बिजनेस स्टैंडर्ड - 'संप्रग के मुकाबले कृषि को आय केंद्रित बनाने पर जोर'
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'संप्रग के मुकाबले कृषि को आय केंद्रित बनाने पर जोर'

शिखा शालिनी /  11 19, 2018

बीएस बातचीत

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह ने शिखा शालिनी को बताया कि उनकी सरकार ने कृषि क्षेत्र में कई महत्त्वपूर्ण कदम उठाए हैं। बातचीत के  अंश: 

नरेंद्र मोदी सरकार ने स्वामीनाथन आयोग की कुछ सिफारिशों पर अमल किया और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) बढ़ाने के बावजूद किसानों में असंतुष्टि क्यों है?

बिजनेस स्टैंडर्ड वर्ष 2003 में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एम एस स्वामीनाथन समिति का गठन किया जिसने करीब 201 सुझाव दिए। इन सिफारिशों के आधार पर ही राष्ट्रीय किसान नीति बनी जिसका मकसद किसान की आमदनी और कृषि आमदनी बढ़ाना था। अगस्त महीने में स्वामीनाथन ने एक अखबार में लेख लिखा जिसमें उन्होंने बताया, 'राष्ट्रीय कृषि आयोग की रिपोर्ट 2006 में जमा की गई थी लेकिन मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पदभार ग्रहण करने तक बेहद कम कार्रवाई हुई। अच्छी बात यह है कि पिछले चार सालों के दौरान किसानों की स्थिति और आमदनी में सुधार के लिए कई कदम उठाए गए हैं।' स्वामीनाथन ने संयमित भाषा में संप्रग सरकार की आलोचना की लेकिन मैं कहता हूं कि सारी सिफारिशों को नजरअंदाज कर दिया गया।

‘‘हमने किसानों की आमदनी सुरक्षा के लिए प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना शुरू की। खरीफ और रबी फसल में अब तक की सबसे न्यूनतम दर तय की गई है जो क्रमश: अधिकतम 2 प्रतिशत और 1.5 प्रतिशत है। इसके अलावा खड़ी फसल के साथ-साथ बुआई से पहले और कटाई के बाद के जोखिमों को भी इसमें शामिल किया गया। नुकसान के दावों का 25 प्रतिशत भुगतान भी तत्काल ऑनलाइन किया जा रहा है। ’’

संप्रग सरकार के अंतिम दो वर्ष के दौरान केवल 6.6 करोड़ किसानों को बीमा कवर मिला जबकि 2016-17 और 2017-18 के दौरान हमने 10.6 करोड़ किसानों को बीमा कवर दिया। जहां तक किसानों के आंदोलन का सवाल है तो हर वर्ग में राजनीतिक लोग हैं। देश में करोड़ों भूमिहीन, छोटे और सीमांत किसानों को सरकार की योजनाओं का फायदा मिल रहा है और वे कहीं कोई प्रदर्शन नहीं कर रहे हैं। आपको ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर यह देखना चाहिए कि हमारी नीतियों का कितना फायदा मिल रहा है।

प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान (पीएम-आशा) योजना असफल दिख रही है क्योंकि अनाज, दलहन और तिलहन की बिक्री एमएसपी से कम दर पर हो रही है। मध्य प्रदेश के अलावा किसी अन्य राज्यों ने नकद भुगतान के लिए आईटी ढांचा तैयार नहीं किया है। इस पर आपकी प्रतिक्रिया?

संप्रग सरकार के दौरान 14 खरीफ फसलों में से केवल तीन फसलों के लिए ही एमएसपी दिया जाता था और यह इनपुट लागत का 1.5 गुना थी जबकि हमने 2018-19 की खरीफ फसलों के लिए एमएसपी को लागत का डेढ़ गुना या उससे अधिक बढ़ा दिया। कीमतें जब भी एमएसपी से नीचे जाती हैं तब राज्य सरकारें हमें प्रस्ताव भेजती हैं और एजेंसी का नाम मुहैया कराती हैं जिसके बाद हम उन्हें स्वीकृति देते हैं। राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक मूल्य समर्थन योजना (पीएसएस) के अंतर्गत फसलों की खरीद करता है। वर्ष 2010-11 और 2013-14 में संप्रग सरकार के कार्यकाल के दौरान तिलहन और दलहन की खरीद करीब 840,000 टन थी लेकिन हमारी सरकार ने वर्ष 2014 से 2018 (अगस्त तक) खरीद में आठ गुना की बढ़ोतरी की।

कुछ वक्त पहले कृषि निर्यात क्षेत्र बनाने की बात चल रही थी,  उसमें कितनी प्रगति हुई है?

हमने कृषि निर्यात पर जोर दिया है और उसके नतीजे दिख रहे हैं। कृषि व्यापार निर्यात वर्ष 2010-14 की तुलना में 2014-18 में समुद्री उत्पादों में 95 फीसदी, बासमती को छोड़कर अन्य चावलों में 84 फीसदी, ताजे फलों में 77 फीसदी और ताजी सब्जियों के निर्यात में 43 फीसदी की तेजी आई। मोदी सरकार ने अपने बजट में 'ऑपरेशन ग्रीन' की पहल शुरू की। हम दलहन की खेती में आत्मनिर्भर नहीं थे लेकिन अग्रिम अनुमान के मुताबिक इसमें भी अच्छी बढ़ोतरी हुई है। 

मोदी सरकार ने किसानों की आमदनी वर्ष 2022 तक दोगुनी करने का वादा किया है। विशेषज्ञों के मुताबिक  इसके लिए चार सालों तक लगातार 20 फीसदी प्रति वर्ष वृद्धि दर की दरकार होगी। क्या आपको यह आंकड़ा मुमकिन लगता है?

