बिजनेस स्टैंडर्ड - आरबीआई की अहम बैठक आज
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आरबीआई की अहम बैठक आज

सोमेश झा / नई दिल्ली 11 18, 2018

पीसीए पर नरम हो सकता है रुख

एनबीएफसी तरलता बढ़ाने पर तनातनी के आसार
कुछ बैंकों को निश्चित मानदंडों के आधार पर पीसीए से बाहर करने पर हो सकती है सहमति
आर्थिक पूंजी ढांचे और आरबीआई में प्रशासन पर चर्चा के लिए बन सकती है एक समिति
एमएसएमई को नकदी जरूरतों के लिए मिल सकती है नियमों में कुछ ढील
एनबीएफसी को पुनर्वित्त के लिए विशेष सुविधा मिलने पर संशय

बिजनेस स्टैंडर्ड आरबीआई की अहम बैठक आजभारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के केंद्रीय बोर्ड की सोमवार को होने वाली बेहद अहम बैठक में सार्वजनिक क्षेत्र के कुछ बैंकों को त्वरित उपचारात्मक कदम (पीसीए) प्रारूप से बाहर रखने पर सहमति की संभावना दिख रही है लेकिन गैर-बैंकिंग वित्त कंपनियों (एनबीएफसी) की तरलता स्थिति सुधारने के लिए पुनर्वित्त मुहैया कराने के लिए खास व्यवस्था बनाने की सरकार की मांग को लेकर तनातनी बनी रह सकती है। सूत्रों के मुताबिक केंद्रीय बोर्ड की बैठक में प्रारंभिक चेतावनी देने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले पीसीए प्रारूप से कुछ बैंकों को बाहर रखने पर दोनों पक्षों के बीच सहमति बन सकती है। लेकिन ऐसा तभी होगा जब सरकार भी इन बैंकों की पूंजी जरूरतों को पूरा करने को लेकर आरबीआई की शर्तों पर सहमति जताएगी। 

पिछले कुछ हफ्तों से सरकार और आरबीआई के बीच चल रही खींचतान के बीच केंद्रीय बोर्ड की इस बैठक को काफी अहम माना जा रहा है। इस बैठक के पहले दोनों पक्षों के बीच कई स्तरों पर बातचीत का दौर चला है। इन चर्चाओं से जुड़े रहे सूत्रों ने ऐसे संकेत दिए कि आरबीआई पीसीए के सवाल पर अपना रुख नरम कर सकता है। एक सूत्र ने कहा, 'ऐसे संकेत हैं कि आरबीआई दो-तीन बैंकों को पीसीए मानकों से छूट दे सकता है बशर्ते सरकार इन बैंकों में जल्द ही दोबारा पूंजी डालने की प्रतिबद्धता जताए।'

सरकार ने पहले आरबीआई से कहा था कि पीसीए के दायरे में रखे गए 11 सार्वजनिक बैंकों में से कुछ बैंकों में सुधार के संकेत दिखे हैं और मौजूदा दिवालिया प्रक्रिया के चलते वे तगड़ी रिकवरी की उम्मीद कर रहे हैं। हालांकि आरबीआई ने सार्वजनिक बैंकों की पूंजी जरूरतों पर चिंता जताते हुए कहा है कि सरकार को इनमें जल्द ही पुनर्वित्त मुहैया कराना चाहिए। पीसीए के दायरे में रखे गए सभी 11 बैंकों का एनपीए अनुपात छह फीसदी की सीमा से काफी अधिक है लेकिन वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही खत्म होने तक कुछ बैंकों का कवरेज अनुपात सुधरा है।

दूसरी तिमाही में इन सभी बैंकों का शुद्ध घाटा कुल मिलाकर 100 अरब रुपये रहा है। वैसे सरकार को उम्मीद है कि दिवालिया संबंधी 12 मामलों का समाधान होने से वर्ष 2018-19 में सार्वजनिक बैंकों को सम्मिलित रूप से 1.8 लाख करोड़ रुपये की रिकवरी होगी। बहरहाल आरबीआई एनबीएफसी क्षेत्र में तरलता की कमी को लेकर सरकार के रुख से सहमत नहीं दिख रहा है। वित्त मंत्रालय के साथ  विमर्श के दौरान आरबीआई ने कहा था कि एनबीएफसी में तरलता कमी कोई व्यवस्थागत मसला नहीं है। हालांकि सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम इकाइयों को तरलता के मोर्चे पर थोड़ी राहत मिल सकती है।

