बिजनेस स्टैंडर्ड - करें थोड़ी मेहनत और बच्चों को सिखाएं पैसे की कीमत
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करें थोड़ी मेहनत और बच्चों को सिखाएं पैसे की कीमत

बिंदिशा सारंग /  November 26, 2018

अमेरिका के जाने-माने वक्ता फ्रेडरिक डगलस का कहना था, 'टूटे हुए शख्स को ठीक करने से ज्यादा आसान है मजबूत बच्चे तैयार करना।' यह बात सही है और रुपये-पैसे की बात करें तो एकदम सही है। स्कूलों में बच्चे आजकल न तो ज्यादा नंबरों की बात करते हैं और न ही खेलकूद की। उसकी जगह बच्चों की बातों में भौतिकतावाद घुस गया है। मसलन, किसके पास नया वाला एक्सबॉक्स है? विदेश में छुट्टी मनाने कौन ज्यादा अच्छी जगह गया था? आजकल कम उम्र में ही बच्चों का पाला पैसों से पड़ जाता है और उन्हें पता चल जाता है कि उससे वे क्या खरीद सकते हैं। इसलिए छोटी उम्र में ही धन का बेहतर इस्तेमाल सिखाना जरूरी है।

लेकिन आज भी माता-पिता इस जिम्मेदारी को उतनी सक्रियता के साथ नहीं निभाते हैं, जितनी सक्रियता के साथ निभाना चाहिए। माई फाइनैंशियल एडवाइजर की मुख्य कार्य अधिकारी चित्रा अय्यर कहती हैं, 'माता-पिता अपने बच्चों को सही मूल्य सिखाने पर तो ध्यान देते हैं, लेकिन धन के बारे में बात करने से कतरा जाते हैं।' फिर बच्चों को धन का सिद्घांत और उसके तमाम पहलू समझाने की सही उम्र क्या होनी चाहिए? मुंबई में प्रमाणित वित्तीय योजनाकार पंकज मठपाल के हिसाब से इसमें वाकई जल्दी करनी चाहिए। उनकी सलाह है, 'किशोर वय से पहले ही इस बारे में सिखाना शुरू करना अच्छा रहेगा।'

बात-बात में सिखाएं

बच्चे जब छह साल की उम्र तक पहुंचते हैं तो वे नोटों को पहचानना और समझना शुरू कर देते हैं। उन्हें रुपये-पैसे से जुड़े पहलू समझाने का यही सही वक्त होता है। अय्यर की मानें तो इस बारे में किसी भी समय बात की जा सकती है। वह कहती हैं, 'धन के बारे में समझाने के लिए अलग से वक्त निकालने की कोई जरूरत नहीं है। जब भी बच्चों के साथ वक्त बिताने का मौका मिले, बातचीत में धन और उससे जुड़े पहलुओं को शामिल कर लें। अगर आप रकम निकालने एटीएम जाएं और आपके साथ आपका बच्चा भी हो तो उसे ही पिन डालने दें और जाते हैं और समझाएं कि मशीन क्या करती है और कैसे करती है। जब बैंक जाएं तो बच्चे को साथ ले जाएं और बताएं कि बैंक में कामकाज कैसे होता है।' यानी आपको जब भी मौका मिल जाए, उन्हें धन के गुर समझाएं।

इसका तरीका बहुत मुश्किल भी नहीं है। शुरुआत में बच्चे को बताएं कि गुल्लक में सिक्के डालकर कैसे पैसे बचाए जाते हैं। जब आपका बच्चा एक तय रकम गुल्लक में जमा कर ले तो बोनस के तौर पर उसे छोटी सी रकम और दे दीजिए।

