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टल गया संकट

संपादकीय /  November 20, 2018

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मैराथन बोर्ड बैठक के एक दिन बाद वित्तीय बाजार में कई लोगों ने इसे महत्त्वहीन घटना करार दिया। यह अपने आप में उस परिपक्वता को दिखाता है जो सरकार और केंद्रीय बैंक ने हालिया संकट को टालने में दर्शाई है। यह संकट दोनों पक्षों के बीच सार्वजनिक विवाद से उपजा था।

व्यापक तौर पर देखा जाए तो सरकार जहां अर्थव्यवस्था, नकदी और ऋण की कमी को लेकर चिंतित थी, वहीं आरबीआई प्रबंधन तय मानकों को लेकर कुछ ज्यादा ही संरक्षणवादी रुख अपना रहा था। दोनों असहमति एक बड़े संकट में बदल गई थी और कहा जा रहा था कि सरकार आरबीआई अधिनियम की धारा 7 का इस्तेमाल करने जा रही है।

इस धारा के तहत वह आरबीआई को अपना निर्णय मानने को बाध्य कर सकती है। पिछले पखवाड़े इस विवाद को थामने के कुछ प्रयास किए गए लेकिन ऐसी अटकल थी कि आरबीआई गवर्नर ऊर्जित पटेल इस्तीफा दे सकते हैं। अगर ऐसा होता तो यह देश की नीति निर्माण व्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका होता। इस परिदृश्य में यह बहुत राहत की बात रही कि आरबीआई के 18 सदस्यीय मजबूत केंद्रीय बोर्ड ने तमाम विवादों को परे करते हुए यह सुनिश्चित किया कि आरबीआई की सांस्थानिक विश्वसनीयता को कोई क्षति न पहुंचे। 

बोर्ड ने चार विवादास्पद मसलों पर चर्चा की: आरबीआई का आर्थिक पूंजी ढांचा (ईसीएफ), घाटे और फंसे हुए कर्ज की समस्या से जूझ रहे बैंकों के लिए तात्कालिक सुधारात्मक कदम ढांचा (पीसीए), संकटग्रस्त मझोले, छोटे और सूक्ष्म उपक्रमों के लिए ऋण पुनर्गठन की योजना और बैंकों के लिए बेसल नियामकीय पूंजी ढांचा।

इनमें से कोई भी मसला ईसीएफ जैसा विवादास्पद नहीं था क्योंकि कथित तौर पर सरकार की यह इच्छा थी कि वह केंद्रीय बैंक के अतिरिक्त भंडार के कहीं ज्यादा बड़े हिस्से का इस्तेमाल कर सके। आरबीआई ऐसी मांग का कड़ा विरोध कर रहा था। उसका कहना था कि देश की वित्तीय स्थिरता के लिए यह राशि आवश्यक है।

अंत में बोर्ड ने समझदारी का परिचय देते हुए ईसीएफ के परीक्षण के लिए एक विशेषज्ञ समिति के गठन का निर्णय लिया। इसकी सदस्यता और संदर्भ शर्तों का निर्धारण सरकार और आरबीआई मिलकर करेंगे। दोनों पक्षों ने पीसीए ढांचे को लेकर भी लचीलापन दिखाया। दो अन्य मुद्दों की बात करें तो आरबीआई ने सरकार की इच्छाओं का काफी हद तक मान रखा।

बोर्ड ने आरबीआई प्रबंधन को यह मशविरा दिया कि वह एमएसएमई के कर्जदारों की ऋणग्रस्त मानक परिसंपत्तियों के पुनर्गठन की योजना पर विचार करे। यह सुविधा 25 करोड़ रुपये तक की ऋण सुविधा वाले संस्थानों के लिए तैयार की जानी है। केंद्रीय बैंक ने बैंकों के पूंजी और जोखिम के 9 फीसदी के अनुपात के अनुपालन के लिए समय अवधि में भी इजाफा किया। 

बहरहाल, यह तमाम सहमति आसानी से नहीं बन सकी। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जाता है कि आरबीआई बोर्ड की बैठक नौ घंटे तक चली। अब पूरा ध्यान दिसंबर में होने वाली आगामी बैठक पर केंद्रित हो गया है। यह बैठक विधानसभा के कुछ महत्त्वपूर्ण चुनावों के नतीजों के बाद होने वाली है।

उस दौरान आरबीआई में संचालन जैसे कुछ अन्य मुद्दों पर चर्चा होगी। यह पहला मौका नहीं है जब आरबीआई की स्वायत्तता इस तरह चर्चा में आई है। यह अंतिम अवसर भी नहीं होगा। अतीत में तमाम आरबीआई गवर्नरों ने शक्तिशाली वित्त मंत्रियों द्वारा अपने अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप पर सवाल उठाए हैं। आरबीआई और सरकार के बीच थोड़ा टकराव तो लाजिमी है लेकिन इसे सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आना चाहिए। इन दिनों ऐसे ही हालात बन गए थे लेकिन अच्छी बात है कि सबकुछ ठीक से निपट गया।

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