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किसानों को लाभ दिलाने के लिए बेहतर नीतियां जरूरी

संजीव मुखर्जी / नई दिल्ली November 25, 2018

साल 2018 में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून औसत से 9 प्रतिशत कम रहा। अगर इसमें 1-2 प्रतिशत की और गिरावट आ जाती तो भारतीय मौसम विभाग के मानकों के अनुसार साल 2018 को आसानी से कम मॉनसून वाले साल के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता था। आमतौर पर औसत वर्षा में इस स्तर की कमी के चलते उत्पादकता में काफी गिरावट आ जाती है। हालांकि 2018-19 के लिए पहला अनुमान एक अलग कहानी बयां करता है।

इसके अनुसार इस वर्ष खाद्यान्न उत्पादन करीब 14.2 करोड़ टन होगा जो 2017 के मुकाबले 0.6 प्रतिशत अधिक होने के साथ ही एक नया रिकॉर्ड भी होगा। हालांकि आगामी अनुमान इससे कम हो सकते हैं क्योंकि पहला अनुमान फसल का शुरुआती आकलन ही करता है और पिछले कई वर्षों के शुरुआती अनुमानों में बंपर फसल उत्पादन की बात कही गई थी। 

इसके बावजूद, अगर 2018 की खरीफ फसल में उत्पादन अधिक होता है तो साल 2016-17 से लगातार तीसरी बार खरीफ उत्पादन में बढ़ोतरी होगी। इससे पहले साल 2014 और 2015 में सूखा पड़ा था। इस बार फसल उत्पादन में बढ़ोतरी का एक बड़ा कारण यह है कि इस बार देश के पूर्वी और उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में मॉनसून कमजोर रहा लेकिन ये क्षेत्र कृषि उत्पादन में अधिक योगदान नहीं करते। हालांकि पश्चिमी और केंद्रीय भारत के कुछ क्षेत्रों में भी मॉनसून कमजोर रहा और देश के 31 प्रतिशत भाग में सामान्य से कम बारिश हुई। इसलिए, उत्पादन में बढ़ोतरी मॉनसून पर निर्भरता में कमी का भी संकेत देती है। 

जाने माने कृषि अर्थशास्त्री और इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट रिसर्च के निदेशक महेंद्र देव ने इंडियन सोसाइटी ऑफ एग्रीकल्चर इकनॉमिक्स की सालाना बैठक में कहा था कि कृषि क्षेत्र में बदलाव की दर (कोएफिशंट ऑफ वेरिएशन) धीरे धीरे कम हो रही हो। वर्ष 1961 से 1988 के बीच यह 2.76 प्रतिशत था जो 1988-2004 के बीच 1.87 प्रतिशत और 2004-2014 के बीच 0.75 प्रतिशत रहा। यह दिखाता है कि कृषि विकास की अस्थिरता में गिरावट आई और पिछले कई दशकों में काफी कम रही है।  

हालांकि, इन सबके बावजूद लगभग 50 प्रतिशत भारतीय कृषि क्षेत्र बारिश पर निर्भर है। वहीं, भंडारण सुविधाओं के अभाव तथा असंगत व्यापार नीति के चलते अधिशेष की स्थिति थोड़े समय के लिए ही अच्छी कही जा सकती है और कुछ महीनों में यहां फिर से कृषि उत्पाद का अभाव हो सकता है। 

उदाहरण के तौर पर 2018-19 के चीनी उत्पादन को देखा जा सकता है। कुछ महीने पहले 350 लाख टन से अधिक चीनी उत्पादन का अनुमान लगाया लगाया जा रहा था, जो अब लगभग 300 लाख टन हो गया है। यह ना सिर्फ कुछ महीने पहले के अनुमान से 17 प्रतिशत कम है, बल्कि पिछले साल के उत्पादन से भी 7 प्रतिशत कम है।  इसका एक बड़ा कारण यह है कि महाराष्ट्र के गन्ना उत्पादन क्षेत्र में इस साल काफी कम बारिश हुई और खेत में खड़ी फसल में भी संक्रमण हो गया। 

