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बारी से पहले मामले की सुनवाई के लिए तय करें मानक

अदालती आईना
एम जे एंटनी /  November 22, 2018

भारत के पास दुनिया का सबसे लंबा संविधान (करीब 1.4 लाख शब्द) है जिसमें अब तक सर्वाधिक 101 बार संशोधन भी हो चुके हैं। भारत के पास दुनिया के किसी भी अन्य लोकतंत्र की तुलना में अधिक ताकतवर उच्चतम न्यायालय भी है। न्यायिक प्रशासन के मामले में भारत के पास सर्वाधिक शक्तिशाली मुख्य न्यायाधीश भी है, भले ही वह न्यायाधिकार के संदर्भ में अपने 30 समकक्षों में से ही एक होता है। जनवरी में चार वरिष्ठ न्यायाधीशों के संवाददाता सम्मेलन से शुरू हुई इस साल की घटनाएं दिखाती हैं कि यह शक्ति कितनी अहम है? श्रेष्ठता को लेकर जताई जा रही तमाम आशंकाएं संवैधानिक पीठ के उस फैसले से खत्म हो गईं जिसमें मुख्य न्यायाधीश को 'मास्टर ऑफ रोस्टर' घोषित किया गया था।

 
'मास्टर ऑफ रोस्टर' की हैसियत से मुख्य न्यायाधीश मामलों का आवंटन अलग-अलग पीठों को करते हैं, जल्द सुनवाई की मांग वाली याचिकाओं पर विचार करते हैं और अपने अदालती कक्ष के मातहत स्टोर रूम में रखी गई केस फाइलों पर भी बारीक नजर रखते हैं। मुख्य न्यायाधीश प्रक्रियागत नियमों में बदलाव और उच्चतर अदालतों में न्यायाधीशों की नियुक्ति की अनुशंसा करने वाले शक्तिशाली कॉलेजियम की अध्यक्षता भी करते हैं। मुख्य न्यायाधीश की पसंद वाले पीठों को खास मामले आवंटित करने की विवेकाधीन शक्ति पर पैदा हुआ विवाद काफी हद तक शांत हो गया जब विचाराधीन मामलों को उनके विषय के हिसाब से वर्गीकृत किया गया। विषयवार रोस्टर नियम होने का मतलब है कि संबंधित विषयों की सुनवाई करने वाले पीठों के समक्ष उससे जुड़े मामले खुद-ब-खुद सूचीबद्ध हो जाएंगे। 
 
हालांकि जल्द सुनवाई के लिए चुने गए मामलों को लेकर बनी असहज स्थिति कड़वे संबंधों की वजह बनी है। धुर दक्षिणपंथी ताकतें अयोध्या की विवादित भूमि का समाधान निकालने में हो रहे विलंब के चलते अपना संयम खोने लगी हैं। लोगों का यह कहना है कि सबरीमला मामले की सुनवाई को वरीयता किस तरह दी गई जबकि अयोध्या मामले को अगले साल तक के लिए स्थगित कर दिया? इसी तरह अपेक्षाकृत नए मामलों- समलैंगिक रिश्तों की वैधानिकता (2016), व्यभिचार को कानूनी अपराध की श्रेणी से बाहर करने (2017) और आपराधिक रिकॉर्ड वाले नेताओं को प्रतिबंधित करने (2011) जैसे मामलों को किस आधार पर तरजीह दी गई जबकि संवैधानिक पीठ के समक्ष करीब 700 मामले लंबित पड़े हुए हैं। एक संस्थान के तौर पर केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की वैधानिकता का परीक्षण क्यों नहीं किया गया जबकि गौहाटी उच्च न्यायालय ने वर्षों पहले कहा था कि इस जांच एजेंसी का कोई कानूनी दर्जा नहीं है? तत्कालीन अटॉर्नी जनरल की तरफ से इस फैसले के खिलाफ आननफानन में की गई अपील पर अगर कोई निर्णय आ चुका होता तो मौजूदा संघर्ष में पूरे खेल का रुख बदल जाता। पिछले मुख्य न्यायाधीश ने अपने कार्यकाल के अंतिम चार दिनों में कई ऐतिहासिक फैसले सुनाए लेकिन किसी ने भी इन चिंताओं को नहीं जाहिर किया। उन्होंने कुछ मामलों की जल्द सुनवाई करने और कुछ मामलों को लटकाने के लिए अपनी विवेकाधीन शक्तियों का इस्तेमाल किया था।
 
