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फंसे ऋण खातों की पड़ताल तेज

अभिजित लेले / मुंबई 11 27, 2018

आरबीआई की पैनी नजर

आरबीआई ने प्रावधानों के लिए एनपीए की शुरू की जांच
एनपीए की पहचान होने के बाद भी प्रावधानों में अंतर
प्रावधान के लिए सभी बैंकों को एक मंच पर लाने की कवायद

बिजनेस स्टैंडर्ड फंसे ऋण खातों की पड़ताल तेजभारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने बैंकों के फं से ऋणों की जांच तेज कर दी है। केंद्रीय बैंक इस बात की पड़ताल करेगा कि फंसे ऋणों को लेकर बैंकों का क्या रवैया है और वे किस तरह इनके लिए प्रावधान कर रहे हैं। माना जा रहा है कि आरबीआई प्रावधान और फंसे ऋण खातों से निपटने के लिए नए उपायों पर विचार कर रहा है। 

सूत्रों का कहना है कि यह कवायद अलग से हो रही है, क्योंकि इसके साथ ही आरबीआई वित्त वर्ष 2018 के लिए सालाना वित्तीय जांच (एएफआई) भी कर रहा है। एक सार्वजनिक बैंक  के अधिकारी ने कहा कि ऋण खातों की जांच करने वाले आरबीआई के लोगों ने संकेत दिए हैं कि विभिन्न बैंकों में जिन खातों की जांच हो रही है वे गैर-निष्पादित आस्तियां (एनपीए) हो सकते हैं। हालांकि इस बात को लेकर मतभेद बना हुआ है कि कब किसी खाते को एनपीए घोषित किया जा सकता है और इसके लिए प्रावधान किया जा सकता है। 

अधिकारी ने कहा कि आरबीआई की इस कवायद का मकसद फंसे ऋणों के लिए प्रावधान करने के लिए सभी बैंकों को एक मंच पर लाना है। बैंकों को एनपीए को तीन श्रेणियों सब-स्टैंडर्ड ऐसेट्स, डाउटफुल ऐसेट्स और लॉस ऐसेट्स में वर्गीकृत करना होता है। अगर कोई बैंक किसी ऋण खाते को लेकर शक जाहिर करता है तब रकम वसूली की संभावनाएं खासी कम हो जाती हैं। ऐसे में इन खातों को कम प्रावधान के साथ सब-स्टैंडर्ड मानना जारी रखना दूसरे कर्जदाताओं के लिए तर्कसंगत नहीं रह जाता है।  

सूत्रों ने कहा कि आरबीआई को ऐसा महसूस हो रहा है कि फंसे खाते निपटाने के मौजूदा तरीके के मद्देनजर एनपीए के लिए प्रावधान करने का एक साझा उपाय किया जाना चाहिए। अगर कोई ऋण खाता 12 महीने से कम या इतनी अवधि के लिए एनपीए रहता है तो इसे सब-स्टैंडर्ड ऐसेट्स के तौर पर वर्गीकृत किया जाता है। ऐसे में बैंक ऋण के लिए 12 से 15 प्रतिशत तक प्रावधान करना शुरू कर देते हैं। अगर कोई ऋण सब-स्टैंडर्ड कैटेगरी में 12 महीने से अधिक समय के लिए रहता है तो इसे 'डॉटफुल' के तौर पर वर्गीकृत किया जाता है। 

एक दूसरे सरकारी बैंक के अधिकारी ने आरबीआई की पहल की पुष्टि की। उन्होंने कहा, 'बैंकिंग नियामक अब कुछ दूसरी कवायदें भी कर रहा है। ये 2015-16 में की गई परिसंपत्ति गुणवत्ता समीक्षा की तरह ही हैं। यह एक तरह से अंतर-बैंकिंग समीक्षा है, जिसका सालाना समीक्षा से कुछ लेना-देना नहीं है।' आरबीआई की मौजूदा पहल से आने वाली तिमाहियों में बैंकों पर प्रावधान का दबाव बढ़ सकता है। हालांकि बड़े आकार के एनसीएलटी खातों के लिए प्रावधान वापस लिए जाने से दबाव थोड़ा कम हो सकता है।
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