ठोकर खाकर सीखेंगे

जब बच्चा किशोरवय से पहले के सालों में पहुंच जाए यानी उसकी उम्र 8 से 12 साल के बीच हो तो उसे मिलने वाली रकम बढ़ा दीजिए। अय्यर की सलाह है, 'बच्चे को जरूरत होने पर रकम देने की बजाय बार-बार एक तय रकम देना शुरू कर दीजिए। साथ ही उससे यह भी कहिए कि वह रकम को बचाए और बाद में अपनी मर्जी से खर्च करे। जब बच्चा अपनी जमा की हुई रकम को खर्च करने जाए तो उसे अपनी मर्जी चलाने दीजिए। बच्चे जब तक गलती नहीं करेंगे तब तक वे कुछ सीख नहीं पाएंगे। बेहतर है कि बच्चे कम उम्र में ही गलती करें, बड़ी उम्र में नहीं।'

जब बच्चे किशोर उम्र में पहुंचते हैं तो उनको मिलने वाला जेब खर्च भी बढ़ चुका होता है। मठपाल का कहना है, 'यह आपको तय करना है कि अपने बच्चे को बतौर जेबखर्च आप कितनी रकम देना चाहते हैं। बच्चे को यह रकम संभालने का हुनर सिखाना इससे भी जरूरी बात है। जब बच्चा 15-16 साल का हो तो उसे सिखाइए कि अपने पास मौजूद रकम के हिसाब से बजट कैसे तैयार किया जाता है।'

इस उम्र में आप चाहें तो उसे एक्सेल का इस्तेमाल करना सिखा सकते हैं। एक्सेल का इस्तेमाल कर आपका बच्चा अपने वित्तीय ब्योरे को बेहतर तरीके से संभाल और संजो सकता है। बैंक में अपने बच्चे का बचत खाता खुलवा दीजिए। खाता खुलने से उसे चेक बुक भी मिल जाएगी और खर्च की तय सीमा वाला डेबिट कार्ड भी मिल जाएगा। इसके अलावा भी उसे कई दूसरी सुविधाएं मिलेंगी। इस तरह के खातों में माता-पिता को बच्चों के लेनदेन और खर्च पर नजर रखने की सुविधा मिलती है। किशोर उम्र में ही बच्चे मोबाइल बिल चुकाने जैसे अपने तमाम खर्च खुद ही कर सकते हैं।

सिखाएं पैसे कमाना

बच्चे को पैसे की कीमत सिखाने का एक और बेहतर तरीका है। उसके हाथ में पैसे धरने के बजाय उसे पैसे कमाना सिखाया जाए। मठपाल कहते हैं, 'उन्हें पैसे कमाना सिखाइए। इसके लिए या तो उनसे घर के काम कराइए या बेहतर नंबर लाने पर बतौर इनाम उन्हें रकम दीजिए।' उनका कहना है कि इससे बच्चों को मेहनत की कीमत समझने का मौका भी मिलेगा और धन की अहमियत भी उनकी समझ में आएगी।

जब बच्चे बजट तैयार कर लेते हैं तो बजट के मुताबिक ही खर्च नहीं करने या बजट से ज्यादा खर्च कर देने पर उन्हें खमियाजा भी भुगतना चाहिए। मठपाल कहते हैं, 'अगर आप बच्चे को पूरे महीने के लिए एक तय रकम देते हैं, लेकिन बच्चा उसे 15 दिन में ही खर्च कर देता है तो पसीजने या दया दिखाने की कोई जरूरत है। उसे और रकम किसी भी सूरत में मत दीजिए। इससे बच्चे की समझ में आ जाएगा कि बजट बनाने और उसी के हिसाब से संयम बरतना कितना जरूरी होता है।'

सबसे आखिर में इंटरनेट पर जाकर टटोलिए कि बच्चों को वित्तीय तौर-तरीके सिखाने वाली किस तरह की सामग्री मौजूद है। इस सामग्री का इस्तेमाल अपने बच्चे को धन के सबक सिखाने में कीजिए। इसके लिए आप भारतीय रिजर्व बैंक की वेबसाइट पर जा सकते हैं और वित्तीय सबक सिखाने वाले वीडियो बच्चे को दिखा सकते हैं। ऐसे कई गेम और फिल्में आपको मिल सकती हैं, जो धन के ही विषय में हों। इसके अलावा अगर कहीं बच्चों के लिए वित्तीय कार्यशाला हो रही हों तो अपने बच्चों को वहां जरूर ले जाएं।
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