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भारत की सड़कों के इतिहास पर एक नजर

विवेक देवरॉय /  11 26, 2018

इस स्तंभ के पाठक आर्थर कॉटन के नाम से परिचित हैं। कॉटन ने वर्ष 1854 में 'पब्लिक वक्र्स इन इंडिया' शीर्षक से एक किताब प्रकाशित की थी। उस किताब में जिक्र था कि 'खोजबीन के बगैर काम करने के बुरे नतीजों का भारत में संपर्क के इतिहास से बड़ा कोई सबूत नहीं हो सकता है। इस मामले से जिस असंगत तरीके से निपटा गया है उसकी वजह से हमें नाकामी एवं पैसे की बरबादी देखने को मिली है। जहां संपर्क की इच्छा से होने वाला नुकसान इतना अधिक था कि हजारों तरीके से और हजारों योजनाओं में पैसे खर्च किए गए हैं। संभवत: करोड़ों रुपये खर्च को संभालने में सही निर्णय न होने से गंवा दिए गए हैं।

मद्रास प्रेसिडेंसी में सड़क निर्माण की हमारी शुरुआती कोशिशों का खाका एक मार्गदर्शक की तरह काफी उपयोगी हो सकता है और हमारी भावी गतिविधियों में हमारे लिए एक चेतावनी हो सकती है। माना गया था कि सड़क निर्माण की कामयाबी के लिए महज उपकरणों से लैस लोगों की जरूरत होती है जिनका नेतृत्व बेतरतीब ढंग से चुना गया एक अधिकारी कर रहा हो और वह बगैर किसी वैज्ञानिक योग्यता के हो। इस तरह साजो-सामान से लैस एवं कमान वाले निकायों को सैकड़ों मील लंबी सड़कों के निर्माण के लिए गठित किया गया। जब यह लगा कि जमीन पर इसका शायद ही कोई असर हो तो हजारों कुलियों को भी शामिल कर लिया गया। इस तरह शुरुआती सड़कों की लागत के अलावा लाखों रुपये खर्च कर दिए गए। अगर वैज्ञानिक तरीकों से चला जाता और श्रमिकों से क्रियान्वयन कराया जाता तो यह अधिक कारगर हुआ रहता।'

अठारहवीं शताब्दी के आखिर तक सैन्य मकसद के लिए भी निर्मित सड़कों की कोई मांग नहीं उठी थी। परिवहन का साधन मुख्यत: ग्रामीण रास्तों पर चलने वाले पशु ही होते थे और लोग उनकी सवारी कर या पालकियों में बैठकर आते-जाते थे।

इस किताब के मुताबिक 'निश्चित तौर पर, किसी अतिशयोक्ति के बगैर भारत में हमारे शासन के इतिहास में सर्वाधिक आश्चर्यजनक बात यह है कि इस तरह के अनगिनत अंक भूमि राजस्व संग्रह में लगे हजारों सक्षम लोगों द्वारा लिखे जाने चाहिए। हजार गुना अहम सवाल यह है कि लोगों को लगान चुकाने के लिए सक्षम बनाने के बारे में कभी ध्यान नहीं दिया गया। उसकी तुलना में कराधान की मात्रा का सवाल पूरी तरह निरर्थक है। जहां हम एक जिले से 20 लाख रुपये का राजस्व जुटाने की जद्दोजहद में सौ वर्षों से लगे हुए हैं, वहीं परिवहन की बेशुमार लागत के तौर पर नष्ट हो रहे करोड़ों रुपये पर कोई ध्यान नहीं दिया गया है। यह रैयतों में हुई पैदावार के कुल मूल्य को निगल लेगा। 

