बिजनेस स्टैंडर्ड - क्या श्रमिक कल्याण नीति दिला पाएगी वोट?
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क्या श्रमिक कल्याण नीति दिला पाएगी वोट?

संदीप कुमार /  11 21, 2018

मध्‍य प्रदेश विधानसभा चुनाव

बिजनेस स्टैंडर्ड क्या श्रमिक कल्याण नीति दिला पाएगी वोट?बिजनेस स्टैंडर्ड क्या श्रमिक कल्याण नीति दिला पाएगी वोट?'बीते 13 वर्षों से अधिक समय के अपने कार्यकाल में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान शायद ही कभी किसी मजदूर संगठन के नेता या प्रतिनिधिमंडल से मिले हों। वह तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की श्रम शाखा भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) के लोगों से भी नहीं मिलते। इससे अंदाज लग सकता है कि वह प्रदेश में श्रम से जुड़े मुद्दों को कितनी गंभीरता से लेते हैं।' यह कहना है श्रम मामलों के विशेषज्ञ अधिवक्ता मोहने कर्पे का। कर्पे सवाल उठाते हैं कि बीते दो वर्षों में इंदौर स्थित श्रम न्यायालय ने दो निर्णय भी नहीं सुनाए हैं। इस गति से प्रक्रियाओं का निस्तारण होगा तो श्रमिकों का क्या होगा? 

वर्ष 2015 में मध्य प्रदेश सरकार ने 15 श्रम सुधार संशोधन किए थे। सरकार के इस कदम को उद्योग जगत के समर्थन में माना गया। राज्य सरकार वैश्विक निवेशकों को मध्य प्रदेश में निवेश के लिए बुला रही थी। कुछ प्रमुख संशोधनों में छंटनी के मानकों को शिथिल करना, छंटनी किए गए श्रमिकों को तीन महीने का वेतन क्षतिपूर्ति में देना, ओवरटाइम की अवधि बढ़ाना और महिलाओं के लिए रात की पाली में काम आदि शामिल थे। 

नए मानकों के मुताबिक 300 से अधिक कर्मचारियों को नियुक्त करने वाली कंपनियों को बिना सरकारी मंजूरी के छंटनी करने या कंपनी बंद करने की छूट दी गई। पहले यह सीमा 100 कर्मचारियों तक थी। बहरहाल, नए मानकों के तहत नियोक्ता के लिए यह अनिवार्य कर दिया गया कि वह छंटनी के समय तीन महीने का नोटिस और तीन महीने का वेतन हर्जाने के रूप में दे। पहले इनमें से कोई एक ही देना होता था। कर्मचारियों को हर वर्ष के काम के बदले 15 दिन का वेतन दिया जाता था।

बीएमएस के एक वरिष्ठ नेता ने नाम जाहिर न करने की शर्त पर कहा, 'हालांकि मुख्यमंत्री खुद को किसान का बेटा कहते हैं लेकिन सच तो यही है कि श्रम कानून श्रमिकों के बजाय कंपनियों के पक्ष में हैं।' परंतु मध्य प्रदेश ग्रामीण-शहरी असंगठित श्रमिक बोर्ड के अध्यक्ष सुल्तान सिंह शेखावत की राय अलग है। वह कहते हैं, 'मध्य प्रदेश में आ रही नई फैक्टरियों से कहा गया है वे स्थानीय असंगठित श्रमिकों को रोजगार दें। उनसे यह भी कहा गया है कि वे 80 प्रतिशत तकनीकी स्टाफ राज्य का ही रखें। आपको नहीं लगता कि इससे स्थानीय कामगारों को लाभ मिल रहा है?'

राज्य में तीन करोड़ से अधिक लोग कृषि श्रमिक, औद्योगिक श्रमिक, विनिर्माण श्रमिक आदि के रूप में काम कर रहे हैं। चौहान ने जनकल्याण (संबल) योजना लाकर एक बहुत बड़ा दांव खेला है। यह योजना असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों, सीमांत किसानों के लिए लाई गई है। इस योजना के तहत लोगों को 200 रुपये महीने की दर पर बिजली, समावेशी शिक्षण और सार्वजनिक वितरण से जुड़े तमाम लाभ दिए जा रहे हैं। चौहान और भाजपा को लगता है कि यह योजना उनकी तकदीर बदल देगी। अब तक असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों पर किसी पार्टी ने ध्यान नहीं दिया था।

वीवी गिरि सेंटर ऑफ लेबर के संजय उपाध्याय और पंकज कुमार ने एक अध्ययन में कहा, 'जनकल्याण को जहां चुनावी लाभ हासिल करने का माध्यम बनाया जा रहा है वहीं इस बात के कोई प्रमाण नहीं हैं कि श्रम सुधारों ने अपने दम पर, बड़ा निवेश जुटाने या रोजगार निर्माण में कोई मदद की हो। इन सुधारों की वजह श्रमिकों के शोषण के मामले बढ़े हों ऐसा भी नजर नहीं आता।'

इसका एक और पहलू है। प्रमाण बताते हैं कि जब एक कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था विनिर्माण क्षेत्र में तब्दीली चाहती है तो उसे दो तरह के अधिशेष को अपने आप में समाहित करना होता है: पहला कृषि क्षेत्र का अधिशेष और दूसरा श्रमिक अधिशेष। अभी भी यह स्पष्ट नहीं है कि सरकार इसे कैसे हल करेगी। हालांकि चौहान का दावा है कि निकट भविष्य में निवेश संबंधी पहलों के जरिये करीब 1.70 लाख रोजगार तैयार होंगे। अभी यह स्पष्टï नहीं है कि इन रोजगारों के लिए किस प्रकार के कौशल की आवश्यकता होगी और प्रदेश की श्रमशक्ति में वह काबिलियत है भी या नहीं। बहरहाल, इस बीच सरकार जनकल्याण नीतियों को वोट जुटाने के आकर्षक तरीके के रूप में देख रही है।

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