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म्युचुअल फंडों की निवेश सीमा घटेगी!

ऐश्ली कुटिन्हो / मुंबई 11 19, 2018

जोखिम घटाने पर नजर

बाजार नियामक का इरादा उद्योग के क्रेडिट जोखिम को सीमित करने का है

विशेषज्ञों ने कहा, एनबीएफसी को फंडिंग के वैकल्पिक साधनों पर नजर डालनी होगी

बिजनेस स्टैंडर्ड म्युचुअल फंडों की निवेश सीमा घटेगी!बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) एनबीएफसी और हाउसिंग फाइनैंस कंपनियों में डेट म्युचुअल फंडों की कुल निवेश सीमा में कटौती कर सकता है। नियामक का इरादा उद्योग के क्रेडिट जोखिम को सीमित करने का है। मौजूदा नियमों के मुताबिक म्युचुअल फंडों की ऋण योजनाओं को किसी खास क्षेत्र में निवेश, योजना के एनएवी के 25 फीसदी तक सीमित रखना होता है। वित्तीय सेवा क्षेत्र के लिए 25 फीसदी निवेश की सीमा का ज्यादातर इस्तेमाल एनबीएफसी की ऋण प्रतिभूतियों की खरीद में होता है।

हाउसिंग फाइनैंस कंपनियों के बॉन्डों में निवेश की अतिरिक्त सीमा 15 फीसदी है और इस तरह से वित्तीय सेवा क्षेत्र में निवेश की कुल सीमा 40 फीसदी बैठती है। म्युचुअल फंड वाणिज्यिक प्रतिभूतियों में सबसे बड़ा निवेशक है और एक अनुमान के मुताबिक, एनबीएफसी की तरफ से जारी वाणिज्यिक प्रतिभूतियों में 60 फीसदी से ज्यादा का निवेश करता है।

उद्योग के जानकारों ने कहा, क्षेत्रीय सीमा में कटौती से एनबीएफसी को फंडिंग के वैकल्पिक साधनों पर नजर डालनी होगी। ऋण योजनाओं का रिटर्न भी प्रभावित हो सकता है क्योंकि वित्तीय सेवा क्षेत्र की तरफ से जारी ऋण प्रतिभूतियों में गैर-वित्तीय कंपनियों की तरफ से जारी समान परिपक्वता वाली प्रतिभूतियों के मुकाबले 20-30 आधार अंक ज्यादा रिटर्न मिलता है।

विशेषज्ञोंं ने कहा कि अगर कुल सीमा 40 फीसदी से घटाकर 30 फीसदी पर लाई जाती है तो खासा असर दिख सकता है। एक डेट फंड मैनेजर ने कहा, एनबीएफसी की उधारी लागत बढ़ेगी और वित्तीय व गैर-वित्तीय प्रतिभूतियों का स्प्रेड कम हो जाएगा। विनिर्माण कंपनियों की तरफ से जारी वाणिज्यिक प्रतिभूतियों का प्रतिफल और बैंकों की सावधि जमाओं का प्रतिफल दबाव में आ सकता है क्योंकि इन प्रतिभूतियों की मांग बढ़ेगी। 

अनुमान के मुताबिक, एनबीएफसी की तरफ से जारी ऋण प्रतिभूतियों में उद्योग का निवेश सितंबर 2018 में 1.5 लाख करोड़ रुपये था, जो एक साल पहले भी करीब-करीब इतना ही रहा था। वैल्यू रिसर्च के आंकड़ों से यह जानकारी मिली। हाउसिंग फाइनैंंस कंपनियों के लिए यह निवेश 13 फीसदी बढ़कर सितंबर तिमाही में 1.86 लाख करोड़ रुपये था, जो एक साल पहले 1.65 लाख करोड़ रुपये रहा था।

ऐक्सिस एमएफ के प्रमुख (फिक्स्ड इनकम) आर शिवकुमार ने कहा, इस कदम को क्षेत्र विशेष की जोखिम में कमी लाने और विशाखन में इजाफे के तौर पर देखा जा रहा है। निवेशक इसे सकारात्मक नजरिये से देखेंगे। रिटर्न में थोड़ी कमी आ सकती है, लेकिन मनी मार्केट व लिक्विड योजनाओं के निवेशक सामान्य तौर पर रिटर्न के बजाय सुरक्षा व तरलता को प्राथमिकता देते हैं।

साल 2016 में सेबी ने किसी एक क्षेत्र में ऋण योजनाओं के जरिए निवेश की सीमा फंड के एनएवी के 30 फीसदी से घटाकर 25 फीसदी कर दिया था। हाउसिंग फाइनैंस कंपनियों के लिए यह सीमा एनएवी के 10 फीसदी से घटाकर 5 फीसदी कर दिया गया था ताकि हाउसिंग व रियल्टी क्षेत्र में म्युचुअल फंडों की तरफ से ली जा रही क्रेडिट जोखिम को सीमित किया जा सके।

यह सीमा बाद में बढ़ाकर 15 फीसदी तक की गई। जून में जारी आरबीआई की वित्तीय स्थायित्व रिपोर्ट के मुताबिक, वित्तीय व्यवस्था में रकम मुहैया कराने के मामले में म्युचुअल फंड सबसे आगे है। उनसे रकम हासिल करने वाली तीन अग्रणी प्रापक हैं अधिसूचित वाणिज्यिक बैंक (44 फीसदी), एनबीएफसी (26 फीसदी) और हाउसिंग फाइनैंस कंपनियां (19 फीसदी)। 

पिछले महीने रेटिंग एजेंसी मूडीज ने कहा था कि आईएलऐंडएफएस व इसकी समूह की इकाइयों की तरफ से डिफॉल्ट के बाद बाजार में लगातार नकदी की किल्लत से एनबीएफसी की क्रेडिट प्रोफाइल का क्षरण होगा। एजेंसी ने यह भी कहा था कि नकदी में सख्ती से वित्तीय लागत बढ़ेगी और इन इकाइयों को अपनी देनदारी रोलओवर करने में मुश्किल होगी क्योंकि बाजार उधारी पर ये काफी ज्यादा आश्रित रही हैं।

आरबीआई ने हाल में बैंकों को एनबीएफसी बॉन्डों को आंशिक उधारी मुहैया कराने की अनुमति दी है ताकि नकदी की स्थिति में सुधार हो। एनबीएफसी को बैंकों की उधारी दिसंबर 2018 तक 10 फीसदी के मुकाबले 15 फीसदी तक करने की अनुमति दी गई है।

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