बिजनेस स्टैंडर्ड - बदलावों की पॉलिसी से सुधरता बीमा उद्योग
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बदलावों की पॉलिसी से सुधरता बीमा उद्योग

अद्वैत राव पालेपू /  November 23, 2018

देश में बीमा का उद्योग पिछले कुछ समय से काफी बदलावों से गुजर रहा है, लेकिन इस कैलेंडर वर्ष में वाकई इसमें क्रांतिकारी बदलाव हुए। बीमा पॉलिसी की बिक्री के नियम हों, वित्तीय सुधार हों, नियामक की निगरानी में सुधार हो या कृत्रिम बुद्घिमत्ता तथा ब्लॉकचेन तकनीक की बात हो, पूरा साल बीमा उद्योग के लिए उम्मीद एवं अनिश्चितताओं से भरा रहा है। इस उद्योग के आंकड़े वाकई उम्मीद जगाते हैं। वित्त वर्ष 2018 में जीवन बीमा उद्योग 2017 के मुकाबले 10.8 फीसदी बढ़ा है और उसका राजस्व 1.94 लाख करोड़ रुपये रहा है। सामान्य बीमा उद्योग 17.54 फीसदी बढ़ा है और उसका प्रीमियम राजस्व 1.5 लाख करोड़ रुपये रहा।  भारत के पूरे बीमा उद्योग का प्रीमियम राजस्व 2020 तक बढ़कर 280 अरब डॉलर होने का अनुमान है। इसके पीछे पिछले एक वर्ष में उठाए गए कई कदमों की अहम भूमिका रहेगी। 
 
स्वास्थ्य बीमा 
 
स्वास्थ्य बीमा क्षेत्र में पिछले कुछ समय में काफी हलचल हो रही है और सबसे बड़ा कदम प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (पीएम-जेेएवाई) की शुरुआत है, जिसके तहत 50 करोड़ लोगों को बुनियादी स्वास्थ्य बीमा मिलेगा। यह योजना संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार द्वारा 2008 में शुरू की गई राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना का बदला हुआ और बेहतर रूप है। पीएम-जेएवाई में प्रत्येक परिवार को 1,082 रुपये के सालाना प्रीमियम पर 5 लाख रुपये का स्वास्थ्य बीमा मिलेगा। इस योजना को लेकर हर तरफ चर्चा चल रही हैं। विश्लेषकों का कहना है कि सरकार पर इस योजना का खर्च चालू वित्त वर्ष में 200 अरब रुपये आएगा, जो आने वाले वर्षों में बढ़कर 500 अरब रुपये हो जाएगा। केंद्र सरकार इसमें 60 फीसदी और राज्य सरकारें 40 फीसदी हिस्सेदारी करेंगी। इस योजना को लागू करने का जिम्मा राज्यों का है, लेकिन ज्यादातर राज्य सरकारों ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत सेवाएं दे रही स्वास्थ्य बीमा कंपनियों के साथ अपने करारों को ही आगे बढ़ा लिया है। केवल कुछ राज्यों ने नई निविदा मंगाने का फैसला किया है और प्रीमियम दरों के निर्धारण में बाजार आधारित मॉडल चुना है। बाकी राज्य ट्रस्ट मॉडल के तहत ही पीएम-जेएवाई को क्रियान्वित कर रहे हैं। 
 
