बिजनेस स्टैंडर्ड - फिर भारत पर फिदा एफपीआई!
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फिर भारत पर फिदा एफपीआई!

अनूप रॉय, अभिषेक वाघमारे और समी मोडक / मुंबई/नई दिल्ली 11 26, 2018

तेल में एफपीआई की झलक
तेल में गिरावट के मद्देनजर एफपीआई फिर भारत में कर सकते हैं निवेश

बिजनेस स्टैंडर्ड फिर भारत पर फिदा एफपीआई!तेल की कीमतों में गिरावट से विदेशी निवेशक एक बार फिर भारतीय बाजारों का रुख कर सकते हैं। हालांकि तेल कीमतों में स्थायी गिरावट आने और घाटा पाटने में भारत के सक्षम होने तक वह इंतजार करना पसंद करेंगे। मौजूदा वित्त वर्ष में भारतीय बास्केट में कच्चे तेल की औसत कीमत 74 डॉलर प्रति बैरल रही है जबकि डॉलर के मुकाबले रुपये की विनिमय दर का औसत 69.6 रुपये प्रति डॉलर रहा है। 2018-19 के बजट में पेट्रोलियम और वित्त मंत्रालय ने तेल आयात बिल के 105 अरब डॉलर रहने का अनुमान लगाया था। यह अनुमान तेल की औसत कीमत प्रति बैरल 65 डॉलर और रुपये की औसत विनिमय दर 65 रुपये प्रति डॉलर के आधार पर लगाया गया था।

अक्टूबर, 2018 में पेट्रोलियम मंत्रालय ने तेल आयात बिल को संशोधित कर 125 अरब डॉलर कर दिया। यह अनुमान साल की दूसरी छमाही में तेल की औसत कीमत 77.9 डॉलर प्रति बैरल रहने और रुपये की औसत विनिमय दर के 72.2 रुपये प्रति डॉलर रहने के आधार पर लगाया गया था। विश्लेषकों का कहना है कि अगर कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आती है और रुपया मजबूत होकर इन अनुमानों के आसपास रहता है तो तेल आयात का बिल 105 अरब डॉलर से 125 अरब डॉलर के बीच रह सकता है। इसके 125 अरब डॉलर के आसपास रहने की आशंका है।

एक महीने पहले तेल की बढ़ती कीमतों के कारण भारतीय बाजारों में भारी गिरावट आई थी। अब ब्रेंट क्रूड की कीमत में 30 फीसदी की अभूतपूर्व गिरावट आई है और यह 60 डॉलर प्रति बैरल से नीचे चला गया है। माना जा रहा है कि इससे अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी। अलबत्ता विशेषज्ञों का मानना है कि तेल की कीमतों में गिरावट से अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक प्रभाव देखने को मिलेगा। मध्यम अवधि से दीर्घावधि में इसका असर हो सकता है लेकिन निकट भविष्य में तेल की कीमतों में गिरावट से बाजार में तेजी आएगी।

डाल्टन कैपिटल एडवाइजर्स के प्रबंध निदेशक यूआर भट ने कहा, 'मोटे तौर पर बाजार ने तेल की कीमतों में गिरावट पर प्रतिक्रिया दे दी है। अब इसमें ज्यादा गुंजाइश नहीं है। शायद तेल की कीमतों में ताजा गिरावट बाजार में व्यापक तेजी लाने के लिए पर्याप्त नहीं है।' विदेशी निवेशक फिर से भारतीय बाजारों का रुख करने से पहले इंतजार करना चाहेंगे। इसकी मुख्य वजह यह है कि तेल की कीमतों में गिरावट का कारण अधिक उत्पादन के चलते जरूरत से ज्यादा आपूर्ति की आशंका और ईरान पर कमजोर प्रतिबंध है। साथ ही वैश्विक अर्थव्यवस्था के सुस्त पडऩे की भी आशंका है।

भारत में स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक की मुख्य अर्थशास्त्री अनुभूति सहाय कहती हैं, 'अगर तेल की कीमतें निचले स्तर पर बरकरार रहती हैं तो इससे देश में अर्थव्यवस्था की स्थिति में सुधार आएगा। लेकिन वैश्विक मांग की स्थिति को लेकर आशंका है जो जोखिम की भूख को रोक सकती है। एफपीआई के हालिया प्रवाह पर नजर रखने की जरूरत है।'

नवंबर में अब तक ऋण श्रेणी में एफपीआई प्रवाह सकारात्मक रहा है लेकिन इक्विटीज में यह मामूली रूप से नकारात्मक रहा है। कुल मिलाकर इस महीने 56.42 अरब रुपये का विदेशी निवेश आया है जबकि अक्टूबर में 389.06 अरब रुपये के विदेशी निवेश की निकासी हुई थी। कच्चे तेल में गिरावट सरकार के साथ-साथ रिजर्व बैंक के लिए अच्छी खबर है। 

बिजनेस स्टैंडर्ड फिर भारत पर फिदा एफपीआई!भारत में बार्कलेज बैंक पीएलसी के मुख्य अर्थशास्त्री सिद्धार्थ सान्याल ने कहा, 'हमारे आकलन के मुताबिक तेल की कीमतों में प्रति बैरल 10 डॉलर की बढ़ोतरी से भारत के चालू खाते के शेष पर 40 से 50 आधार अंकों का फर्क पड़ता है। इसलिए तेल की कीमतों में गिरावट का सबसे ज्यादा असर चालू खाते के घाटे पर देखने को मिलेगा।' कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के कारण भारत का चालू खाते का घाटा जीडीपी का करीब 2.5 फीसदी पहुंच चुका है जबकि पिछले वित्त वर्ष में यह केवल 1.5 फीसदी था।

सान्याल ने कहा कि तेल की कीमतों में गिरावट का भुगतान संतुलन और रुपये पर भी सकारात्मक असर देखने को मिलेगा। तेल की कीमतें बढऩे से सरकार को उत्पाद शुल्क में कटौती करनी पड़ती है या महंगाई बढ़ सकती है। राजस्व में कटौती से सरकार का राजस्व प्रभावित होगा। तेल में गिरावट से राजकोषीय घाटा और महंगाई बढऩे के जोखिम भी कम होंगे। तेल विश्लेषकों का कहना है कि मौजूदा परिदृश्य में कच्चे तेल की कीमत में एक डॉलर की बढ़ोतरी से भारत के तेल आयात बिल में 0.5 अरब डॉलर की वृद्घि होगी। डॉलर के मुकाबले रुपये में एक रुपये की गिरावट पर भी यही स्थिति होगी।

अगर कच्चे तेल की कीमतें अगले कुछ महीनों तक इसी स्थिति पर बरकरार रहती हैं तो इससे सरकार को उत्पाद शुल्क में और कमी करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इससे देश के आयात बिल में भी कमी होगी और चालू खाते के घाटे पर दबाव कम होगा। साथ ही इससे रुपये में स्थिरता लाने में भी मदद मिलेगी।

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