आरबीआई बोर्ड में शामिल कुछ स्वतंत्र सदस्यों की तरफ से नतीजा नहीं निकलने पर मतदान कराने का प्रस्ताव भी सरकार के समक्ष रखने की चर्चाएं हैं लेकिन न तो सरकार और न ही आरबीआई इसके पक्ष में नजर आ रहा है। हालांकि सूत्रों का कहना है कि सरकार सभी विकल्पों को खुला रखे हुए है। सूत्र ने कहा, 'कुछ स्वतंत्र बोर्ड सदस्य मतदान पर जोर दे रहे हैं लेकिन अंतिम विकल्प के तौर पर ही इसका इस्तेमाल होगा। कोई भी पक्ष सीधे उस दिशा में नहीं बढऩा चाहता है।' बोर्ड की बैठक में सरकार की तरफ से उठाए गए कई अन्य मुद्दों पर भी चर्चा होने की संभावना है। इस बोर्ड में वित्त मंत्रालय के शीर्ष अधिकारी सरकार का प्रतिनिधित्व करेंगे। इसके अलावा सरकार की तरफ से नियुक्त स्वतंत्र निदेशक भी आरबीआई के गवर्नर एवं डिप्टी गवर्नरों के साथ होने वाली बैठक में शिरकत करेंगे। 

माना जा रहा है कि 23 अक्टूबर को हुई पिछली बैठक की तरह इस बार की बैठक भी कई घंटों तक चल सकती है। सूत्रों का कहना है कि सोमवार को सभी मुद्दों पर फैसला नहीं हो पाने की स्थिति में इस बैठक को मंगलवार तक बढ़ाया भी जा सकता है। सूत्रों के मुताबिक दोनों पक्ष आर्थिक पूंजीगत मसौदे की समीक्षा और केंद्रीय बोर्ड की कार्यप्रणाली संबंधी मानकों को दुरुस्त करने जैसे मुद्दों पर चर्चा के लिए समितियां बनाने पर राजी हो सकते हैं।

आरबीआई ने अपने आर्थिक पूंजीगत मसौदे को शिथिल करने को लेकर हिचक दिखाई है। यह मसौदा ही रिजर्व बैंक के पास पड़े अधिशेष का केंद्र सरकार को किए जाने वाले हस्तांतरण को निर्धारित करता है। सरकार को लगता है कि आरबीआई के पास 3.6 लाख करोड़ रुपये की अतिरिक्त पूंजी पड़ी हुई है और वह उसे अधिशेष के तौर पर अपने पास हस्तांतरित कराना चाहती है। लेकिन आरबीआई का मानना है कि भविष्य में कोई संकट पैदा होने और बाह्य आघातों से निपटने के लिए उसकी बैलेंस शीट सशक्त होना जरूरी है।वैसे रिजर्व बैंक अपने शासन संबंधी मानकों की समीक्षा के लिए तैयार दिख रहा है। 

आरबीआई सामान्य नियमन 1949 में निर्धारित ये मानक केंद्रीय बैंक की निर्णय-निर्माण प्रक्रिया को तय करते हैं। सरकार चाहती है कि आरबीआई के बोर्ड की तरफ से बनाई जाने वाली समितियों में अधिक स्वतंत्र निदेशकों को नियुक्त किया जाए। आरबीआई के बोर्ड में फिलहाल 18 सदस्य हैं लेकिन मतदान की स्थिति आने पर सरकार के नामित प्रतिनिधियों और रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नरों को मत देने का अधिकार नहीं होता है। आरबीआई के मनोनीत निदेशक एस गुरुमूर्ति की हालिया टिप्पणी ने  मौजूदा तनाव को जाहिर किया था। गत गुरुवार को एक कार्यक्रम में गुरुमूर्ति ने पूंजी पर्याप्तता संबंधी मानकों की आलोचना की थी। 

आरबीआई बोर्ड के एक सदस्य ने इसकी तुलना विरल आचार्य के भाषण से करते हुए कहा कि यह एक अच्छा संकेत नहीं है।आरबीआई ने सरकार की तरफ से भेजे गए तीन पत्रों पर अपनी असहजता का इजहार किया है। वित्त मंत्रालय के इन पत्रों में रिजर्व बैंक के गवर्नर से आरबीआई अधिनियम की धारा 7 के तहत दर्जन भर मुद्दों पर सरकार से विमर्श करने को कहा था।
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