फिलहाल हरेक चार में से दो व्यक्ति खाद्य उत्पादन में लगे हुए हैं और तीसरा व्यक्ति सामान की ढुलाई में लगा होता है। कोई इसे स्वाभाविक मानेगा कि सिंचाई या अन्य साधनों की मदद से एक व्यक्ति चार लोगों के लिए अनाज उपजा सकता है और अगर सस्ते परिवहन साधन के हिसाब से देखें तो एक व्यक्ति चार के बजाय चालीस लोगों को ले जा सकते हैं। इस तरह चार में से केवल एक व्यक्ति के बजाय दस में से नौ लोग श्रम के लिए वहां रह जाते हैं जो चार लोगों को विलासिता मुहैया कराने या विदेशी राज्यों में बिक्री के लिए सामान पैदा करने में लगते हैं। इस तरह देश की संपत्ति और बढ़ा हुआ राजस्व दे पाने की इसकी क्षमता में तीव्र वृद्धि होगी।'यह धारणा काफी हद तक जानी-पहचानी लगती है।

कॉटन की इस किताब के प्रकाशन के करीब पांच दशक बाद 'इम्पीरियल गजेटियर ऑफ इंडिया'आया था। वर्ष 1908 में प्रकाशित तीसरे खंड में सड़क परिवहन से संबंधित जानकारियां दी गई थीं। गजेटियर में कहा गया है, 'इस समय मौजूद सड़कों की लंबाई अच्छी-खासी है। हालांकि इस देश में अब भी ऐसे संपर्क साधनों की कमी है जो बरसात के मौसम में भी आवाजाही के लिए लायक हों। अच्छी संख्या में सड़क मार्गों की जरूरत अतीत में ज्यादा महसूस नहीं की गई है और 1840 के आसपास ही इसके लिए गंभीर प्रयास शुरू हुए। 

वैसे सड़क-निर्माण की मौजूदा हालत के बारे में कुछ हद तक संतोष जताया जा सकता है। लेकिन हाल के समय में रेलवे के दूरदराज के इलाकों में भी विस्तार के चलते कारोबार जिस तेजी से बढ़ा है, उसने रेलवे स्टेशनों तक सामान लाने- ले जाने के लिए बेहतर संपर्क मार्गों की जरूरत बढ़ा दी है। मौजूदा मार्गों पर वाहनों की आवाजाही बढऩे से निकट भविष्य में और सड़कों की जरूरत बढऩे की संभावना है। ब्रिटिश शासन की शुरुआत के पहले आधुनिक अर्थों में सड़कें लगभग नदारद थीं और इसकी स्थापना के बाद भी शहरी इलाकों को छोड़कर अन्य जगहों पर बहुत कम सड़कें ही मौजूद थीं। लेकिन 1839 में कलकत्ता को दिल्ली से जोडऩे का फैसला किया गया। 

इस मार्ग को पहिये वाली गाडिय़ों के लायक बनाया जाना था। रास्ते में आने वाली छोटी नदियों एवं नालों पर पुल जबकि बड़ी नदियों को बड़ी नावों से जोड़ा जाना था। भारत के मैदानी इलाके में ऐसी जलधाराओं की भरमार है जो साल भर में आठ महीनों तक बिना किसी मुश्किल के सामान्य परिवहन साधनों द्वारा पार करने लायक रहते हैं। यह अलग-अलग जगहों के बीच संपर्क में एक छोटी बाधा ही है। लेकिन 18वीं सदी के अंत तक सेना के लिए भी तैयार मार्गों की कोई मांग नहीं होती थी। परिवहन मुख्य रूप से पशुओं के झुंड के जरिये ही होता था जो देहाती रास्तों से गुजरते थे जबकि यात्री पशुओं की सवारी कर सकते थे या पालकी में जा सकते थे। 

इस तरह की स्थिति के भी अपने फायदे थे। सड़कों की चाहत ने भारत की सेनाओं को यह सिखाया कि उनके बगैर कैसे काम करना है? सैन्य उद्देश्य के लिए परिवहन और रसद आपूर्ति की समूची व्यवस्था को सड़क-विहीन देश के हिसाब से ढाला गया था। शांति काल में पडऩे वाली सामान्य जरूरतें युद्धकाल की जरूरतों से अलग नहीं होती थीं।'

मुझे यह स्वीकार करना चाहिए कि मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ था। ब्रिटिश काल के पहले की सड़कों को नकार देना अनुचित है। अगले स्तंभ में इस बारे में अधिक विवरण उपलब्ध कराया जाएगा। 

(लेखक प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के चेयरमैन हैं। लेख में प्रस्तुत विचार व्यक्तिगत हैं)

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