बिजनेस स्टैंडर्ड - छोटे-मोटे उपायों से नहीं हो पाएगा दूषित हवा की समस्या का समाधान
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छोटे-मोटे उपायों से नहीं हो पाएगा दूषित हवा की समस्या का समाधान

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  November 19, 2018

दिल्ली में एकमात्र कोयला आधारित बिजली संयंत्र बंद कर दिया गया है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में ईंधन के रूप में पेटकोक इस्तेमाल करने वाले उद्योगों को परिचालन बंद करने को कहा गया है। सभी निर्माण गतिविधियां  रोक दी गईं हैं। स्टोन क्रशर, ईंट भट्ठों और हॉट मिक्स संयंत्रों को भी बंद किया गया। यह रोक 10 से अधिक दिन के लिए लगाई गई। दीवाली के बाद के सप्ताह में शहर में ट्रकों के प्रवेश पर भी रोक लगा दी गई। पुराने डीजल वाहन भी सड़कों से हटाये जा रहे हैं।  यह सुनिश्चित करने के लिए कड़े आदेश जारी किए गए हैं कि कूड़े को न जलाया जाए। सरकारी अधिकारी धूल को नियंत्रित करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। ये सभी कदम जानलेवा और जहरीले वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए उठाए गए हैं क्योंकि सर्दियां आ रही हैं और मौसम बिगड़ता जा रहा है। ये विशेष आपात कदम हैं, जो जन स्वास्थ्य के तात्कालिक खतरे से निपटने के लिए उठाए जा रहे हैं। 

 
मगर हकीकत यह है कि ये सब कदम उठाने के बावजूद पिछले सप्ताह वायु प्रदूषण का स्तर बहुत खराब श्रेणी में रहा। उन दिनों में प्रदूषण और भी ज्यादा रहा, जब मौसम खराब था और हवाएं पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण को लेकर दिल्ली-एनसीआर में ले आईं। कुल मिलाकर क्षेत्र में ज्यादातर गतिविधियों पर रोक लगा दी गई है, लेकिन वायु की गुणवत्ता उस स्तर के कहीं नजदीक भी नहीं है, जिस स्तर पर यह होनी चाहिए।  ऐसे में हमें क्या करना चाहिए? पहला यह स्पष्ट है कि  संकट बहुत बड़ा है, इसलिए छोटे-मोटे उपाय कारगर साबित नहीं होंगे। दूसरा, हम इस संकट का समाधान आपात उपायों से नहीं कर सकते। मैंने और मेरे सहयोगियों ने गे्रडेड रिस्पॉन्स ऐक्शन प्लान (जीआरएपी) का प्रस्ताव रखा था और इसे लागू भी किया गया है। लेकिन जीआरएपी उस समय त्वरित और ठोस कदम उठाने के लिए बनाया गया था, जब प्रदूषण खतरनाक स्तर को पार कर जाए। यह वह काम कर रहा है, जो यह कर सकता है। लेकिन जीआरएपी प्रदूषण को घटाने के लिए जरूरी कदमों का न विकल्प है और न हो सकता है। 
 
इसके लिए कदम उतना बड़ा होना चाहिए, जितनी बड़ी समस्या है। वर्ष 2000 की शुरुआत में उठाया गया कदम बड़ा था, जब दिल्ली में वाहनों के लिए संपीडि़त प्राकृतिक गैस (सीएनजी) को लागू किया गया था। महज दो साल की अवधि में 1 लाख वाहनों को सीएनजी में बदला गया। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि उस योजना में सबसे ज्यादा चलने वाले वाहनों को लक्षित किया गया, यानी शहर में सभी बसों और ऑटोरिक्शों को सीएनजी में तब्दील किया गया। सीएनजी की आपूर्ति की व्यवस्था की गई और जल्द ही इसमें भारी बढ़ोतरी की गई। सीएनजी वाहनों के लिए नए विनिर्माण संयंत्रों की स्थापना की गई। तकनीक खोजी गई और इसे अपनाया गया। 
 
