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छठे बजट की तैयारी में लगा जेटली का मंत्रालय

ए के भट्टाचार्य /  November 21, 2018

केंद्रीय वित्त मंत्रालय के मुख्यालय नॉर्थ ब्लॉक में अगले वित्त वर्ष के लिए बजट तैयार करने का काम शुरू हो चुका है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को लेकर वित्त मंत्रालय की चिंताएं काफी हद तक दूर हो चुकी हैं। आरबीआई बोर्ड की सोमवार को हुई बैठक में दोनों पक्षों के बीच शांति  के संकेत मिले। लगता है कि 'एक हाथ दो और दूसरे हाथ लो' वाला रवैया माहौल शांत करने में मददगार रहा है। अब नॉर्थ ब्लॉक बजट तैयार करने की अपनी सालाना कवायद पर ध्यान केंद्रित कर सकता है।

इसके संकेत पिछले शनिवार को ही दिख गए थे। वित्त मंत्रालय के दो वरिष्ठ अधिकारियों की सेवानिवृत्ति के पहले ही सरकार ने उनके उत्तराधिकारियों के नाम घोषित कर दिए। वित्त सचिव हसमुख अढिया 30 नवंबर को सेवानिवृत्त हो रहे हैं और व्यय सचिव अजय नारायण झा का कार्यकाल जनवरी के अंत में पूरा होगा।

कई बार ऐसा हुआ है कि बजट पेश होने के कुछ महीने पहले ही सेवानिवृत्त होने वाले वित्त मंत्रालय के सचिवों को कुछ महीनों का विस्तार दिया गया है। बजट-निर्माण प्रक्रिया में निरंतरता बनाए रखने और संसद में बजट को तेजी से पारित कराने में उनकी मौजूदगी के लिए ऐसा किया जाता रहा है।

विशिष्ट पहचान प्राधिकरण यूआईडीएआई के सीईओ अजय भूषण पांडेय नवंबर के अंत में अढिया की जगह लेंगे। राजस्व सचिव के साथ-साथ पांडेय यूआईडीएआई का भी अतिरिक्त प्रभार संभालते रहेंगे। वह जीएसटी नेटवर्क के चेयरमैन के तौर पर भी कार्यरत रहेंगे। वित्त मंत्री के मुताबिक सरकार ने अढिया के लिए कुछ वैकल्पिक योजनाएं बनाई थीं लेकिन जीएसटी के क्रियान्वयन जैसे अहम मामलों की निगरानी कर चुके अढिया सेवानिवृत्ति के बाद किसी भी तरह की जिम्मेदारी स्वीकार करने के लिए नहीं तैयार हुए।

1985 बैच के गुजरात कैडर के आईएएस अधिकारी गिरीश चंद्र मुर्मू की व्यय सचिव के तौर पर नियुक्ति का फैसला काफी अहम है। अभी तक राजस्व विभाग में विशेष सचिव के पद पर तैनात मुर्मू अजय नारायण झा की जगह लेंगे। उसके एक दिन बाद ही वर्ष 2019-20 का बजट पेश किया जाएगा। मुर्मू को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का करीबी माना जाता है। वह गुजरात में मोदी के मुख्यमंत्री रहते समय प्रमुख सचिव के तौर पर काम कर चुके हैं। उन्होंने तत्काल प्रभाव से व्यय विभाग में ओएसडी के तौर पर काम शुरू कर दिया है।

सवाल यह है कि मुर्मू जब पहले से ही राजस्व विभाग में तैनात थे तो अढिया के उत्तराधिकारी के तौर पर उन्हें ही क्यों नहीं नियुक्त किया गया? कहीं इसकी वजह यह तो नहीं है कि चुनावी साल में सरकार के लिए व्यय सचिव के तौर पर मुर्मू की कहीं अधिक उपयोगिता होगी? चुनावी साल में व्यय कार्यक्रमों का सफल एवं त्वरित  क्रियान्वयन अधिक अहम हो सकता है। मुर्मू को कहीं अगले वित्त सचिव के तौर पर तो नहीं तैयार किया जा रहा है? वह वित्तीय सेवा और राजस्व विभाग में काम भी कर चुके हैं।

