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केसीआर का पिछड़ी, अनसूचित जनजातियों से ढीला गठजोड़

आदिति फडणीस /  11 25, 2018

यह विचार इतना सरल है कि हास्यास्पद लगता है। तेलंगाना राष्ट्र समिति की अगुआई में व्यापक आंदोलन के बाद जब के चंद्रशेखर राव नए राज्य के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने फैसला किया कि उन्हें आंदोलनकारी पार्टी टीआरएस को शांतिकाल की पार्टी बनाना होगा। इस आंदोलन ने अपना लक्ष्य हासिल कर लिया था। उन्हें उन लोगों के लिए नए लक्ष्य तय करने थे, जिन्होंने पार्टी को समर्थन किया था। 

उन्होंने दूसरों के विचारों को अपनाया, टीआरएस में नियंत्रण एवं आदेश का खाका तैयार किया और आंध्र प्रदेश के सबसे ज्यादा करिश्माई नेता नंदमूरि तारक रामाराव या एनटी रामारावके नक्शेकदम पर चलने का फैसला किया। टीआरएस को एक पोलितब्यूरो चलाता है, जिसके अध्यक्ष खुद चंद्रशेखर राव हैं। हालांकि आम बातचीत में राव को 'सुप्रीमो' कहा जाता है। 

एनटी रामाराव कम्मा जाति के थे। इस जाति की आबादी थोड़ी है, लेकिन यह अत्यधिक प्रभावशाली जमींदार जाति है। इसकी बहुलता मुख्य रूप से तटीय आंध्र प्रदेश में है। उन्हें एक व्यापक सामाजिक गठजोड़ तैयार करने के लिए जाना जाता है, जिसके मुख्य विरोधी रेड्डी जमींदार थे। रेड्डी जमींदारों को कांग्रेस समर्थक माना जाता है। एनटीआर ने तेलुगू आत्म गौरवम (अस्मिता) का नारा दिया। उन्होंने तेलुगू अस्मिता से खिलवाड़ करने को लेकर कांग्रेस पर करारा हमला किया। 

इस पहचान ने अपने भीतर विभिन्न जातियों को समाहित कर लिया, जिन्हें कांग्रेस से कई चीजों को लेकर शिकायतें थीं। कांग्रेस को रेड्डी नेताओं की पार्टी माना जाता था। ऐसा मुख्य रूप से एम चेन्ना रेड्डी के कारण माना जाता था, जो आंध्र प्रदेश के शुरुआती मुख्यमंत्रियों में से एक थे। एनटीआर का प्रयोग कुछ समय तक सफल रहा और उनके दामाद एन चंद्रबाबू नायडू भी तब तक सत्ता में बने रहे, जब तक कांग्रेस ने वाईएस राजशेखर रेड्डी की अगुआई में वापसी नहीं कर ली। आंध्र प्रदेश के बंटवारे से केसीआर और उनकी पार्टी उभरी है। 

खुद केसीआर वेल्लमा जाति के हैं। इस जाति की आबादी थोड़ी है और यह कम्मा जाति की तुलना में कम ताकतवर है। जब तक फौज जंग के मैदान में थी, तब तक जाति एक गौण मसला था। लेकिन अब यह जंग खत्म हो चुकी है, इसलिए केसीआर ने भी यह महसूस किया है कि उन्हें एनटीआर की तरफ एक सामाजिक गठजोड़ तैयार करना होगा। इसके लिए वह सरकारी नीति को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करना चाहते हैं। उनकी इस रणनीति का हिस्सा भेड़ों का वितरण और मछली बीज का प्रयोग शुरू करना है। 

