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भरपूर उपज के बाद भी नाराज क्यों है किसान

शेखर गुप्ता /  November 25, 2018

'दीवार पर लिखी इबारत' एक ऐसा रूपक है, जिसे देश भर में घूमते हुए महसूस किया जा सकता है लेकिन जरूरी नहीं कि चुनावी मौसम में भी ऐसा हो। 'दीवार पर लिखी इबारत' इसलिए क्योंकि जब आप अपनी आंख और कान खुले रखकर तमाम शहरों और शहरीकृत होते इलाकों से गुजरते हैं तो आपको पता लगता है कि क्या कुछ बदल रहा है और क्या नहीं? 

ऐसा केवल दीवार पर लिखी इबारत से सामने नहीं आता बल्कि गुजरात के राजमार्गों पर ऊंची फैक्टरियां और कांचीपुरम में पेरियार की पुरानी आवक्ष मूर्ति का शिलालेख या फिर जैसा कि हमने चुनावी राज्य मध्य प्रदेश में देखा, मंडियों में सोयाबीन और खाद्यान्न की भरमार और बाहर ट्रैक्टर ट्रॉलियों की वैसी ही कतार जैसी कि पंजाब के राजमार्गों पर फसल के मौसम में भंडारगृहों के आसपास देखने को मिलती है।

मध्य प्रदेश सही मायनों में हरित क्रांति को सफल करने वाला राज्य है। बीते 10 वर्षों में सबसे अधिक कृषि विकास दर इसी ने हासिल की। राज्य के प्रमुख कृषि सचिव राजेश राजौरा ने मुझे बताया कि बीते पांच सालों से यह दर 14 प्रतिशत से अधिक है। टी एन नाइनन ने गत वर्ष 'साप्ताहिक मंथन' स्तंभ में लिखा था कि वर्ष 2010 से 2015 के बीच मध्य प्रदेश में कृषि उत्पादन 92 फीसदी बढ़ा।

मध्य प्रदेश जो कृषि प्रधान राज्य है और जहां 10 में से सात आदमी खेती का काम करते हैं तथा 77 फीसदी आबादी ग्रामीण है, वहां खेती में इस प्रदर्शन से लोगों को संतुष्ट होना चाहिए था। बीते 13 वर्ष से अधिक समय से प्रदेश के मुख्यमंत्री के पद पर काबिज और चौथे कार्यकाल के लिए प्रयासरत शिवराज सिंह चौहान की स्थिति मजबूत होनी चाहिए थी। परंतु ऐसा नहीं है और शिवराज को इस वर्ष अपनी सबसे कठिन लड़ाई लडऩी पड़ रही है। जबकि 2013 के पिछले चुनाव में उनकी पार्टी ने कांग्रेस को नौ फीसदी के मत अंतर से पीछे छोड़ा था।

मध्य प्रदेश में यात्रा के दौरान कुछ सवालों के जवाब जरूरी लगे। उदाहरण के लिए: किसानों में उत्साह के बजाय निराशा चुनावी मुद्दा क्यों है? किसानों की आत्महत्या के मामले में मध्य प्रदेश सबसे खराब स्थिति वाले राज्यों में क्यों है? किसान इतने नाराज क्यों हैं? कृषि क्षेत्र में एक दशक लंबा तेजी का दौर सजा क्यों बन गया? अगर आप आंख, कान और दिमाग खुला रखकर मध्य प्रदेश जाएं तो पता चलेगा कि देश के कृषि क्षेत्र के साथ दिक्कत क्या है?

इन सवालों का जवाब तलाशने हमें राजधानी भोपाल से 40 किलोमीटर दूर सीहोर पहुंचे जहां राज्य की सबसे बड़ी मंडियों में से एक स्थित है। आपको किसान, व्यापारी, बिचौलिया और सरकारी अधिकारी, सबसे अलग-अलग जवाब मिलेगा। हमने ट्रैक्टर ट्रॉली पर बैठे कसिान रामेश्वर चंद्रवंशी से सवाल किया।

चंद्रवंशी कहते हैं, 'हमें गेहूं की अच्छी कीमत के अलावा कुछ नहीं चाहिए। यह कीमत 3,000 रुपये क्विंटल होनी चाहिए। सोयाबीन की कीमत 4,000 रुपये प्रति क्विंटल होनी चाहिए।' जब मैं उन्हें याद दिलाता हूं कि यह कीमत तो बाजार मूल्य से 30 प्रतिशत से भी ज्यादा है तो वह कहते हैं कि उन्हें इससे कोई मतलब नहीं। वह कहते हैं कि इतनी कीमत मिलने पर वह और कुछ नहीं मांगेंगे, न ही शिकायत करेंगे। वह मुझे याद दिलाते हैं कि वे सक्षम किसान हैं, गरीबी रेखा के नीचे वाले नहीं।

चौहान सरकार ने इस समस्या को दूर करने का प्रयास किया है। गेहूं और धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में इजाफा किया गया है। इन फसलों पर बोनस भी दिया जा रहा है। सोयाबीन जैसी फसलें जो एमएसपी में नहीं आतीं उन पर प्रति क्विंटल 500 रुपये बोनस (भावांतर) दिया जा रहा है। यह राशि सीधे किसान के खाते में जाती है।

मूंग और उड़द का न्यूनतम समर्थन मूल्य व्यापारियों द्वारा चुकाई जाने वाली राशि से 60 से 90 फीसदी अधिक है। दाल की कीमतों में गिरावट उपभोक्ताओं के लिए वरदान है लेकिन किसानों के लिए आपदा से कम नहीं। इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च इन इंटरनैशनल इकनॉमिक रिलेशंस (इक्रियर) के कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी जैसे किसी भी व्यक्ति से पूछिए, वह आपको बताएंगे कि एमएसपी के बाजार मूल्य के दोगुना होने के बावजूद किसान की लागत नहीं निकल पाती।

