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म्युचुअल फंडों की बिक्री में बैंकों की घटती दिलचस्पी

ऐश्ली कुटिन्हो और जश कृपलानी / मुंबई November 22, 2018

अग्रिम कमीशन के बजाय निवेश आधारित कमीशन से जुड़े नियामकीय आदेश के चलते बैंक जैसे बड़े वितरकों के बीच म्युचुअल फंड के वितरण के प्रति रुझान घट सकता है। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने 22 अक्टूबर के परिपत्र के जरिए कई बदलाव किए हैं। ये कदम खर्च में पारदर्शिता लाने, पोर्टफोलियो बदलाव में कमी लाने और गलत जानकारी देकर म्युचुअल फंडों की योजना बेचने पर रोक लगाने के लिए उठाए गए हैं। अग्रिम कमीशन को समाप्त करने के पीछे के मकसदों में से एक यह भी था।
 
कई स्वतंत्र वित्तीय सलाहकार हाल के वर्षों में निवेश आधारित कमीशन की ओर बढ़ गए थे, लेकिन बड़े बैंक और राष्ट्रीय वितरकों को अभी भी म्युचुअल फंड की योजनाओं की बिक्री के लिए अग्रिम कमीशन दिया जाता है। ऐसे कमीशन का भुगतान योजनाओं की बिक्री के तत्काल बाद कर दिया जाता है, जिससे बैंक व राष्ट्रीय वितरक अपने रिलेशनशिप मैनेजरों को भुगतान करने व प्रोत्साहन में सक्षम हो जाते हैं। दूसरी ओर निवेश आधारित कमीशन का भुगतान सालाना होता है और यह निवेश की समयावधि से जुड़ा होता है। इस क्षेत्र के एक अधिकारी ने कहा, अगर किसी इकाई की फिक्स्ड कॉस्ट ज्यादा हो या प्रोत्साहन की योजना का जुड़ाव राजस्व से हो तो वह आने वाले समय में म्युचुअल फंडों पर कम ध्यान दे सकती है। नए स्वतंत्र वित्तीय सलाहकार या अपेक्षाकृत छोटी संपत्ति आधार वाले अन्य योजनाओं की ओर जा सकते हैं या म्युचुअल फंड योजनाओं की बिक्री त्याग सकते हैं।
 
विशेषज्ञों ने कहा, म्युचुअल फंडोंं के अलावा बैंक मोटे तौर पर बीमा योजनाएं, पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विसेज, ऑल्टरनेट इन्वेस्टमेंट फंड और ढांचागत उत्पादों की बिक्री करते हैं। इन योजनाओं की बिक्री म्युचुअल फंडों की कीमत पर बढ़ सकती है, खास तौर से निजी व विदेशी बैंकों के मामले में। वैयक्तिक निवेशकों पर ध्यान केंद्रित करने वाले बैंक यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस प्रॉडक्ट्स (यूलिप्स) व एन्डॉमेंट योजना को बेचने पर जोर दे सकतेहैं ताकि अग्रिम राजस्व में इजाफा हो। एआईएफ और पीएमएस सालाना 1-1.25 फीसदी शुल्क वसूलता है। इसका एक हिस्सा वितरकों को कमीशन के तौर पर दिया जाता है। उच्च अग्रिम कमीशन के भुगतान का चलन पारंपरिक बीमा पॉलिसी में है और पहले साल यह 35-40 फीसदी होता है। यूलिप्स के मामले में एजेंट को पहले साल छह से सात फीसदी कमीशन मिलता है और इसके बाद धीरे-धीरे इसमें कमी आती है।
 
घाटा समाप्त करने की अवधि लंबी होने को देखते हुए नए स्वतंत्र वित्तीय सलाहकार भी म्युचुअल फंडों की बिक्री से दूर हो सकते हैं। ठीक-ठाक फंड वाले आईएफए हालांकि इसकी बिक्री से जुड़ सकते हैं क्योंकि ज्यादातर कुछ साल पहले ही निवेश आधारित कमीशन की ओर बढ़ चुके हैं और मौजूदा क्लाइंटों के आधार से स्थायी आय सृजित कर सकते हैं। एक स्वतंत्र वित्तीय सलाहकार ने कहा, अन्य योजनाओं की ओर विशाखित होने वाले शायद आय का एक अन्य स्रोत सृजित करने के लिए ऐसा कर सकते हैं, न कि म्युचुअल फंड योजनाओं को अपनी प्राथमिक पेशकश के तौर पर बदलने के लिए। 20 करोड़ रुपये से कम फंड वाले शायद दोबारा विचार कर सकते हैं। उदाहरण के लिए टियर-3 व टियर-4 शहरों में परिचालन करने वाले स्वतंत्र वित्तीय सलाहकार मोटे तौर पर 30,000-40,000 रुपये की मासिक आय कमाना चाहते हैं। इसके लिए उन्हें 3-5 करोड़ रुपये का परिसंपत्ति आधार बनाना होता है। शुरुआत करने वाले स्वतंत्र वित्तीय सलाहकार को इतना बड़ा आधार बनाने में कम से कम एक साल लग सकते हैं।
 
मिरे ऐसेट एमएफ के मुख्य कार्याधिकारी स्वरूप मोहंती ने कहा, निवेश आधारित कमीशन तीन साल में अग्रिम कमीशन व निवेश आधारित कमीशन के बराबर पहुंच सकता है। उन्होंने कहा, मुझे नहीं लगता कि बैंकों का राजस्व प्रभावित होगा, लेकिन उन्हें अपना नकदी प्रवाह समायोजित करना होगा। अगर कमीशन की मात्रा कम होती है तो चीजें बदल सकती हैं।
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