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मध्यस्थता समझौते का हमेशा लिखित होना जरूरी नहीं

एम जे एंटनी /  November 25, 2018

मध्यस्थता समझौते का किसी अनुबंध में स्पष्ट रूप से लिखित और हस्ताक्षरित होना जरूरी नहीं है लेकिन दोनों पक्षों के बीच हुए पत्राचार में यह नजर आना चाहिए। उच्चतम न्यायालय ने पीईसी लिमिटेड बनाम ऑस्टबल्क शिपिंग मामले में सुनाए अपने फैसले में यह टिप्पणी की है। 

दिल्ली उच्च न्यायालय एवं मध्यस्थता अधिकरण के फैसले को चुनौती देने वाली अपील को खारिज करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि मध्यस्थता समझौते को इस मामले में लागू इंग्लिश कानून से निर्देशित चार्टर पार्टी में देखा जा सकता है। न्यायालय ने मध्यस्थता एवं मेलमिलाप अधिनियम की दूसरी अनुसूची में शामिल 'लिखित में समझौता' शब्दावली की व्याख्या करते हुए कहा कि इसका दायरा काफी व्यापक है।

उसने यह भी कहा कि विदेशी अदालत के निर्णय पर अमल के लिए दायर अर्जी को तब तक खारिज नहीं किया जा सकता है जब तक मौलिक निर्णय या उसकी प्रामाणिक प्रतिलिपि भी उसके साथ संलग्न न हो। अधिनियम की धारा 47 में यह प्रावधान है कि एक विदेशी अदालत के फैसले पर अमल के लिए अर्जी लगाने वाले पक्ष को साथ में कुछ खास तरह के दस्तावेज लगाना 'होगा'। अदालत ने इस 'होगा' को 'सकता है' में तब्दील करते हुए कहा कि ऐसा केवल अर्जी लगाने के शुरुआत में ही हो सकता है।

एनबीसीसी के खिलाफ शुल्क कटौती में जांच 

दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक फैसले में कहा है कि केंद्रीय उत्पाद खुफिया निदेशालय (डीजीसीईआई) के उत्पाद शुल्क अधिकारियों का क्षेत्राधिकार पूरे देश में है और वे किसी भी कंपनी के खिलाफ सेवा कर संबंधी मामलों में नोटिस भेजने के अलावा जांच कर सकते हैं। न्यायालय ने सार्वजनिक उपक्रम नैशनल बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कंपनी (एनबीसीसी) बनाम भारत संघ मामले में यह फैसला सुनाया है। सरकार के लिए निर्माण कार्य करने वाली एनबीसीसी ने डीजीसीईआई की तरफ से भेजे गए नोटिस को चुनौती दी थी। इस नोटिस में एनबीसीसी की सभी शाखाओं पर सेवा कर चोरी के आरोपों की जांच की बात कही गई थी। राज्यों और विभिन्न आयुक्त कार्यालयों में एनबीसीसी के88 सेवा कर पंजीकरण दर्ज हैं और उसी के हिसाब से यह अलग-अलग रिटर्न दाखिल करती है। 

इसी हिसाब से एनबीसीसी को अलग आयुक्त कार्यालयों से नोटिस भेजे गए। एनबीसीसी की दलील थी कि वित्त अधिनियम असामान्य स्थिति को छोड़कर केंद्रीकृत जांच की अनुमति नहीं देता है। दूसरी तरफ जीसीईआई का कहना था कि केंद्रीकृत जांच करनी जरूरी है क्योंकि देश भर में एक ही मसले पर अलग-अलग जांच करने से असुविधाजनक स्थिति उत्पन्न होगी और समय एवं धन की बरबादी होगी। अदालत ने एनबीसीसी की याचिका खारिज करने के साथ ही उसे नोटिस के मुताबिक कदम उठाने को भी कहा है।

चेक बाउंस में अभियोजन जारी रखने का फैसला 

निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स ऐक्ट के तहत चेक बाउंस होने के मामले में चल रहा अभियोग नोटिस भेजने में अनियमितता के बावजूद नहीं रुकेगा। दिल्ली उच्च न्यायालय ने डीएससी लिमिटेड बनाम डीजे बिल्डकॉन लिमिटेड मामले में कहा कि अनियमितता होना अभियोग के लिए कोई घातक बिंदु नहीं है। 

इस मामले में चेक पर डीएससी के एमडी ने हस्ताक्षर किए थे। चेक के बाउंस होने पर डीजे बिल्डकॉन  जारीकर्ता कंपनी को नहीं बल्कि उसके एमडी को ही नोटिस भेजा। इस मामले में आपराधिक वाद के लिए जब डीएससी को समन भेजा गया तो वह इसे निरस्त कराने के लिए उच्च न्यायालय चली गई। 

