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पीएसयू सूचकांक की मोदी सरकार में सेहत नासाज

हंसिनी कार्तिक /  November 26, 2018

सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) से जुड़े सूचकांक की बम्बई स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) पर 1999 में हुई शुरुआत के बाद से पहली बार इसमें गिरावट के आसार दिख रहे हैं। केंद्र की मौजूदा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार का कार्यकाल मई 2019 में खत्म होगा और इस सूचकांक के भी गिरावट के साथ बंद होने के आसार हैं। जून 2014 से ही पीएसयू सूचकांक में 18 फीसदी की गिरावट आई जब नरेंद्र मोदी सरकार ने कार्यालय संभाला। इस सूचकांक में पिछली तीन सरकारों के कार्यकाल के दौरान बढ़त बनी रही थी।

1 फरवरी 1999 में शुरुआत होने के बाद पीएसयू सूचकांक ने 150 फीसदी तक की बढ़त दर्ज की जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में राजग सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा किया। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की 2004-1009 में पहली पारी की सरकार के दौरान इसमें 180 फीसदी से थोड़ी अधिक बढ़त हुई। उस वक्त के बाद से सूचकांक में गिरावट दिखने लगी हालांकि इसके बावजूद यह संप्रग की दूसरी पारी की सरकार (2009-14) के दौरान सकारात्मक बनी रही। हालांकि यह बढ़त कम होकर करीब दो फीसदी तक बनी रही। 7,093 अंक के मौजूदा स्तर के साथ यह दोबारा 2012 के स्तर पर वापस पहुंच गई है। 

विशेषज्ञ इसके लिए कई अहम कारकों का जिक्र करते हैं जिनमें विनिवेश और अनुवर्ती सार्वजनिक निर्गम की खबरें भी शामिल हैं। सबसे अहम बात यह है कि इस पीएसयू सूचकांक में ज्यादातर तेल एवं गैस क्षेत्र, बिजली, बुनियादी ढांचा और बैंकिंग क्षेत्र से जुड़ी कंपनियां शामिल हैं जिन पर फिलहाल दबाव है। इस सूचकांक में भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई), ऑयल ऐंड नैचुरल गैस कॉरपोरेशन (ओएनजीसी), इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (आईओसी), पावर फाइनैंस कॉरपोरेशन, एनडीएमसी और गेल जैसी दिग्गज कंपनियां भी शामिल हैं। इनकी कमाई 12 से 18 तिमाहियों तक दबाव में बनी रही है। बैंकिंग और बुनियादी ढांचा से जुड़े क्षेत्रों ने सुधार के संकेत देने शुरू किए हैं लेकिन निवेशकों का आत्मविश्वास हासिल करने से पहले लंबी दूरी तय करनी होगी।

मोतीलाल ओसवाल फाइनैंशियल सर्विसेज (एमओएसएल) के 23वें सालाना संपत्ति निर्माण से जुड़े अध्ययन में स्पष्ट तौर पर पीएसयू से निजी उद्यमियों तक मूल्य हस्तांतरण हुआ। हालांकि कुल बाजार पूंजीकरण में पीएसयू की हिस्सेदारी 1998 के 36 फीसदी से कम होकर अब 15 फीसदी हो गई है। बिजली, धातु एवं खनन उद्योगों में अत्यधिक क्षमता निर्माण हुआ और बैंकिंग के लिए फंसे कर्ज का संकट भी निकट भविष्य में खत्म होता नजर नहीं आता है। इसके अलावा निजी कंपनियां सार्वजनिक क्षेत्र की समकालीन कंपनियों की कमजोरी का फायदा उठा रही हैं और पिछले तीन सालों में प्रतिस्पद्र्धा में बढ़ोतरी हुई है। एमओएसएल ने अपने नोट में लिखा, 'पीएसयू के प्रतिस्पद्र्धी फायदे में कटौती जारी है।' तेल और गैस कंपनियों के लिए उत्पादन से जुड़ी बाधाएं और कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता से ओएनजीसी, आईओसी और भारत पेट्रोलियम जैसे शेयरों के लिए निवेशकों की धारणा कमजोर हो रही है। पीएसयू के खिलाफ एक और पहलू काम कर रहा है। दरअसल निवेशकों की तरफ से उपभोक्ता आधारित कारोबार को ज्यादा स्वीकार्यता मिल रही है। इनमें कंज्यूमर फाइनैंस, वैसी टिकाऊ वस्तुएं शामिल हैं जिन पर उपभोक्ता काफी सोच-समझकर खर्च करते हैं। मध्यम ïअवधि में इनसे राहत मिलने के कोई आसार नहीं दिखते ऐसे में पीएसयू शेयरों के लिए निवेशकों की मांग में सुधार की उम्मीदें कम ही हैं। इक्विनॉमिक्स रिसर्च के प्रबंध निदेशक जी चोक्कालिंगम कहते हैं, 'निवेशकों को पीएसयू शेयरों में भी चुनिंदा शेयरों को चुनना होगा। उद्योग से जुड़ी दिक्कतों की वजह से मैं कम से कम दो-तिहाई शेयरों का कोई खास मूल्य नहीं देखता हूं।'

हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि सभी पीएसयू एक जैसे नहीं हैं। एमओएसएल ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, 'केवल वही पीएसयू संपत्ति तैयार कर रहे हैं जिन्हें निजी क्षेत्र से न्यूनतम प्रतिस्पद्र्धा का सामना करना पड़ता है।' ये निवेशकों के लिए प्रासंगिक हैं। गेल, पावर ग्रिड कॉरपोरेशन, एसबीआई, एलआईसी हाउसिंग, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स, कोचीन शिपयार्ड, पेट्रोनेट एलएनजी और एनबीसीसी का एकाधिकार है या ये अपने क्षेत्र में बाजार के मुखिया हैं। ये शेयर परिचालन के आकार और दायरे के लिहाज से निवेशकों में खासतौर पर विदेश में रहने वाले निवेशकों में अपनी अपील रखते हैं। 
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