बिजनेस स्टैंडर्ड - परमाणु हथियारों का पहले इस्तेमाल न करने की नीति
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परमाणु हथियारों का पहले इस्तेमाल न करने की नीति

नितिन पई /  November 22, 2018

भारत के सामरिक प्रतिरोध की परिपक्वता परमाणु हथियारों के इस्तेमाल सेेेे जुड़ी नीति को लेकर नया रुख अपनाने की मांग करती है। इस विषय पर विस्तार से प्रकाश डाल रहे हैं नितिन पई 

 
मोदी सरकार का यह दावा बढ़ा चढ़ाकर पेश किया गया है कि भारत की परमाणु बैलिस्टिक मिसाइल सबमरीन (एसएसबीएन) ने निरोधक गश्त को अंजाम दिया। हालांकि यह सच है कि हम इसके करीब पहुंच रहे हैं।  परमाणु क्षमता संपन्न पनडुब्बी से परमाणु हथियार क्षमता संपन्न मिसाइल दागने को किसी भी देश की सबसे उच्च कोटि की प्रतिरोधक क्षमता के रूप में देखा जाता है। देश में ऐसी पनडुब्बी बनाने के लिए और उन्हें वांछित दूरी तक हमला करने में सक्षम मिसाइल से लैस करने के लिए बहुत अधिक तकनीकी श्रेष्ठता की आवश्यकता होती है। एक या एक से अधिक एसएसबीएन के परिचालन के लिए यह आवश्यक है कि उच्चतम स्तर का पेशेवर रवैया अपनाया जाए। प्रधानमंत्री से लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, सैन्य शक्ति कमांडर और पनडुब्बी के कमांडिंग अधिकारी और उसके हर सदस्य में यह पेशेवर रवैया नजर आना चाहिए। जमीनी और हवाई परमाणु हथियारों को जहां आपूर्ति वाहन से अलग रखा जा सकता है, वहीं एसएसबीएन उन्हें एक साथ लेकर चलती है। 
 
परमाणु क्षमता संपन्न पनडुब्बी से जुड़ा विरोधाभास यह है कि यह केवल तभी जरूरी प्रतिरोध मुहैया कराती है जबकि कैप्टन और उसके वरिष्ठ अधिकारियों के पास यह क्षमता हो कि वे जरूरत पडऩे पर अपने दम पर उसका इस्तेमाल कर सकें। सरकार के दावे के बावजूद ऐसी तमाम वजह हैं जिनके आधार पर माना जा सकता है कि हम अभी उस स्थिति तक नहीं पहुंचे हैं। हम उसके करीब जरूर आ रहे हैं।  अब वक्त आ गया है कि हम परमाणु हथियारों को लेकर देश की नीतियों की समीक्षा करें। अब जबकि हम विश्वसनीय क्षमता हासिल करने के करीब पहुंच चुके हैं तो हमें पूरा ध्यान अंतरराष्ट्रीय परमाणु हथियार नियंत्रण व्यवस्था के बजाय अब एक ऐसी दुनिया विकसित करने में लगाना चाहिए जहां व्यापक संहार के इन हथियारों का इस्तेमाल नहीं किया जाए। हमें अब रक्षात्मक से आक्रामक रुख अपनाना चाहिए। भारत को इन हथियारों को पहले इस्तेमाल न करने की संधि की पहल करनी चाहिए। 
 
बीसवीं सदी में अधिक से अधिक देशों को परमाणु हथियार रखने से रोकने का जो प्रयास किया गया वह नाकाम रहा। इसके लिए बड़ी ताकतों की नीतियां जिम्मेदार रहीं। पहले उन्होंने चुनिंदा ढंग से अपने साझेदारों को परमाणु हथियारों की तकनीक प्रदान की और अपने विरोधियों से इसे दूर रखने का प्रयास किया। इसके बाद उन्होंने पूरे विश्व पर एक असमान संधि थोपी।  उन्होंने कहा कि अगर शेष विश्व के देश अपने यहां हथियार न बनाने की प्रतिबद्घता जताएं तो वे अपने हथियार नष्ट करने को तैयार हैं। बाद में वे इससे भी पीछे हट गए। उन्होंने तय किया कि वे अपने हथियार अपने पास रखेंगे। इस बीच दूसरों से उनका यह कहना जारी रहा कि वे बम न रखने की अपनी प्रतिबद्घता पर कायम रहें।
 
