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चुनाव-चुनाव में फर्क

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  November 23, 2018

इसमें कोई दो राय नहीं है कि तीन प्रमुख हिंदी भाषी राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में होने जा रहे विधानसभा चुनावों के नतीजों को अब से तकरीबन छह महीने बाद होने वाले लोकसभा चुनाव के पूर्वाभ्यास और पूर्वानुभव के रूप में देखा जाएगा। मेरा मानना है कि इस संबंध में राजनीतिक जानकारों को थोड़ी सावधानी बरतनी चाहिए क्योंकि राज्य और केंद्र के चुनाव को एक चश्मे से नहीं देखा जा सकता है। ऐसा इसलिए कि लोकसभा चुनाव में अभी भी मोदी फैक्टर बरकरार है। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को जो जबरदस्त जीत और भारी मत-प्रतिशत हासिल हुआ था, उसमें नरेंद्र मोदी मोदी एक बड़ा कारक बनकर उभरे थे। जबकि उससे करीब छह महीने पहले आयोजित 2013 के विधानसभा चुनावों में यह उतना बड़ा कारक नहीं था। इस बार भी विधानसभा चुनाव काफी हद तक राज्य स्तरीय मुद्दों मसलन सूखा आदि से प्रभावित होंगे जबकि आगामी लोकसभा चुनाव भी सन 2014 के चुनाव की तरह नेता केंद्रित हो सकते हैं। यानी, कहा जा सकता है कि लोकसभा चुनाव में भाजपा की स्थिति विधानसभा चुनावों की तुलना में कहीं बेहतर हो सकती है। 

 
फिलहाल जानकारों का यही कहना है कि राजस्थान में कांग्रेस को बढ़त हासिल है जबकि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में इन दोनों दलों के बीच बहुत करीबी मुकाबला है। अगर यह सही साबित होता है तो इसका अर्थ यह है कि इस विधानसभा चुनाव में मतदाताओं का रुख 2013 के पिछले चुनाव से काफी अलग होगा। परंतु अभी इस सवाल का जवाब सामने आना बाकी है कि मई में होने वाले संसदीय चुनाव में यह कितना असर डालेगा।  आंकड़े सारी कहानी साफ बयां कर रहे हैं। 2013 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को मध्य प्रदेश में 45 फीसदी और कांग्रेस को 36 फीसदी मत मिले थे। यानी अगर मत-प्रतिशत में 4 से 5 फीसदी का भी अंतर आया तो परिणाम काफी अलग हो सकते हैं। उस वक्त भाजपा को 165 और कांग्रेस को 58 सीट मिली थीं। सवाल यह है कि क्या इससे लोकसभा चुनाव की तस्वीर बदल सकती है? शायद नहीं। इसकी दो वजह हैं: पहला, भाजपा को 2014 के लोकसभा चुनाव में 55 फीसदी मत मिले थे जबकि कांग्रेस के मतों में मामूली गिरावट आई थी। यहां अगर कांग्रेस के पक्ष में 5 से 7 फीसदी का भी बदलाव आया तो भी लोकसभा चुनाव में उसके प्रदर्शन में कोई खास बदलाव नहीं आएगा। भाजपा को 2014 की तरह 29 में से 26 लोकसभा सीट भले ही न मिलें लेकिन फिर भी उसका प्रदर्शन अच्छा रहेगा। 
 
राजस्थान में किस्सा अलग हो सकता है। 2013 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 45 फीसदी और कांग्रेस को 33 फीसदी मत मिले थे। कुछ ही महीने बाद हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा को 51 फीसदी और कांग्रेस को 30 फीसदी मत मिले। अगर राजनीतिक विशेषज्ञों का भरोसा करें तो विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सीधे तौर पर आगे चल रही है और वह भाजपा से 8-10 प्रतिशत वोट झटक सकती है। इसका असर लोकसभा चुनाव पर अवश्य होगा। 2014 में जहां भाजपा को 25 सीट मिली थीं, वहीं कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली थी। इस बार हालात यकीनी तौर पर अलग होंगे। 
 
छत्तीसगढ़ की बात करें तो 2013 में भाजपा और कांग्रेस के बीच कांटे की लड़ाई थी। भाजपा को 41 फीसदी और कांग्रेस को 40 फीसदी वोट मिले थे। इसके बावजूद भाजपा को बहुमत मिला था। परंतु 2014 के आम चुनाव में भाजपा और कांग्रेस का मत प्रतिशत क्रमश: 49 और 38 फीसदी हो गया। 11 लोकसभा सीटों में से भाजपा को 10 पर जीत मिली। मौजूदा विधानसभा चुनाव में भी मामला करीबी रहने की उम्मीद है लेकिन मोदी फैक्टर के चलते लोकसभा चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन बेहतर रहने की उम्मीद है। 
 
लब्बोलुआब यह है कि मौजूदा विधानसभा चुनावों में मतदान का रुझान राजनीतिक विश्लेषकों के अनुमान के मुताबिक हो सकता है लेकिन मध्य प्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस के पक्ष में झुकाव का यह अर्थ नहीं कि छत्तीसगढ़ में भी ऐसा ही होगा। अगर कांग्रेस को विधानसभा चुनाव में इन तीन में से दो राज्यों में सत्ता हासिल भी हो जाती है, तो भी भाजपा को लोकसभा चुनाव में इन राज्यों में अधिकांश सीटों पर जीत मिल सकती है। हालांकि यह जीत सन 2014 में हासिल 65 में से 61 सीटों जैसी एकतरफा नहीं होगी।
Keyword: election, chattisgarh, telangana, rajsthan, madhya pradesh,,
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