बिजनेस स्टैंडर्ड - राजकोषीय घाटा पाटने के पुराने नुस्खों पर मंथन
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राजकोषीय घाटा पाटने के पुराने नुस्खों पर मंथन

अरूप रायचौधरी / नई दिल्ली November 23, 2018

नरेंद्र मोदी सरकार वित्त वर्ष 2018-19 में राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 3.3 प्रतिशत के लक्ष्य पर रखने के लिए जूझ रही है। ऐसे समय में यह कवायद की जा रही है जब वस्तु एवं सेवा कर अनुमान से एक लाख करोड़ रुपये कम रह सकता है और प्रत्यक्ष कर वसूली में होने वाली बढ़ोतरी और राजस्व के अन्य स्रोतों से संभवत: इसकी भरपाई नहींं हो पाएगी।  अधिकारियों व विशेषज्ञोंं का कहना है कि लक्ष्य पूरा करना सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार पहले से जांचा परखा तरीका अपना सकती है, जिसमें अतिरिक्त सब्सिडी बोझ को आगे बढ़ाना, मंत्रालयों से बगैर खर्च किया गया धन वापस लेना, व्यय की कुछ प्रविष्टियों के तरीकों में बदलाव आदि जैसे नुस्खे शामिल हैं। 
 
केयर रेटिंग में मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस ने कहा, 'सरकार को एक फायदा यह है कि आपका बही खाता व्यवस्था नकदी आधारित है। ऐसे में अगर हम किसी योजना के लिए भुगतान नहीं करते हैं, भले ही वह बजट में शामिल है, तो वह बजट में नहीं दिखेगा।'  सबनवीस ने कहा, 'अगर सरकार घाटे को लेकर दबाव में है तो वह वह हमेशा नकदी भंडार चला सकती है।' एक अधिकारी ने कहा, 'वित्त मंत्रालय वही करेगा, जो वह हमेशा करता आया है। तेल व उर्वरक सब्सिडी का भुगतान हमेशा अगले वित्त वर्ष की पहली तिमाही तक के लिए टाल दिया जाता है। इन्हें तेल विपणन कंपनियो व उर्वरक कंपनियों के ऑडिट किए खातों में जारी किया जाता है।' 
 
केंद्र सरकार ने चालू वित्त वर्ष में पेट्रोलियम सब्सिडी 250 अरब रुपये रहने का अनुमान लगाया था। बहरहाल सितंबर के अंत तक के पेट्रोलियम मंत्रालय के आंतरिक अनुमान के मुताबिक यह बढ़कर 460 अरब रुपये हो जाएगा, जो करीब 85 प्रतिशत बढ़ोतरी है।  हालांकि अब पेट्रोलियम के वैश्विक दाम कम हो रहे हैं, ऐसे में पेट्रोलिमय सब्सिडी के अनुमान नीचे आ सकते हैं, लेकिन यह अभी भी बजट में लगाए गए अनुमान की तुलना में बहुत ज्यादा रहेगा। बिनजेस स्टैंडर्ड ने इसके पहले खबर दी थी कि सरकार अतिरिक्त तेल सब्सिडी के 200 अरब रुपये का भुगतान वित्त वर्ष 2019-20 की पहली तिमाही पर टालने की योजना बना रही है। 
 
वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग ने अन्य विभागों से वह पैसे वापस ले सकता है, जिसका आïवंटन तो किया गया था, लेकिन मंत्रालयों ने उसे खर्च नहीं किया है। यह राशि अलग अलग साल अलग अलग होती है।  वित्त मंत्री अरुण जेटली ने राजकोषीय घाटे के लक्ष्य पर स्थिर रहने को लेकर सार्वजनिक रूप से प्रतिबद्धता जताई थी और कहा था कि पूंजीगत व्यय से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। अधिकारियों ने कहा कि पूंजीगत व्यय में कोई कटौती नहीं होगी। लेकिन प्रशासनिक व्यय मेंं कुछ बचत का अनुमान है। 
 
व्यय विभाग भी यह सुनिश्चित कर रहा है कि नए आवंटन न्यूनतम रखे जाएं। उसने बजट पूर्व कवायद के तहत सभी मंत्रालयों के साथ अभी हाल ही में बैठक संपन्न की है। यह बैठकें 2018-19 के पुनरीक्षित अनुमान और 2019-20 के बजट अनुमान पर फैसला करने के लिए की गई थीं। मंत्रालयोंं की जो भी अतिरिक्त मांग होगी, उसके लिए पूरक अनुदान मांग के रूप में शीतकालीन सत्र में संसद की मंजूरी लेनी होगी। उदाहरण के लिए ग्रामीण विकास मंत्रालय ने 550 अरब रुपये बजट अनुमान के अतिरिक्त मांग की है क्योंकि वजह महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम (मनरेगा) के तहत अतिरिक्त नौकरियों का सृजन करना चाहता है, क्योंकि मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में सूखे जैसी स्थिति और केरल में बाढ़ से स्थिति खराब है। 
 
बहरहाल सूत्रों ने कहा कि व्यय विभाग ने ग्रामीण विकास मंत्रालय से कहा है कि वह अतिरिक्त व्यय जरूरतों को अन्य योजनाओं में आंतरिक बचत से पूरी करे।  अन्य तरीका व्यय को अग्रिम के रूप में पुनर्वर्गीकृत करना है। एक पूर्व सरकारी अधिकारी ने पुष्टि की कि इसके पहले इस्तेमाल किए गए एकाउंटिंग ट्रिक का इस्तेमाल किया जाएगा। उन्होंने कहा, 'यह फिर किया जा सकता है। आप किसी विभाग या डिवीजन को राशि आवंटित करते हैं और साल के अंत में आप उसे वापस ले लेते हैं।' 
 
2017-18 में भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) ने इस पुनर्वगीकरण के माध्यम से वित्त मंत्रालय को 500 अरब रुपये आवंटन वापस कर दिया था। यह राशि एफसीआई को पहले पूंजीगत व्यय के रूप में वर्गीकृत करके दी गई थी, लेकिन बाद में इसे अग्रिम के रूप मेंं बदल दिया गया था, जिसे चालू वित्त वर्ष के भीतर वापस करना होता है। 
Keyword: fiscal deficit, ICRA, GDP, राजकोषीय घाटा,
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