बहरहाल पीएम-जेएवाई न केवल बीमा उद्योग के लिए फायदेमंद रहेगी बल्कि यह स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए आवश्यक बुनियादी वित्तीय स्रोत भी मुहैया कराएगी। इसमें ज्यादा अस्पताल बेड, ज्यादा सुविधाएं और बेहतर प्रशिक्षित अस्पताल कर्मी आदि शामिल हैं।  बजाज आलियांज जनरल इंश्योरेंस कंपनी के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्याधिकारी तपन सिंघल इस योजना को अच्छा बताते हुए कहते हैं, 'इससे प्रत्येक नागरिक की औसत जीवन प्रत्याशा में पांच साल की बढ़ोतरी हो सकती है और स्वास्थ्य उद्योग में निवेश बढ़ सकता है। अब तक निजी उद्यमियों के लिए गांवों में अस्पताल बनाने पर मिलने वाला प्रतिफल बहुत कम था। अब प्रत्येक मरीज के पास 5 लाख रुपये का बीमा कवर होने से अस्पताल बनाने से मिलने वाला प्रतिफल काफी अधिक होगा। अगर हर साल स्वास्थ्य क्षेत्र में करीब 200 अरब रुपये का निवेश होगा तो अगले पांच से 10 साल में स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे पर बड़ा सकारात्मक असर होगा।'
 
पीएम-जेएवाई को चलाने वाली राष्ट्रीय स्वास्थ्य एजेंसी (एनएचए) ने 1,350 चिकित्सा पैकेजों की कीमत तय की है, जिनमें सर्जरी, मेडिकल और डे केयर इलाज का खर्च, दवा एवं जांच का खर्च शामिल हैं। इसमें अस्पताल इलाज से इनकार भी नहीं कर सकते।  हालांकि इस योजना पर शंका के बादल भी मंडरा रहे हैं। निजी अस्पताल चलाने वाली कंपनियां कह रही हैं कि कंपनियों का कहना है कि सर्जरी और इलाज का खर्च एनएचए के तय मानक से अधिक होता है। मगर सिंघल इस तर्क को खारिज करते हुए कहते हैं, 'जब हमें मिजोरम में ठेका मिला तो आठ अस्पताल जुड़े। अब किसी अस्पताल को कीमत कम लग सकती है और किसी को वही कीमत अच्छी लग सकती है। मगर बहुत से अस्पताल इसमें भागीदारी करने और आवश्यक बुनियादी ढांचा तैयार करने के इच्छुक हैं।'
 
इस राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजना के अलावा आईसीआईसीआई लोम्बार्ड, एसबीआई जनरल, आदित्य बिड़ला हेल्थ इंश्योरेंस या मैक्स बूपा जैसी कंपनियों ने भी विशेष स्वास्थ्य बीमा योजनाएं शुरू की हैं। ये उदाहरण के लिए कैंसर कवर, एंबुलेंस सेवाएं, ग्राहक की सुधरती सेहत के आधार पर प्रीमियम के नवीनीकरण पर लाभ, आयुर्वेदिक या होम्योपैथिक इलाज के लिए कवर मुहैया कराना आदि शामिल हैं। लेकिन खामियां मौजूद हैं, जिन पर भारतीय बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) काम कर रहा है। इनमें दांतों के इलाज और दवा पर जेब से होने वाला खर्च आदि शामिल हैं।
 
नियामक ने पिछले दो महीनों में सभी सामान्य और स्वास्थ्य बीमा कंपनियों को अधिसूचना जारी करते हुए कहा कि मानसिक बीमारी को शामिल करने वाली बीमा पॉलिसी बनाई जाए। हालांकि कंपनियां इस मामले में स्पष्टता चाहती हैं। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि मानसिक बीमारी को दवा, मनोवैज्ञानिक इलाज जैसे कई तरीकों से खत्म किया जा सकता है। इसलिए प्रीमियम की दर एकसमान नहीं हो सकती क्योंकि प्रत्येक मरीज की जांच और इलाज अलग-अलग होंगे। इसी तरह आईआरडीएआई ने अक्टूबर में एचआईवी और एड्स (रोकथाम एवं नियंत्रण) अधिनियम  2017 की अनुपालना में बीमा कंपनियों को एचआईवी/एड्स मरीजों को बीमा से मना नहीं करने का निर्देश दिया है। वर्ष 2017 में भारत में 21.4 लाख लोग एचआईवी और एड्स से संक्रमित थे। मगर बीमा कंपनियों का कहना है कि संबंधित आंकड़ों के अभाव में एचआईवी/एड्स बीमा पॉलिसी की कीमत तय करना चुनौतीपूर्ण होगा। 
 
