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टल गई एफएमसीजी की कीमत बढ़ोतरी

विवेट सुजन पिंटो / मुंबई November 23, 2018

पिछले डेढ़ महीने में कच्चे तेल की कीमतों में आई 30 फीसदी की गिरावट ने महंगाई के दबाव का सामना कर रही एफएमसीजी कंपनियों को राहत प्रदान की है। कच्चे तेल में नरमी के चलते रुपया-डॉलर की दरें भी घटी हैं, जिससे उन कंपनियों ने अपने उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी अभी टाल दी है, जो पहले कीमत बढ़ाने पर विचार कर रही थी। जुलाई-अगस्त में ज्यादातर एफएमसीजी कंपनियों ने चुनिंदा श्रेणियों में कीमतें 2-3 फीसदी की बढ़ोतरी की थी और कीमतों में दूसरे दौर की बढ़ोतरी पर विचार कर रही थी। डाबर इंडिया के मुख्य कार्याधिकारी सुनील दुग्गल ने कहा, कीमत बढ़ोतरी अभी टाल दी गई है। उन्होंने कहा, महंगाई का परिदृश्य अभी स्थिर है और कच्चे तेल में उतारचढ़ाव और मुद्रा के उच्चस्तर पर रहा था, इसे देखते हुए यह अच्छी खबर है।
 
अक्टूबर में कच्चे तेल की कीमतें 86.09 डॉलर प्रति बैरल को छू गई थी, वहीं डॉलर के मुकाबले रुपया करीब 73-74 पर पहुंच गया था। जुलाई में देश की सबसे बड़ी एफएमसीजी कंपनी हिंदुस्तान यूनिलीवर (एचयूएल) ने कच्चे तेल और मुद्रा में उतारचढ़ाव को इस क्षेत्र के लिए प्रमुख जोखिम बताया था। कंपनी ने कहा था कि भविष्य के लिहाज से इन चीजों पर निगरानी महत्वपूर्ण होगी। पिछले महीने कंपनी की दूसरी तिमाही के नतीजे के दौरान यही बातें दोहराई गई थी। एचयूएल के चेयरमैन व एमडी संजीव मेहता ने कहा कि कीमतों में बढ़ोतरी को लेकर वह सतर्क रहेगी। मेहता ने कहा था, कीमत बढ़ोतरी से पहले हम सभी चीजों पर विचार करेंगे। महंगाई के दौर में भी यह रणनीति बनी रहेगी।
 
लेकिन अब विश्लेषक कह रहे हैं कि एचयूएल और इसकी समकक्ष कंपनियां कीमत बढ़ोतरी टाल सकती हैं क्योंकि कच्चे तेल और मुद्रा की तरफ से दबाव काफी हद तक कम हुआ है। डॉलर के मुकाबले रुपया अब 70.70 पर है, जो पिछले महीने 74.39 पर पहुंच गया था। ब्रोकरेज फर्म शेयरखान के वरिष्ठ शोध विश्लेषक कौस्तुभ पावस्कर ने कहा, कंपनियां अब बिक्री में बढ़ोतरी पर ध्यान केंद्रित कर सकती हैं क्योंकि कीमतों में बढ़ोतरी तत्काल नहीं होगी। हालांकि कच्चे तेल की कीमतें अगर बढ़ती हैं तो इन्हें प्राथमिकता बदलनी होगी। 
 
एफएमसीजी कंपनियां मोटे तौर पर तब काफी ज्यादा प्रभावित होती हैं जब कच्चे तेल में उतारचढ़ाव होता है। लिनियर अल्काइल बेंजीन (एलएबी) और एचडीपीई जैसे डेरिवेटिव कच्चे तेल से जुड़े हैं और ये चीजें इन कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण कच्चा माल है। इक्विनॉमिक्स रिसर्च ऐंड एडवाइजरी के संस्थापक जी चोकालिंगम ने कहा, ऐसे इनपुट की कीमतों में बढ़ोतरी का मतलब उत्पादन लागत में इजाफा होगा, जो कंपनियों पर कीमतों में बढ़ोतरी का दबाव बनाएगा। ऐसे में अगर वे उत्पादों की कीमतें नहीं बढ़ाती हैं तो इनका मार्जिन प्रभावित होगा, खास तौर से परिचालन मार्जिन।
 
उदाहरण के लिए एलएबी का इस्तेमाल डिटर्जेंट बनाने में होता है और इनपुट लागत में इसकी हिस्सेदारी करीब 60-70 फीसदी है। एचडीपीई का इस्तेमाल सभी आवश्यक उपभोक्ता सामग्री मसलन साबुन से लेकर डिटर्जेंट, हेयर ऑयल, क्रीम, शैंपू और टूथपेस्ट की पैकेजिंग मैटीरियल में होता है। इन उत्पादों की पैकेजिंग लागत एफएमसीजी कंपनियों की कुल उत्पादन लागत का करीब 15-20 फीसदी बैठता है।
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