प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में हमारा जोर कृषि उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ किसानों की आमदनी बढ़ाने पर भी है। आप बजट आवंटन में ही इसका अंतर देख सकती हैं। संप्रग सरकार ने 2009-14 के लिए 1,21,082 करोड़ रुपये का आवंटन किया जबकि वर्ष 2014-19 के लिए कृषि क्षेत्र के लिए बजट आवंटन 2,11,694 करोड़ रुपये है यानी इसमें 74 फीसदी की वृद्धि है। संप्रग की तुलना में हमने न केवल अनाज में रिकॉर्ड उत्पादन किया है बल्कि बागवानी का प्रदर्शन भी अच्छा रहा। मोदी सरकार ने न केवल सभी अधिसूचित जिंसों के लिए किसानों को उनकी लागत मूल्य का डेढ़ गुना एमएसपी के रूप में देने का फैसला किया है बल्कि इन कृषि जिंसों की खरीद के लिए भी नीति आयोग एवं राज्य सरकारों के साथ मिलकर नई योजना तैयार करने की पहल की है। हमने 22,000 ग्रामीण हाटों के लिए करीब 2,000 करोड़ रुपये खर्च करने की योजना बनाई। वास्तविकता यह है कि हमने कृषि क्षेत्र में निवेश बढ़ाया है और इसे आमदनी केंद्रित बनाया है। कृषि बाजार में सुधार के लिए राष्ट्रीय कृषि बाजार (ई-नाम) की शुरुआत की है जिससे 585 मंडियों को जोड़ा गया है।

मई में गन्ना किसानों की बकाया राशि 232 अरब रुपये हो गई, इस पर आपकी प्रतिक्रिया?

बाजार में मंदी की धारणा और चीनी की कीमतों में गिरावट की वजह से चीनी मिलों के सामने नकदी का संकट पैदा हो गया जिससे 2017-18 का शुगर सीजन प्रभावित हुआ और गन्ने की बकाया राशि बढ़ी। चीनी की कीमतों में स्थिरता लाने, मिलों में नकदी संकट कम करने के लिए सरकार ने चीनी आयात पर सीमा शुल्क 50 फीसदी से बढ़ाकर 100 फीसदी तक कर दिया ताकि गन्ने की बकाया राशि का भुगतान किया जा सके। केंद्र सरकार ने चीनी क्षेत्र की मदद के लिए 55.38 अरब रुपये की मदद की मंजूरी दी है। गन्ना किसानों की बकाया राशि चीनी मिलों की तरफ से सीधे किसानों के खाते में चली जाएगी।

ग्रामीण क्षेत्रों में उद्यमशीलता अब भी एक बड़ी चुनौती नहीं है?

राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के अंतर्गत हम कृषि उद्यमियों को पूंजी मुहैया करा रहे हैं। हमनें 150 से अधिक कृषि स्टार्टअप को भी सीधा सहयोग दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी यह चाहते हैं कि उद्यमशीलता प्रयोगशाला से जमीन पर दिखे। करीब 10,000 मृदा परीक्षण प्रयोगशालाएं तैयार कराई गई हैं जहां युवाओं को रोजगार मिल सकता है। अगर ये सभी कदम 10 साल पहले उठाए गए होते तो इनके परिणाम अब तक जरूर दिखते।

राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के चुनावों में किसानों की असंतुष्टि का असर दिखेगा? क्या पार्टी 2014 के प्रदर्शन को दोहरा पाएगी?

बेशक नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले चार सालों में कृषि क्षेत्र में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। सुदूर इलाकों में लोगों को घर में शौचालय की सुविधा मिली है। अब लोग बिजली से महरूम नहीं हैं। निश्चित तौर पर लोग मोदी के काम से प्रभावित हैं क्योंकि उन्हें यह अंदाजा है कि उनके इरादे नेक हैं। मुझे लगता है कि 2019 में 2014 से भी बड़ी जीत होगी। कांग्रेस ने गठबंधन सरकार में लोगों को दगा दिया है। कांग्रेस चंद्रशेखर, आई के गुजराल और एच डी देवेगौड़ा का अपमान करने से भी नहीं चूकी।

बिहार में राजग में सीटों के बंटवारे को लेकर मतभेद की स्थिति है। पिछले लोकसभा चुनावों के दौरान नीतीश कुमार राजग में नहीं थे तो इस बार वह अपना कितना असर दिखा पाएंगे?

मतदाता किसी व्यक्ति और नेता के पीछे नहीं भागता। जो भी मुख्यधारा के दलों (राजग या संप्रग) से अलग होगा वह खुद को अलग-थलग पाएगा। सीटों के बंटवारे पर कोई विवाद नहीं है क्योंकि केंद्रीय नेतृत्व की इस मामले पर नजर है। हम बिहार में 40 सीटों पर जीत दर्ज करेंगे।
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