जीवन बीमा 
 
जीवन बीमा बाजार में अब भी भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) का दबदबा है, लेकिन वित्त वर्ष 2003 में 98 फीसदी की इसकी हिस्सेदारी वित्त वर्ष 2018 में घटकर 67.4 फीसदी पर आ गई। जीवन बीमा कंपनियां चार तरह की योजनाएं मुहैया कराती हैं। पहली, टर्म या सुरक्षा योजनाएं हैं, जिनमें पॉलिसी की परिपक्वता या पॉलिसीधारक की मृत्यु होने पर उसके परिवार को एकमुश्त राशि मिलती है।  दूसरी बचत या निवेश योजनाएं हैं, जिनमें पॉलिसी की मियाद पूरी होने पर लाभ के रूप में एक निश्चित राशि मिलती है या पॉलिसी की अवधि के दौरान नियमित आमदनी मिलती है। तीसरी प्रकार की एंडोमेंट या सेवानिवृत्ति योजनाएं हैं, जो पॉलिसीधारक को सेवानिवृत्ति के बाद नियमित आमदनी का स्रोत मुहैया कराती हैं और उन्हें मासिक भुगतान करती हैं।
 
यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस प्लान (यूलिप) बीमा पॉलिसी का चौथा प्रकार है। यह एक निवेश फंड के रूप में काम करता है, जिसे पॉलिसीधारक चुन सकता है और उसका संपत्ति आवंटन पर नियंत्रण होता है। चुकाए जाने वाले प्रीमियम का एक हिस्सा कंपनी को मिलता है, जो उसकी एवज में ग्राहक को टर्म कवर मुहैया कराती है।  शेष प्रीमियम एक निवेश फंड में एकत्रित होता है, जिसे बॉन्डों, शेयरों या बाजार की अन्य प्रतिभूतियों में निवेश किया जा सकता है। पिछले कुछ समय से यूलिप की छवि खराब हो गई थी और विश्लेषकों का कहना है कि अब ग्राहकों में सुरक्षा योजनाओं और सेवानिवृत्ति योजनाओं का आकर्षण बढ़ रहा है। देश में एक बड़ी आबादी 25 से 50 साल के बीच है, जो अगले दो दशकों में सेवानिवृत्त होगी। इससे सुरक्षा और एंडोमेंट योजनाओं की बिक्री में इजाफा होगा। 
 
बीमा बाजार का भविष्य 
 
इरडा ने हाल में बीमा में 100 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को मंजूरी दी है। इससे पहले 2017 में बीमा कंपनियों में निजी इक्विटी निवेश के नियम लागू किए गए थे। इससे निश्चित रूप से घरेलू कंपनियों में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, विशेष रूप से समूह पॉलिसी या संस्थानों द्वारा खरीदे जाने वाले बीमा कवर में। इसकी वजह यह है कि विदेशी कंपनियां सीधे प्रतिस्पर्धा कर सकती हैं और भारतीय ग्राहक हासिल कर सकती हैं। लेकिन विदेशी बीमा कंपनी के साथ साझेदारी करने वाली बहुत सी निजी कंपनियों के ढांचे को लेकर अनिश्चितता पैदा हो सकती है।  अगले साल बीमा कंपनियां जोखिम आधारित पूंजी व्यवस्था की तरफ कदम बढ़ाएगा। पिछले साल नियामक ने एक 10 सदस्यीय संचालन समिति गठित करेगी, जो मार्च, 2021 तक नई जोखिम आधारित पूंजी व्यवस्था को लागू करने में मदद करेगी। इससे उन कंपनियों को मदद मिलेगी, जो जोखिम का प्रबंधन ठीक से कर लेती हैं।
Keyword: insurance, travel, tourism, health,,
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