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कपड़ा निर्यातकों को झेलनी पड़ेगी तंगी !

शुभायन चक्रवर्ती / नई दिल्ली November 25, 2018

कपड़ा निर्यात बाजार अंतत: अब सुधार की आस कर सकता है। तैयार वस्त्रों की विदेश जानी वाली खेपों में आखिरकार अक्टूबर में इजाफा हो गया। लेकिन जैसा कि विशेषज्ञों का मानना है कि निकट भविष्य में बहुत ज्यादा इजाफे  की उम्मीद नहीं है भले ही सबसे बुरा दौर खत्म हो चुका हो। 

कपड़े के सबसे बड़े वर्ग - तैयार वस्त्रों की विदेश जाने वाली खेप एक साल से ज्यादा की लगातार गिरावट के बाद अक्टूबर में 36 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ी है। व्यापार के समीक्षकों ने कहा कि पिछले छह महीनों के दौरान रुपये के निरंतर अवमूल्यन के साथ-साथ अमेरिका जैसे प्रमुख बाजारों में क्रिसमस की बिक्री के लिए शुरुआती आपूर्ति की मांग से अक्टूबर में इजाफा हुआ है। हालांकि इससे वास्तविक राजस्व वृद्धि की संभावना नहीं हैं जो पिछले महीने भी अपने निम्नतम स्तर पर रही।

दूसरी ओर निर्यातकों का कहना है कि अगले कुछेक महीनों तक दो अंकों का इजाफा बरकरार रखना मुश्किल होगा क्योंकि वियतनाम, बांग्लादेश और कंबोडिया के आक्रामक आपूर्तिकर्ताओं द्वारा लगातार पैठ की वजह से जल्द ही ऑर्डर की बुकिंग में गिरावट आ सकती है। इन्होंने भारत के निर्यातकों के ऑर्डर हड़प लिए हैं।

इन देशों में श्रम की लागत कम है। बहुत-से विनिर्माताओं ने अपना परिचालन इन देशों में स्थानांतरित कर लिया है। बांग्लादेश जैसे वस्त्रों के प्रमुख उत्पादकों को यूरोपीय संघ जैसे प्रमुख बाजारों में 'अल्प विकसित देश' के रूप में अपनी खास स्थिति के कारण व्यापारिक लाभ प्राप्त होता है। भारत के निर्यात में छठी सबसे बड़ी मद वस्त्र होते हैं। 2017-18 में भारत के कुल निर्यात में इनका योगदान लगभग पांच प्रतिशत रहा।  

भारत का लक्ष्य धागे और रेशे जैसे अन्य कपड़ा उत्पादों के निर्यात में वृद्धि करने का रहा है। सरकार ने इन वस्तुओं में अधिक व्यवस्थित व्यापार के लिए दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्रों के संगठन आसियान के साथ व्यापार बढ़ाया है। जैन ने कहा कि पिछले कुछ सालों से तैयार उत्पादों के साथ-साथ चीन की सस्ती सामग्री की आसियान बाजार में बाढ़ आ गई है।  भारतीय कपास वस्त्र निर्यात संवर्धन परिषद के कार्यकारी निदेशक सिद्धार्थ राजगोपाल ने कहा कि मांग में वैश्विक रूप से गिरावट रही और भारत भी इससे अछूता नहीं रहा। 
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