अगर अदालत क्रमानुगत व्यवस्था से चली होती या कतार में लगे मामलों में से कुछ को चुनने के पीछे के सिद्धांत की घोषणा की होती तो वह इस मामले में अपनी आलोचना से बच सकती थी। ऐसे कई मामले हैं जिनकी सुनवाई पांच या अधिक न्यायाधीशों के पीठ को करनी चाहिए। औद्योगिक विवाद अधिनियम जैसे कुछ मामले तो कई दशक पुराने हैं। पांच न्यायाधीशों के पीठ ने इसकी सुनवाई को सात न्यायाधीशों के पीठ के हवाले कर दिया था जिसने खुद इसे नौ न्यायाधीशों के पीठ के सुपुर्द करते हुए कहा कि इसके फैसले के गंभीर एवं व्यापक असर हो सकते हैं। संविधान में वर्णित संपत्ति अधिकारों को लेकर 1996 का एक मामला भी संवैधानिक पीठ को भेजा गया था लेकिन अभी तक उस पर विचार नहीं हो पाया है। 
 
जहां ऐसे अहम मुद्दे एक तरह से अनिश्चितकाल के लिए ठंडे बस्ते में डाले जा चुके हैं वहीं अधिक प्रासंगिक मामलों को चुनने की ललक देखी जा रही है जो राजनीतिक रूप से ज्वलंत मुद्दों में संलिप्त होने की आशंका पैदा करता है। सरकार इस तरह के संवेदनशील मुद्दों को न्यायाधीशों के पाले में डालना अपने लिए सुविधाजनक मानती है। लेकिन उच्चतम न्यायालय को ऐसे मामलों पर तुरंत सुनवाई के लिए राजी होने के बजाय क्रमानुगत तरीके से ही सुनवाई की व्यवस्था पर अडिग रहना चाहिए। अगर ऐसा किया गया होता तो 2010 में अयोध्या विवाद को लेकर दायर अपील पर सुनवाई के पहले कई अन्य मामलों पर भी विचार हो चुका होता। आज स्थिति यही है कि कोई नहीं जानता कि दो दशक पुराने मामलों में भी अंतिम सुनवाई कब होगी? इस बीच विचाराधीन कैदी संबंधित मामले में निर्धारित सजा से अधिक वक्त फैसला आने के पहले ही जेलों में बिता दे रहे हैं।
 
वैसे हालिया दौर में यह विलक्षण समय है जब 31 न्यायाधीशों के पूरे कोरम में से 28 न्यायाधीशों के पद भरे हुए हैं। इतने न्यायाधीश पुराने संवैधानिक मामलों के निपटारे के लिए पर्याप्त हैं। संवैधानिक पीठों की बैठकों में समय के साथ लगातार गिरावट आई है। 1960 के दशक की शुरुआत में शीर्ष अदालत ने ऐसे 134 मामलों का निपटारा किया था। लेकिन हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन के मुताबिक वर्ष 2005-09 के दौरान औसतन 6.4 मामले ही निपटाए जा सके। यह रुझान अब भी आंशिक रूप से जारी है क्योंकि केसों की प्राथमिकता तय करने का कोई दिशानिर्देश नहीं है। न्यायिक सुधारों का संकल्प जताने वाले नए मुख्य न्यायाधीश को सुनवाई के लिए मामलों के चयन से संबंधित मानक बनाने चाहिए ताकि अनिश्चितता का दौर खत्म हो सके।
Keyword: supreme court, high court, master of roster,,
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