बिजनेस स्टैंडर्ड - नियम निर्माण में उचित प्रक्रियाओं का हो प्रयोग
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नियम निर्माण में उचित प्रक्रियाओं का हो प्रयोग

अजय शाह /  November 20, 2018

एक उदार लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी व्यक्ति को केवल कानूनी शक्ति की सहायता से विवश किया जा सकता है और कानून केवल विधायिका बना सकती है। ऐसे में किसी एजेंसी के अधिकारी कानून कैसे बना सकते हैं जबकि नियामक ऐसा कर रहे हैं?

बगैर किसी जवाबदेही के अधिकारियों द्वारा कानून बनाना, राज्य की क्षमता क्षीण होने का सूचक है। इसका हल संकीर्ण संसदीय आदेश, तकनीकी विशेषज्ञता, सार्वजनिक मशविरे और स्वतंत्र निदेशकों के दबदबे वाले बोर्ड में निहित है। भारत ने कई क्षेत्रों में इस अहम काम की शुरुआत कर दी है।

अगर कोई पुलिसकर्मी कहता है कि मुझे नीली कमीज पहनने की इजाजत नहीं है तो मैं उससे पलटकर कहूंगा कि तुम होते कौन हो मुझे मजबूर करने वाले? एक उदार लोकतंत्र में निजी व्यक्तियों पर किसी भी तरह का दबाव केवल कानून का ही होना चाहिए और कानून बनाने का काम विधायिका करती है।

विधायिका जनता के प्रति जवाबदेह होती है। इसका कार्यकाल सीमित होता है और उसे चुनावों का सामना करना पड़ता है। अगर इससे तुलना करके देखें तो अधिकारियों की कोई जवाबदेही नहीं होती। जब भी कोई अधिकारी एक ऐसा कानून बनाता है जो आम लोगों पर दबाव बनाता है तो यह लोकतांत्रिक कमी का मामला होता है, वैधता की कमी का। जब संसद नियामक बनाती है तो उस संस्थान के पास कानून बनाने का अधिकार होता है।

ये कानून आम लोगों को प्रभावित करते हैं। भारत में ऐसी एजेंसियां बनाने की होड़ मची है कि बिना मजबूत आधारशिला रखे और बिना जवाबदेही तय किए उनका निर्माण किया जा रहा है। एफएसएलआरसी की प्रक्रिया के दौरान न्यायमूर्ति श्रीकृष्णा ने हमें स्पष्ट बताया कि आज हमारे देश में जिन कानूनों से इस तरह की एजेंसियां बन रही हैं वे कानून निर्माण की संसदीय शक्ति का अत्यधिक बंटवारा करने वाली साबित हो रही हैं।

भारत में राजनेताओं के अनादर और विशेषज्ञों का सम्मान करने की प्रवृत्ति है। मैं एक विशेषज्ञ हूं और मैं यह मानना चाहूंगा कि कानून बनाने में अवश्य विशेषज्ञों की सहायता ली जानी चाहिए। परंतु कमजोर प्रदर्शन का सीधा संबंध बिना किसी जवाबदेही की ताकत से है। राज्य सत्ता हासिल करने के लिए हमें इन एजेंसियों को कानून के दायरे में विकसित करना होगा। इसके लिए इस लोकतांत्रिक कमी और वैधता की कमी की समस्या को हल करना होगा।

यह समस्या अकेले भारत की नहीं है। पूरी दुनिया ने इसका सामना किया है, जहां विधायी शक्तियां विशेष एजेंसियों को सौंप दी गईं। बिना जवाबदेही की शक्ति की समस्या से संस्थागत डिजाइन के चार तत्त्वों की सहायता से निपटा जा सकता है।

पहला मुद्दा है संकीर्ण संसदीय आदेश का। अगर कोई संसदीय कानून कहता है कि ट्राई को यह अधिकार है कि वह दूरसंचार क्षेत्र से जुड़ा कोई भी कानून बनाए तो यह अत्यधिक प्रतिनिधित्व का मामला है। किसी एजेंसी को कानून बनाने का अधिकार अत्यंत संकीर्ण और नियंत्रित ढंग से दिया जाना चाहिए। कानून का एक धड़ा हर नियमन के लिए आवश्यक है, लक्ष्य तय करना, प्रतिस्पर्धी विचारों की पहचान करना और एजेंसी को संबंधित नियमन लिखने का अधिकार देना इसका हिस्सा हैं।

दूसरा मुद्दा है तकनीकी विशेषज्ञता का। अनिर्वाचित अधिकारी विशेषज्ञता के जरिये वैधता हासिल करते हैं। केवल विशेषज्ञता मौजूद होने का दावा करना पर्याप्त नहीं है। जब भी किसी कानून का मसौदा तैयार हो, तब विशेषज्ञता का प्रदर्शन किया जाना चाहिए। यह काम दस्तावेजी पैकेट जारी करके किया जाता है जो वैज्ञानिक प्रमाण प्रस्तुत करता है।