जब दुनिया भर के देशों को लगने लगा कि परमाणु हथियार ही विदेशी सैन्य हस्तक्षेप के खिलाफ इकलौता बचाव हैं तो बड़ी शक्तियों ने भी उन देशों को पुरस्कृत करके इस विचार की पुष्टि की, जिन्होंने बम बना लिए थे। जबकि उन्होंने उन देशों पर दबाव बनाना शुरू कर दिया जिन्होंने बम नहीं बनाए थे। सद्दाम हुसैन और मुअम्मर कज्जाफी के पास बम नहीं था, उनका क्या हुआ इससे सभी वाकिफ हैं। जबकि परवेज मुशर्रफ और किम जोंग इल को बम होने का फायदा मिला। ईरान अपना बम बना लेगा यह बात भी अब अपरिहार्य नजर आ रही है। सऊदी अरब के बारे में भी यही सच है। अगर जापान और तुर्की बनाना चाहें तो वे भी बहुत आसानी से बम बना लेंगे। 
 
परमाणु अप्रसार की बात भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है लेकिन अब उसका समय पूरा हो चुका है। बीसवीं सदी में ही विचार हकीकत के करीब है और वह है पहले परमाणु हथियारों का इस्तेमाल न करने का वादा। मुझे नहीं लगता है कि हथियारों से मुक्ति कोई बहुत अच्छा विचार है क्योंकि आपने एक बार जो तकनीक विकसित कर ली है उसे आप भुला नहीं सकते। हां, वैश्विक स्तर पर हथियारों का पहले प्रयोग न करने पर अवश्य बल दिया जा सकता है। यह उस दिशा में ही उठाया गया कदम है। इस तरह आप कदम दर कदम समस्या को पीछे धकेल सकते हैं। 
 
इससे क्या हासिल होगा यह तो भविष्य की चर्चा का विषय है लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि अगर दुनिया की प्रमुख ताकतें मौखिक रूप से परमाणु हथियार को पहले नहीं आजमाने की प्रतिबद्घता जताती हैं और उसके पश्चात हथियारों में कटौती की जाती है तो इसे चरणबद्घ शुरुआती कदम माना जा सकता है। भविष्य में इन बातों पर काम करना होगा कि इन बातों की पुष्टि कैसे होगी, आश्वस्ति कैसे मिलेगी, संभावित दलबदलुओं से कैसे निपटा जाएगा वगैरह...वगैरह।  फिलहाल वैश्विक परमाणु विशेषज्ञों की बौद्घिक शक्ति अप्रसार व्यवस्था को मजबूत बनाने में लगी हुई है। अगर भारत पहले प्रयोग न करने को लेकर वैश्विक माहौल में तब्दीली ला सकता है तो माना जा सकता है कि इस शक्ति का सार्थक इस्तेमाल किया जा सकेगा। 
 
यह काम केवल भारत कर सकता है। रूस समेत पश्चिम के परमाणु प्रतिष्ठान अपनी लंबी प्रक्रियाओं और सिद्घांतों से बंधे हुए हैं। उनके लिए बम बनाने वाले देशों पर प्रतिबंध थोपकर यह दर्शाना बहुत आसान है कि अप्रसार की व्यवस्था काम कर रही है। इस बीच चूंकि परमाणु क्षमता वाले देश लगातार अपने हथियारों का जखीरा बढ़ा रहे हैं इसलिए दुर्घटनावश परमाणु युद्घ छिड़ जाने की आशंका बढ़ती जा रही है। चीन भी पहले इस्तेमाल न करने की नीति का पक्षधर हो सकता है। वह पहले से उस लाइन पर चल रहा है और उसे कायम रखना चाहेगा। हां, अमेरिका द्वारा अपने हथियार बढ़ाने या उनको उन्नत करने पर जरूर चीन अपने सिद्घांत की समीक्षा कर सकता है। यहां भारत के पास अवसर है कि वह चीन के साथ मिलकर अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर काम कर सके। 
 
दुनिया को परमाणु हथियारों का पहले इस्तेमाल करने से रोकने के लिए मनाना आसान काम नहीं है और इस लक्ष्य को हासिल करने में दशकों का वक्त लग सकता है। परंतु अगर दुनिया के देशों को अपने हथियार खत्म करने पर मनाने से तुलना की जाए तो यह उतना मुश्किल नहीं है क्योंकि खतरा बढ़ता जा रहा है।
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