास्त्रियों और बाजार विश्लेषकों की आधिकारिक रूप से गठित संस्था अपनी तिमाही रिपोर्ट में सुझा सकती है।

हमें मुद्रास्फीति को लक्ष्य बनाने से आगे बढऩा होगा। न्यूजीलैंड और ब्रिटेन में भी ऐसा हो रहा है। स्वायत्तता और जवाबदेही का पारदर्शी ढांचा जो मुद्रास्फीति से परे वित्तीय स्थिरता और निवेश के माहौल जैसी बातों पर गौर करे, वह स्वायत्तता पर भी बल दे सकता है और सरकार की वैध चिंताओं को हल करने में भी सहायक हो सकता है।
Keyword: Government, RBI, Finance Ministry, Regulatory, Evaluation,
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