यानी, बाजार की विफलता क्या है, प्रस्तावित हस्तक्षेप क्या हैं, वे बाजार विफलता से कैसे निपटेंगे, यह हस्तक्षेप न्यूनतम हस्तक्षेप कैसे है और अन्य की तुलना में इसकी लागत कम कैसे है, इसके लाभ बाकियों से अधिक कैसे हैं? वैधता विशेषज्ञता के इसी प्रदर्शन से प्राप्त की जाती है।

तीसरा मसला है सार्वजनिक मशविरे का। हर एजेंसी को अपना दस्तावेजी पैकेट सार्वजनिक टिप्पणी के लिए पेश करना चाहिए, उसे विशेषज्ञों और उद्योग जगत से लिखित टिप्पणियां आमंत्रित करनी चाहिए और नियमन में जरूरी संशोधन करके उन्हें हल करना चाहिए। वैधता मशविरे और प्रतिक्रियाशीलता से अर्जित की जाती है।

अंत में यह पूरी प्रक्रिया एक बोर्ड के नियंत्रण में होनी चाहिए और बोर्ड में स्वतंत्र निदेशकों का बहुमत होना चाहिए जो विशेषज्ञ हों। नियमन बनाने वाली हर परियोजना की शुरुआत एक व्यापक नोट के साथ होनी चाहिए। बोर्ड को नियमन बनाने वाली परियोजना को अधिकृत करना चाहिए और काम खत्म होने के बाद स्टाफ को वापस बोर्ड में लौट आना चाहिए। बोर्ड को नियमन की महत्ता परखनी चाहिए और यह देखना चाहिए कि स्टाफ ने प्रक्रियाओं का पालन किया है या नहीं।

फिलहाल हमारे देश में ये अवधारणाएं नदारद हैं। कानून नियामकों को असीमित शक्ति देते हैं और उन्हें न्यायिक चुनौती देना अक्सर फलदायी नहीं होता है। ऐसी अधिकांश परियोजनाओं पर बोर्ड का नियंत्रण नहीं रहता है। कोई विशेषज्ञता भी नजर नहीं आती और नियमन निर्माण प्रक्रिया लॉबीइंग और राजनीतिक दबाव की शिकार हो जाती है। हालांकि कई बार सार्वजनिक टिप्पणियों का अनुरोध किया जाता है लेकिन उनकी अनदेखी कर दी जाती है। अंतिम नियमन प्राय: वही होता है जो पहले मसौदे में नजर आता है।

जांच-परख में यह अभाव राज्य की कमी के रूप में सामने आता है। देश में नियामकों द्वारा कम गुणवत्ता वाले नियमन जारी करने से अक्सर निराशा का माहौल रहता है। जब इन पर सवाल उठते हैं तो हलचल मच जाती है क्योंकि इन्हें ठोस प्रक्रिया के तहत बनाया ही नहीं जाता। 

राज्य क्षमता विशेषज्ञों से नहीं आती बल्कि वह उचित जांच-परख और संतुलन से प्राप्त होती है। राजनीति विज्ञान को लेकर देश के बुर्जुआ वर्ग की समझ काफी अपरिपक्व है। हम उन लोगों को शक्तिसंपन्न बनाना चाहते हैं जो हमें अच्छे लगते हैं। जवाबदेही की कमी के साथ आने वाली शक्ति कमजोर प्रदर्शन की वजह बनती है। जिन एजेंसियों को कानून बनाने की शक्ति सौंपी जाती है उन्हें इन चार डिजाइन सिद्धांतों के इर्दगिर्द नये सिरे से डिजाइन किया जाना चाहिए। 

हाल के वर्षों में भारत में इस दिशा में काफी प्रगति हुई है। एफएसएलआरसी (2013, 2015) ने नियामकों को लेकर समझ पैदा की है और नियमन जारी करने में बोर्ड की भूमिका की भी बात की है। सर्वोच्च न्यायालय ने सन 2016 में ट्राई के कॉल ड्रॉप वाले आदेश में नियम निर्माण की ऐसी ही प्रक्रिया की बात की थी।

ट्राई इस दिशा में काम भी कर रहा है। सभी नियामकों को इस आदेश को अपनी प्रक्रिया में लागू करना चाहिए। आईबीबीआई ने अपनी नियम निर्माण प्रक्रिया को इसके अनुकूल बनाने की बात कही है। नया भुगतान विधेयक 2018 भी इन अवधारणाओं को समेटे है। आरबीआई को लेकर जो बहस चल रही है उसने भी इन एजेंसियों के काम को लेकर सवाल उत्पन्न किए हैं।

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