यानी किसान जितनी ज्यादा उपज पैदा करता है, सरकार उतना ही पैसा चुकाती है लेकिन दोनों को केवल नुकसान होता है। गुलाटी और उनके साथियों द्वारा लिखा गया इक्रियर वर्किंग पेपर 339 बताता है कि उत्पादन को अगर बाजार के साथ सुसंगत न किया जाए तो केवल उसमें इजाफा करते जाना नुकसानदेह हो सकता है।

दालें इसका बेहतरीन उदाहरण हैं। वर्षों तक हमारा उत्पादन 30-40 लाख टन कमी का शिकार रहा। दुनिया भर में दाल के उत्पादन में कमी के चलते कीमतें बढ़ीं। खुदरा कीमतें तीन अंकों में पहुंचीं तो मीडिया में खबरें आने लगीं। सरकार ने एमएसपी बढ़ाई और दालों के लिए तकनीकी मिशन गठित किया जिससे उत्पादन बढ़ा। इक्रियर के आंकड़ों के मुताबिक इससे घरेलू मांग में 20 लाख टन का सुधार हुआ। इस बीच आयात जारी रहा क्योंकि उसके सौदे पहले ही कर लिए गए थे। परिणामस्वरूप देश में तीन करोड़ टन दाल का भंडार हो गया जबकि जरूरत 2.2-2.3 करोड़ टन की थी। चूंकि  आयात शुल्क शून्य था इसलिए आयातित दाल की कीमत एमएसपी से आधी रहती।

अगर दाल से आंख नहीं खुलती है तो मध्य प्रदेश में प्याज और लहसुन का उदाहरण हमारे सामने है। गत वर्ष मंदसौर जिले में किसान आंदोलन पर पुलिस की गोलीबारी में छह किसान मारे गए थे। प्याज की कीमतें गिरकर एक रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई थीं जिसकी वजह से क्षेत्र में नाराजगी थी। गोलीकांड में मौतों के बाद घबराई सरकार ने कहा कि वह सारा प्याज 8 रुपये प्रति किलो की दर पर खरीदेगी। मंदसौर में ट्रैक्टर ट्रॉलियों की 10 किमी लंबी कतार लग गई और नासिक जैसी दूरदराज जगहों से भी किसान अपना प्याज बेचने आ गए।

सरकार को पता ही नहीं था कि इस स्थिति से कैसे निपटा जाए। भंडारण की व्यवस्था न होने से प्याज सडऩे लगा इसलिए उसे दो रुपये प्रति किलो के भाव से ठिकाने लगाया गया। मध्य प्रदेश के करदाताओं को 785 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। इस वर्ष लहसुन के साथ यही होने वाला है। उसकी कीमतें सात रुपये प्रति किलो तक गिर गई हैं जबकि किसान की लागत 15 से 20 रुपये प्रति किलो आती है। हम इतने अजीब हैं कि लहसुन कीमतें औंधे मुंह गिरने के बावजूद चीन से उसका आयात कर रहे हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि आधी सरकार खेती पर ध्यान देती है और आधी उपभोक्ता मूल्य पर और ये दोनों आपस में बातचीत नहीं करते।

सोयाबीन मध्य प्रदेश की प्रमुख फसल है। सीहोर तथा अन्य मंडियों में सोयाबीन की बंपर उपज देखी जा सकती है। एक वक्त था जब भारत सोयाबीन पशु आहार का प्रमुख निर्यातक था। अमेरिका सबसे बड़ा सोयाबीन उत्पादक था लेकिन यह अन्य देशों से मुकाबला नहीं कर सका क्योंकि यहां का सोयाबीन ज्यादा दिन टिकता नहीं था और वह जीन संवद्र्धित था। अधिकांश देशों को जीन संवद्र्धित फसल नहीं चाहिए।

चुनिंदा यूरोपीय देशों को छोड़कर अधिकांश सोयाबीन पशु आहार आयातकों ने जीएम फसलों को स्वीकार कर लिया है। इनमें दुनिया का सबसे बड़ा आयातक चीन भी शामिल है। दुनिया के  तीन सबसे बड़े सोयाबीन उत्पादक अमेरिका, ब्राजील और अर्जेंटीना जीएम फसल उगाते हैं। भारत उनका मुकाबला नहीं कर सकता। यहां जीएम फसल की इजाजत नहीं है। नतीजतन, सोयाबीन का रकबा और कीमत घट रहे हैं और निर्यात समाप्तप्राय है। संभव है अब सरकार ईरान के कच्चे तेल के बदले कुछ सोयाबीन उसे दे सके।

मध्य प्रदेश से निकले सबक एकदम सहज हैं। राजनेताओं को उपज बढ़ाने से कोई लाभ नहीं होगा जब तक कि वे कृषि को बाजार से नहीं जोड़ते। पैसे बांटने से हल नहीं निकलेगा। एमएसपी बढ़ाना, खुदरा कीमतों में बढ़ोतरी की गारंटी नहीं है। क्या कोई सरकार यह चाहती है कि खाद्य कीमतों में इजाफा हो? नहीं क्योंकि इसका असर उपभोक्ताओं पर पड़ता है। एक चतुर राजनेता कृषि को बाजार से जोड़ेगा और खाद्य प्रसंस्करण, खुदरा शृंखला, निजी क्षेत्र के भंडारण आदि में निवेश की दिशा में काम करेगा। इसके अलावा वायदा बाजारों की शुरुआत की जाएगी। मध्य प्रदेश की हकीकत तो यही बता रही है।
Keyword: Madhya Pradesh, MSP, Agriculture, Soyabean, Crop, Green Revolution,
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