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सस्ते तेल की तैयारी

संपादकीय /  November 26, 2018

वैश्विक बाजारों में कच्चे तेल की कीमतों में अचानक और तेज गिरावट आने के बाद देश के नीति निर्माताओं के समक्ष कई प्रकार के विकल्प उत्पन्न हो गए हैं। दरअसल भारत अपने कच्चे तेल का 80 फीसदी आयात करता है, ऐसे में तेल कीमतों में आने वाली किसी भी प्रकार की गिरावट उसके लिए हमेशा लाभदायक रहती है।

कच्चे तेल के भारतीय बास्केट की औसत कीमत इस वित्त वर्ष में अब तक करीब 74 डॉलर प्रति बैरल रही है। अब माना जा रहा है कि आने वाले कुछ समय तक यह 55 से 60 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में रहेगी। जाहिर सी बात है कि इससे अर्थव्यवस्था को काफी मदद मिलेगी और बहुत हद तक यह भी संभव है कि भारतीय रिजर्व बैंक इसके चलते ब्याज दरों में कटौती करे क्योंकि ऐसा करने से निवेश तथा वृद्धि को बल मिलेगा। पूरे वर्ष का आयात बिल पेट्रोलियम मंत्रालय द्वारा महीने भर पहले अनुमानित 12,500 करोड़ डॉलर के अनुमानित बिल से काफी कम हो सकता है।

बहरहाल, वैश्विक तेल कीमतों में यह गिरावट एक ऐसा परिणाम भी ला सकती है जिसकी तैयारी हमें पहले से ही रखनी होगी। बहुत संभव है कि इस गिरावट के बाद एक बार फिर विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक भारतीय अर्थव्यवस्था में निवेश करना आरंभ करें। यह शेयर बाजार के लिए अच्छी खबर हो सकती है लेकिन व्यापक अर्थव्यवस्था की दृष्टि से इसका असर मिलाजुला रहेगा। नवंबर महीने में करीब 40,000 करोड़ डॉलर की पूंजी बाहर जाने के बाद अब शुद्ध आवक सकारात्मक हुई है। आशंका यह है कि रुपये में एक बार पुन: अस्थिरता देखने को मिलेगी।

विदेशी विनिमय बाजार को ध्यान में रखकर बात करें तो एफपीआई की आवक में इजाफा रुपये और डॉलर की विनिमय दर पर नकारात्मक असर डालेगा और बहुत संभव है कि यह भारतीय निर्यात में सुधार को भी प्रभावित करे। आरबीआई को इस संभावना को ध्यान में रखते हुए ही काम करना होगा। 

यह बात सच है कि अब मुद्रा प्रबंधन केंद्रीय बैंक का लक्ष्य नहीं रहा लेकिन उसके लिए यह एक अच्छा अवसर है कि वह भविष्य के लिए भंडार तैयार करे। अगर रुपया भारतीय निर्यात में वृद्धि के लिहाज से अत्यधिक अधिमूल्यित है तो इसमें गिरावट आनी ही है। एफपीआई आवक में तात्कालिक उछाल के बावजूद ऐसा होगा और आरबीआई को भी लंबी अवधि के दौरान रुपये में आने वाली गिरावट को थामने के लिए डॉलर में भंडार जुटाने की अपनी क्षमता का भरपूर इस्तेमाल करना चाहिए।

सरकार को इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि तेल कीमतों में इस गिरावट का उसके राजकोष पर क्या असर होगा। जरूरी नहीं कि आगामी आम चुनाव से पहले तेल कीमतों में गिरावट का इस्तेमाल उसे आम जनमानस को संतुष्ट करने में करना पड़े। यह सही है कि अगर उसे राजकोषीय घाटे का लक्ष्य हासिल करने में परेशानी हो रही हो तो वह तेल से आने वाले कर राजस्व में कमी को उलटने में भी सक्षम होगी।

बहरहाल, तेल कीमतों में गिरावट को स्थायी मानने की कोई वजह नहीं है। कीमतों में यह गिरावट मध्यम अवधि में जारी रह सकती है क्योंकि जमाल खशोगी की हत्या के बाद सऊदी अरब की सरकार अमेरिका को तसल्ली देने का प्रयास कर रही है। इसके अलावा अमेरिका ने भारत समेत ईरानी तेल के प्रमुख ग्राहकों को नए प्रतिबंधों से रियायत देने का निर्णय किया है। ऐसे भूराजनैतिक हालात हमेशा जारी नहीं रहने वाले हैं। ऐसे में भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक कीमतों पर इसकी लंबी निर्भरता से मुक्त कराने पर नए सिरे से विचार-विमर्श करने की आवश्यकता है। 

Keyword: Global Market, Crude Oil, Basket, Barrel, Reseve Bank, Banking, Petrolium, Portfolio, Economy,
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