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अनुपयुक्त उत्साह

संपादकीय /  November 25, 2018

आयकर विभाग पिछले कुछ समय से उन गैरसूचीबद्ध कंपनियों पर धावा बोलने में लगा है जो बढ़ी दरों पर शेयर जारी करती हैं। यह आयकर अधिनियम 2012 में संशोधन कर धारा 56(2)8(बी) जोडऩे के बाद किया जा रहा है। इस दुरुपयोग विरोधी प्रावधान के मुताबिक ऐसे प्रीमियम के रूप में किए गए निवेश को, जिसे करने वाला, कर अधिकारियों को संतुष्ट न कर सके, आय माना जाएगा। यह प्रावधान तब शामिल किया गया जब 2जी दूरसंचार लाइसेंस के विवादास्पद वितरण के मामले में शामिल होने को लेकर गैर सूचीबद्ध कंपनियों का नाम जोर-शोर से उछला था और काफी शोर हुआ था। परंतु इसे लेकर आयकर विभाग की सक्रियता ने अब स्टार्टअप क्षेत्र की चिंताओं में इजाफा कर दिया है। 

यह वह क्षेत्र है जहां पहले किए गए मूल्यांकन पर अलग-अलग तरह के प्रीमियम या रियायत पर कई दौर की फंडिंग होती है। अब ऐसा प्रतीत हो रहा है कि कंपनी मामलों के मंत्रालय ने भी इसमें साथ देना शुरू कर दिया है। खबरों के मुताबिक 2000 से अधिक स्टार्टअप को मंत्रालय की ओर से नोटिस मिला है। उनसे यह मांग की गई है कि वे बताएं कि उनके मूल्यांकन में पहले की फंडिंग की तुलना में गिरावट क्यों आई है? कर विभाग पहले केवल उन स्टार्टअप को लेकर चिंतित था जिनमें निवेश ऐंजल निवेशकों की ओर से आता है। परंतु मंत्रालय की रुचि हर प्रकार के निवेश में है। साफ जाहिर है कि इस क्षेत्र में हस्तक्षेप की आशंका कम होने के बजाय बढ़ रही है।

इसमें दो राय नहीं है कि मंत्रालय का इरादा यह देखना है कि कहीं इस क्षेत्र का इस्तेमाल धनशोधन के लिए तो नहीं किया जा रहा है। यह सराहनीय लक्ष्य है। परंतु ऐसे लक्ष्य तय करते समय यह भी देखना चाहिए कि इन्हें हासिल करने के लिए जो तरीके अपनाए जाएंगे उनकी क्या कीमत चुकानी होगी। इस मामले में स्टार्टअप का साफतौर पर शोषण किया जा रहा है जिसकी अच्छी खासी कीमत चुकानी होगी। 

स्टार्टअप क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था के चुनिंदा अच्छे क्षेत्रों में शुमार है। दुनिया भर में स्टार्टअप परिदृश्य की प्रकृति ऐसी है कि किसी भी नई फर्म का मूल्यांकन करना आसान काम नहीं है। अलग-अलग निवेशकों द्वारा किए जाने वाले निवेश के बीच बाजार की परिस्थितियां ही नहीं बल्कि उसके अनुमान भी बदलते रहते हैं। ऐसे में स्टार्टअप के मूल्यांकन के लिए एक ठोस मानक और उसे पारदर्शी बनाए जाने की मांग बताती है कि इस क्षेत्र के कामकाज को लेकर सही समझ ही नहीं है। इसकी शुरुआती फंडिंग को लेकर समझ की कमी भी साफ नजर आती है।

ऐसी किसी भी कंपनी की पुनर्बिक्री के मूल्य के आकलन की पारदर्शी और स्थायी व्यवस्था तलाश कर पाना संभव नहीं है। वह भी इतनी छोटी कंपनियां जिनमें आधा दर्जन कर्मचारी भी शायद ही हों। यह समझ पाना ही मुश्किल है कि ये कंपनियां अपने मूल्यांकन का नियम आधारित मॉडल कैसे पेश करेंगी जो अधिकारियों को संतुष्ट कर सके।

सरकार अक्सर स्टार्ट अप इंडिया की अपनी पहल के लिए खुद की पीठ थपथपाती नजर आती है, उसे स्टार्टअप को नौकरशाही के मनमानेपन से बचाने के अपने वादे पर अमल करना चाहिए। पहला कदम तो यही होना चाहिए कि कंपनी मामलों के मंत्रालय पर लगाम लगाई जाए। परंतु तथाकथित ऐंजल टैक्स भी कम दुखदायी नहीं है जो ऐंजल इन्वेस्टिंग में 33 फीसदी राशि ले जाता है। इसकी नए सिरे से समीक्षा होनी चाहिए। मौजूदा मांगें खत्म की जानी चाहिए और विभिन्न कर पंचाटों में स्टार्टअप के खिलाफ जो मामले चल रहे हैं उन्हें रद्द किया जाना चाहिए। मंत्रालय या कर विभाग के मुकाबले मामूली या लगभग शून्य संसाधन वाले स्टार्टअप की प्रताडऩा का सिलसिला बंद होना चाहिए। 
Keyword: Start Up India, Company, Income Tax, Non LIsted, Listed Company, Licence, Ministry,
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