तेलंगाना को शुष्क प्रदेश के रूप में जाना जाता है, जहां खेती बारिश पर निर्भर है। यहां सैकड़ों वर्षों से पानी को संचयन करने वाले जलाशय हैं, लेकिन धीरे-धीरे इन पर भूमाफियाओं ने कब्जा कर लिया है या वे सूख गए हैं। इससे नतीजतन भूमिगत जल स्तर भी नीचे चला गया है। ऐसे हालात में सबसे पहले भूमिहीन श्रमिकों ने पलायन शुरू किया। इसके बाद खुद किसानों ने पलायन शुरू किया। इससे मुंबई, मंगलूरु, बेंगलूरु और नागपुर में आबादी बढ़ी है। बहुत से प्रवासी पिछड़ी जातियों के थे, लेकिन इनमें सबसे ज्यादा तादादा अनुसूचित जाति  की थी। यह अनुसूचित जाति गड़रिया समुदाय से संबंधित है। 

वर्ष 2017 में केसीआर ने एक नई योजना शुरू की। उन्होंने मुफ्त में भेड़ों का वितरण किया। उन्होंने परंपरागत जलाशयों को गहरा करने और पानी से भरने का कंपनियों को ठेका दिया। मुफ्त भेड़ योजना के निहितार्थ को आसानी से समझा जा सकता है। इसी तरह की योजना राजनीतिक लाभ के लिए पड़ोसी राज्य तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे जयललिता ने चलाई थी। हालांकि जयललिता ने मुफ्त में बकरियों का वितरण किया था। 

इस समय राज्य में भेड़ों की संख्या एक करोड़ से अधिक है। केसीआर ने मुफ्त भेड़ योजना के तहत 45 लाख भेड़ों का वितरण किया है, जिससे गोल्ला और कुरुमा जैसी निचली जाति के समुदायों के दो लाख लोगों को फायदा मिला है। इसका मतलब है कि प्रत्येक लाभार्थी को 20 भेड़ और एक मेंढे का वितरण किया गया। 

जलाशयों की खुदाई कराने के भी अच्छे नतीजे मिले हैं। सेंटर ऑफ इकनॉमिक्स ऐंड सोशल स्टडीज के प्रो. ई रेवती ने कहा, 'किसानों को जलाशयों में गाद निकालने के लिए प्रोत्साहित किया गया। इस गाद का इस्तेमाल वे अपने खेतों में करते हैं।' इन जलाशयों को खाली और साफ करने के बाद उनमें फिर से पानी भरा जा रहा है। इन जलाशयों को भरने में गोदावरी का पानी इस्तेमाल किया जा रहा है। इसका अगर इस्तेमाल नहीं होता है तो यह समुद्र में चला जाता है क्योंकि तेलंगाना में कभी सिंचाई प्रणाली का विकास नहीं हुआ। 

इसके बाद राज्य सरकार ने मछली के बीज खरीदे और इन जलाशयों में डाल दिया। वर्ष 2011-12 में संयुक्त आंध्र प्रदेश के मत्स्यपालन विभाग का आवंटन 11.4 करोड़ रुपये था। यह आंध्र प्रदेश के 23 जिलों के लिए था। तेलंगाना सरकार द्वारा पेश किए गए बजट में सरकार ने एकीकृत मत्स्यपालन विकास योजना (आईएफडीसी) शुरू की थी, जिसके लिए 1,000 करोड़ रुपये आïवंटित किए गए। यह आवंटन केवल 10 जिलों के लिए किया गया था। 

मछुआरे पिछड़ी जातियों की सबसे निचली श्रेणी से ताल्लुक रखते हैं। आम तौर पर उन्हें गांव से बाहर रहना पड़ता है क्योंकि बाकी का गांव मत्स्यपालक समुदायों से आने वाली गंध और गंदगी को लेकर विरोध करता है। इस तरह कल्याणकारी योजनाओं के रास्ते पिछड़ी एवं अनुसूचित जातियों के ढीले गठजोड़ के साथ केसीआर 'डोरा' (भूस्वामियों) से मुकाबला करने जा रहे हैं। हालांकि वह खुद भी एक भूस्वामी है। 

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