उसकी दलील थी कि वैधानिक नोटिस उसे नहीं बल्कि बैंक खाताधारक एमडी को भेजा गया था। इसके जवाब में डीजे बिल्डकॉन ने कहा कि डीएससी के एक वैध इकाई होने से उसके एमडी को भेजा गया नोटिस कंपनी को ही नोटिस माना जाएगा। न्यायालय ने इससे सहमति जताते हुए कहा कि किसी कंपनी को नोटिस भेजने का मतलब यही होता है कि मामला उसके निदेशकों के संज्ञान में आ जाए।

ट्रेडमार्क : स्कॉल ब्रुअरीज की याचिका खारिज

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने बीयर निर्माता कंपनी स्कॉल ब्रुअरीज लिमिटेड की याचिका पर डिजाइन एवं ट्रेडमार्क की नकल मामले में सोम डिस्टिलरीज ऐंड ब्रुअरीज के खिलाफ फौरी रोक लगाने से इनकार कर दिया है। 

स्कॉल का कहना था कि उसने बीयर की बोतलों का डिजाइन पंजीकृत कराया हुआ है लेकिन प्रतिद्वंद्वी कंपनी सोम डिस्टिलरीज कबाड़ बाजार से ऐसी बोतलें खरीदकर उसे ब्लैक फोर्ट नाम से बेच रही है। स्कॉल के मुताबिक सोम डिस्टिलरीज का यह कदम डिजाइन एवं ट्रेडमार्क नियमों का उल्लंघन है और इससे उपभोक्ताओं को भी गफलत में डालने की कोशिश की जा रही है। हालांकि न्यायालय ने कहा कि इस आवेदन के निचली अदालत में विचाराधीन होने से इस पर तत्काल रोक लगाने की कोई वजह नहीं है। न्यायालय ने दो महीनों के भीतर इस वाद का निपटारा करने का निर्देश देते हुए कहा है कि इसमें कोई भी स्थगन नहीं होना चाहिए।

बंबई उच्च न्यायालय को दोबारा सुनवाई का निर्देश 

उच्चतम न्यायालय ने एक श्रम विवाद में बंबई उच्च न्यायालय को 'रिकॉर्ड के आधार पर गलती करने का दोषी' बताते हुए कहा कि वह एक दशक पुराने इस मामले की दोबारा सुनवाई करे। गोदरेज ऐंड बॉएस मैन्युफैक्चरिंग कंपनी बनाम इंजीनियरिंग वर्कर्स एसोसिएशन मामले में उच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र औद्योगिक विवाद अधिकरण के फैसले को बरकरार रखा था।

यह मामला अनुबंधित श्रमिकों को नियमित करने और उन्हें स्थायी कर्मचारियों के समान वेतन देने से संबंधित था। अधिकरण ने पहले अनुबंधित कर्मचारियों की अर्जी खारिज कर दी लेकिन बाद में प्रबंधन के खिलाफ फैसला दिया। उच्च न्यायालय में भी इसके बरकरार रहने के बाद प्रबंधन ने उच्चतम न्यायालय में अपील की। सर्वोच्च अदालत ने पाया कि तथ्यों को लेकर उच्च न्यायालय भ्रमित हो गया और संदर्भ के बजाय उसने गलती से औद्योगिक अधिकरण के फैसले के कार्यशील पहलू का उल्लेख कर दिया।

इस तरह उच्च न्यायालय ने फैसले के कार्यशील पहलू को संदर्भ मान लिया। इस आधार पर अदालत ने गोदरेज की अपील स्वीकार कर ली। उच्च न्यायालय की गलती होने से मामला एक बार फिर उसी के पास भेज दिया गया है।

विधवा ने सड़क हादसे में मुआवजे का केस जीता

सड़क हादसे में जान गंवाने वाले शख्स की विधवा और उसके दो बच्चों को मुआवजा देने का निर्देश उच्चतम न्यायालय ने दिया है। करीब 16 साल पहले हुए हादसे में 25 वर्षीय युवक को टक्कर मारने वाले ट्रक ड्राइवर के खिलाफ आपराधिक मामला चल रहा है लेकिन बीमा कंपनी ने यह दलील दी थी कि ड्राइवर की पहचान या हादसे के बारे में कोई सुराग नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने विमला बनाम नैशनल इंश्योरेंस कंपनी मामले में दायर अपील पर सुनाए अपने फैसले में कहा है कि मोटर हादसा विवाद अधिकरण और उच्च न्यायालय का रवैया कानून के मुताबिक नहीं था। यहां तक कि उच्च न्यायालय ने अपील खारिज करने की वजह भी नहीं बताई थी। बीमा कंपनी को छह फीसदी ब्याज के साथ 11.27 लाख रुपये देने का निर्देश दिया गया है।
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