सामान्य प्रक्रिया में झा की सेवानिवृत्ति के बाद आर्थिक मामलों के सचिव एस सी गर्ग को ही अगला वित्त सचिव होना चाहिए। झा के बाद गर्ग ही नॉर्थ ब्लॉक के सबसे वरिष्ठ अधिकारी होंगे। राजस्थान कैडर के 1983 बैच के आईएएस अधिकारी गर्ग की सेवानिवृत्ति अक्टूबर 2020 में होनी है जबकि मुर्मू उसके एक साल पहले नवंबर 2019 में ही सेवानिवृत्त हो जाएंगे।

बहरहाल नई नियुक्तियों के बाद वित्त मंत्रालय में सचिवों की एक नई टीम तैयार हो चुकी है जो अगले बजट की रूपरेखा तय करेगी। अढिया और झा की जल्द सेवानिवृत्ति को देखते हुए इस बजट को तैयार करने का काम मूलत: गर्ग, पांडेय और मुर्मू ही करेंगे जबकि वित्तीय सेवा के सचिव राजीव कुमार भी सहयोग करेंगे।

लेकिन यह बजट क्या मोदी सरकार के लिए खास होगा? अतीत में किसी भी सरकार ने अपने पांच साल के कार्यकाल में पांच से अधिक पूर्ण बजट नहीं पेश किया है। इस तरह वित्त मंत्री अरुण जेटली के अंतरिम बजट ही पेश करने की संभावना है जिसमें 2019-20 के पहले चार महीनों के लिए संसद से लेखानुदान पारित करने का प्रावधान होगा। किसी भी अंतरिम बजट में कर प्रस्ताव नहीं रखे जाते हैं। लेकिन इसमें चालू वित्त वर्ष के लिए संशोधित बजट अनुमान और अगले वित्त वर्ष के लिए व्यय कार्यक्रम शामिल होता है। सत्ताधारी दल इसका फायदा उठाते हुए चुनावों के पहले मतदाताओं को लुभाने की कोशिश करते हैं। 

हालांकि कानून में ऐसा कोई बंधन नहीं है जो सरकार को अपने कार्यकाल में छठा पूर्ण बजट पेश करने से रोके। सरकार के भीतर भी इस बारे में चर्चा चल रही है कि क्या वह तमाम कर प्रस्तावों एवं व्यय कार्यक्रमों के साथ पूर्ण बजट पेश कर सकती है? अब बजट के पहले ही पेश होने से इसके अगला वित्त वर्ष शुरू होने तक पारित होने की भी संभावना रहती है लिहाजा आम चुनाव की तारीखों की घोषणा और आदर्श आचार संहिता लागू होने के पहले पूर्ण बजट लाने की संभावना मौजूद है। एक और तर्क यह है कि पूर्ण बजट लाकर बाजार में अनिश्चितता के माहौल को दूर किया जा सकेगा। सरकार भी कुछ कर रियायतों की घोषणा कर चुनावी लाभ उठाने की कोशिश कर सकती है।

मोदी सरकार बजट प्रक्रिया में कई बदलाव लेकर आई है। इसने रेल बजट और आम बजट को एक साथ मिलाया और फिर बजट पेश करने की तारीख भी एक महीना पहले कर दी। इससे अगला वित्त वर्ष शुरू होने के पहले ही बजट पारित होने का मौका मिल जाता है। जीएसटी के लागू हो जाने के बाद अब बजट में प्रत्यक्ष करों एवं सीमा शुल्क के बारे में ही घोषणाएं होनी हैं। सवाल है कि क्या जेटली सरकार के अंतिम वर्ष में पूर्ण बजट पेश कर एक और नई परिपाटी शुरू करेंगे?

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