ईंधन में सल्फर की मात्रा 10,000 पाट्र्स पर मिलियन (पीपीएम) से घटकर 500 पीपीएम पर आ गई। यह बड़ा बदलाव था और इससे हमें बड़े फायदे मिले। हम शाम का आकाश और रात में तारे देख सकते थे। लेकिन अब हम जो कदम उठा रहे हैं, वे संकट के आकार से मेल नहीं खा रहे हैं। मेरा मानना है कि पिछले साल की हमारी सबसे बड़ी जीत यही हैं कि हमने ईंधन के रूप में प्रदूषक पेट कोक के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया, उद्योग के लिए सल्फर और नाइट्रोजन ऑक्साइड उत्सर्जन के मानक तय किए हैं और 2020 तक पेट्रोल तथा डीजल सल्फर के 10 पीपीएम की तरफ बढऩे यानी ईंधन एवं उत्सर्जन मानक भारत स्टेज 6 (बीएस6) को अपनाने पर सहमति जताई है। 
 
लेकिन इनका फायदा लेने के लिए कुछ और उपायों की जरूरत है। पहला, हमें उद्योगों और अन्य संसाधनों में कड़े उत्सर्जन मानक लागू करने की जरूरत है। यही हमारी कमजोर नब्ज है। हम प्रदूषण नियंत्रण उपाय इसलिए नहीं लागू कर सकते क्योंकि हमारे पास अनुपालना सुनिश्चित करने के लिए संस्थागत साधन नहीं हैं। हमारे प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों पर काम का भारी दबाव है और उनमें कर्मचारियों की कमी है। उनमें उत्सर्जनों के निरीक्षण के लिए बुनियादी उपकरण भी नहीं हैं।  बीते वर्षों के दौरान हमने अनुपालना के लिए निजी क्षेत्र की सेवाएं ली हैं, जो कारगर नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में हमने कारोबार को आसान बनाने के नाम पर मामूली निगरानी को भी कमजोर बना दिया है। कहा जा रहा है कि इससे 'इंसपेक्टर राज' आता है और लेनदेन की लागत बढ़ती है। इसकी जगह हमने ऑनलाइन निगरानी लागू की है, जो निष्प्रभावी है। इसे एक घोटाला करार दिया जा सकता है। 
 
इसके बाद एकमात्र विकल्प यही बच जाता है कि उद्योग के लिए स्वच्छ ईंधन, प्राकृतिक गैस एवं बिजली का इस्तेमाल अनिवार्य बनाया जाए। अगर प्रदूषण पर नियंत्रण के जरिये अंकुश नहीं लगाया जा सकता है तो ईंधन में ही बदलाव के जरिये अंकुश लगाया जाए। जब बीएस6 को लागू किया जाएगा, तब ईंधन में सल्फर की मात्रा 50 पीपीएम से घटाकर 10 पीपीएम की जाएगी। यह बड़ी कमी नहीं है। अब बड़ी पहल ईंधन की गुणवत्ता नहीं बल्कि उत्सर्जन नियंत्रित करने के लिए वाहन तकनीक में सुधार है। वाहनों के उत्सर्जन में बड़ी कमी आएगी, जो 60 से 90 फीसदी घटने का अनुमान है। लेकिन ये वाहन अप्रैल, 2020 में आएंगे। यह अपने आप में एक बड़ी जीत है क्योंकि वाहन कंपनियां इसका विरोध कर रही हैं। बीएस6 के लाभ मिलने में समय लगेगा क्योंकि बेड़े बदलने में समय लगेगा। भारत कोई अमीर देश नहीं है, जहां पुराने वाहनों को रातोरात सड़कों से हटाया जा सकता है। इसलिए इस बार ईंधन नहीं बल्कि बेड़े से असर पड़ेगा। हमें सड़कों पर वाहन घटाने की दिशा में कदम बढ़ाने होंगे। इसके लिए सार्वजनिक परिवहन प्रणाली में भारी बढ़ोतरी की जरूरत है। कई बार हम इसके बारे में बात करते हैं, लेकिन इसके लिए करते कुछ भी नहीं हैं। यही स्वच्छ हवा के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। 
 
(लेखिका सेंटर फॉर साइंस ऐंड एन्वायरनमेंट से जुड़ी हैं।)
Keyword: delhi, pollution, industry, petcoke,,
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