सरकारी स्रोतों से मिले पिछले 10 साल के आंकड़े बताते हैं कि गेहूं, चावल और कुछ सीमा तक चीनी के अलावा अधिकांश फसलों के उत्पादन में तेजी से उतार-चढ़ाव आया है, जो बारिश वितरण, कीमतें और कारोबारी माहौल पर निर्भर रहा। हालांकि दूध इसका एकमात्र अपवाद है। दालों की बात करें तो हालिया तेजी से पहले साल 2013-14 में भारत ने 192.5 लाख टन का रिकॉर्ड उत्पादन किया था लेकिन दो साल लगातार सूखा पडऩे से उत्पादन घट गया और 2014-15 में 171.5 लाख टन तथा 2015-16 में 163.5 लाख टन रह गया। 

परिणामस्वरूप, अरहर समेत कुछ दालों की कीमतें लगभग 200 रुपये किलो तक पहुंच गईं। हालांकि इसके बाद सरकार ने आयात तेज करने के कदम उठाए और भारत के लिए दाल उत्पादन हेतु कई अफ्रीकी राज्यों को सहायता उपलब्ध कराई। यह सब कुछ साल पहले हुआ है। दूसरे शब्दों में कहें तो अगर भारत तकनीक की सहायता से उत्पादन क्षेत्र में नए कदम नहीं उठाता है तो इस तरह की परिस्थितियां फिर से पैदा हो सकती हैं। अरहर दाल की एक नई किस्म पूसा-16 इसी तरह का एक उपाय है। 

मुद्दा यह है कि बात चाहे उत्पादन में कमी की हो या अधिशेष की, इन दोनों ही समस्याओं का अधिक कारगर तरीके से समाधान करने के लिए भारत की कृषि नीतियों को बेहतर बनाने की आवश्यकता है। अंतरराष्ट्रीय कृषि नीति शोध संस्थान (आईएफपीआरआई) के निदेशक (दक्षिण एशिया) पी के जोशी ने बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा, 'हमें अपनी नीतियों को उत्पादन केंद्रित होने के बजाए निर्यात केंद्रित बनाने की आवश्यकता है। भारत को निर्यात क्षमता वाले बाजार तथा उत्पादों को चिह्नित करना होगा तथा उसी फसल की बुआई करनी चाहिए।' उन्होंने कहा कि भारत के अधिशेष कृषि उत्पादों को निर्यात के लिए अफ्रीका तथा पूर्वी एशिया जैसे बाजारों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।  

देश के निर्यात टैरिफ और नीतियां उपभोक्ता केंद्रित होने के बजाए किसान केंद्रित होनी चाहिए। जोशी कहते हैं, 'हालांकि हमें आयात को लेकर थोड़ा सतर्क रहने की आवश्यकता है क्योंकि यहां पहले से ही उत्पादन अधिशेष है।'

हाल ही में बिज़नेस स्टैंडर्ड से बातचीत में आईसीआरआईईआर में इन्फोसिस चेयर प्रोफेसर अशोक गुलाटी ने कहा था कि अधिशेष से निपटने के लिए सरकार को आवश्यक वस्तु अधिनियम (ईसीए) समाप्त करना होगा और निजी क्षेत्र को भंडारण तथा खुदरा कारोबार की अनुमति देनी होगी। संविदा कृषि, जल्द खराब होने वाली वस्तुओं समेत बहुत समय से रूके कृषि मूल्य बाजार समितियां (एपीएमसी) में सुधारों पर भी काम करना होगा। वह कहते हैं, 'इसके बाद ही संरचनात्मक बदलाव की उम्मीद की जा सकती है। कम समय के लिए निर्यात सब्सिडी या सरकारी भंडारण सुविधा अधिक समय तक कारगर नहीं रह सकती।' आईजीआईडीआर के महेंद्र देव  कहते हैं, 'हमें कृषि के लिए उच्च कीमत वाली फसलों के विविधतापूर्ण उत्पादन का रूख करना होगा। लाभकारी कीमतें, बाजार और कारोबारी सुधार, कम निवेश पर अधिकर उत्पादकता और रसायन पर कम निर्भरता पर काम करना होगा।' 

देव कहते हैं कि कृषि क्षेत्र में लक्ष्य हासिल करने के लिए 5 'आई' में सुधार करना होगा, प्रोत्साहन (इंसेंटिव), निवेश (इंवेस्टमेंट), आधारभूत ढांचा (इन्फ्रास्ट्रक्चर), संस्थान (इंस्टीट्यूशन) और सूचना (इन्फॉर्मेशन)। 

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