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असली-नकली की पहेली में उलझी जांच एजेंसी

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  November 18, 2018

'हम सीबीआई से हैं...असली वाले' यह संवाद नीरज पांडेय की बेहतरीन फिल्म स्पेशल 26 से लिया गया है जिसे फिल्म में बोला है सीबीआई इंसपेक्टर वसीम खान की भूमिका निभा रहे अभिनेता मनोज वाजपेयी ने। उन्हें असली वाले होने का दावा इसलिए करना पड़ा क्योंकि अक्षय कुमार के नेतृत्व वाला ठगों का एक समूह भी था जो सीबीआई बनकर अमीरों के यहां छापा मारता था और पैसे लेकर चंपत हो जाता था। इन दिनों सर्वोच्च न्यायालय में वास्तव में ऐसे ही हालात बने हुए हैं। सीबीआई के दो शीर्षस्थ अधिकारियों के नेतृत्व वाले दो समूह खुद को असली और दूसरे को नकली बता रहे हैं। इस मामले में सरकार भी एक पक्ष के साथ है, मुख्य सतर्कता आयुक्त किसी निर्णय पर नहीं पहुंच पा रहे हैं क्योंकि उनके ऊपर भी एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश है। इतना ही नहीं हर कोई देश के सर्वाधिक दुर्जेय सामाजिक कार्यकर्ताओं ओर अधिवक्ताओं की निगाह में है।
 
ऐसा इसलिए क्योंकि कोई किसी पर विश्वास नहीं करता। सब एक दूसरे पर निगाह रखे हुए हैं। ऐसे में वही हो रहा है जो नौकरशाही करती है। समय काटा जा रहा है। अगर हमारी परंपरा के मुताबिक तारीख पे तारीख का सिलसिला चलता रहा तो मौजूदा सीबीआई निदेशक का कार्यकाल जनवरी में समाप्त हो जाएगा। उसके बाद नंबर दो की भी विदाई और नए सीबीआई प्रमुख की तलाश आरंभ। किस्सा खत्म। इस बीच हमारी शीर्ष भ्रष्टाचार निरोधक संस्था पंगु बनी रहेगी। उसके शीर्ष अधिकारी एक दूसरे के खिलाफ जानकारी सार्वजनिक करते रहेंगे। मेरी सहयोगी अनन्या भारद्वाज ने इसे सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इनेक्टिविटी का नाम उचित ही दिया है। कार्यवाहक निदेशक का नाम भी संदेह से परे नहीं है।
 
इन हालात का लाभ लेते हुए आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने कह दिया है कि सीबीआई उनके राज्य के मामलों की जांच नहीं करेगी। ममता बनर्जी ने भी उनका समर्थन किया है। आने वाले दिनों में कई अन्य राज्य तथा जांच का सामना कर रहे विपक्षी नेता उनकी हिमायत कर सकते हैं। इस तरह एक संवैधानिक संकट उत्पन्न हो सकता है।  अदालतों को दोष देना सही नहीं है। वे दो दशकों से कुछ करने का प्रयास तो कर रही हैं। मैं सीबीआई सुधार में कमी का दोष उन पर नहीं दूंगा। जैसा कि हम देख सकते हैं सीबीआई की समस्याएं ऐसी हो चुकी हैं कि अदालतें, सरकार या सामाजिक कार्यकर्ता उसकी सफाई नहीं कर सकते। भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी तो कतई नहीं।
 
ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि दो दशकों तक बहुत बड़ी तादाद में अच्छे लोगों और संस्थानों ने इस पर काम किया, इसे बचाया और अब यह एक ऐसा जंगली जानवर बन चुका है जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता है। जिसे एक वक्त पिंजरे में बंद तोता बताया गया था उसने सन 1990 के दशक (याद करें हवाला कांड) से ही हमारी राजनीति को बंधक बना लिया है, तमाम राजनेताओं के करियर खराब करने और उभारने तक में उसकी भूमिका रही है। लालकृष्ण आडवाणी (जैन हवाला), पी वी नरसिंह राव (झामुमो रिश्वत कांड), ए राजा (2जी) और दयानिधि मारन (टेलीफोन एक्सचेंज मामला) आदि सब बरी हो गए। इस बीच इसकी बिना सबूत स्कैंडल की प्रवृत्ति ने हमारी अर्थव्यवस्था को भी नुकसान पहुंचाया।
 
उसने हर दौर में तत्कालीन सरकार का बखूबी साथ निभाया। बोफोर्स जैसे मामले को जरूरत के मुताबिक उभारना और दबाना इसका उदाहरण है। इस प्रक्रिया में कोई दंडित नहीं हुआ और अब तो उस मामले के सभी आरोपित भी मर चुके हैं। जैन हवाला मामला और 2जी स्पेक्ट्रम मामला सीधे सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में होने के बावजूद टिक नहीं सके। अदालत ने बार-बार हस्तक्षेप करके इसे अधिकारसंपन्न, स्वतंत्र और निष्पक्ष बनाने का प्रयास किया, उसके निदेशक को दो वर्ष का तयशुदा कार्यकाल दिया गया, प्रत्याशी चयन के लिए तीन सदस्यीय सरकारी समिति का गठन किया गया और बाद में मुख्य सतर्कता आयुक्त, नेता प्रतिपक्ष और देश के प्रधान न्यायाधीश की सहायता से कहीं अधिक स्वतंत्र व्यवस्था कायम की गई। यह पूरी सरकारी व्यवस्था में  इकलौती ऐसी कार्यकारी नियुक्ति है जिसमें देश के प्रधान न्यायाधीश को शामिल किया गया है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि सीबीआई को कितनी गंभीरता से लिया जाता रहा है? लेकिन इसके द्वारा हासिल परिणाम इस गंभीरता को उचित नहीं ठहराते।
 
कमजोर सीबीआई तो बुरी थी ही, मजबूत सीबीआई और खराब साबित हुई। कोई विद्वान चाहे तो सरकारों द्वारा न्यायिक निगरानी में नई व्यवस्था के तहत नियुक्त निदेशकों के कार्यकाल में भी सीबीआई के दुरुपयोग पर पीएचडी कर सकता है। याद रहे कि कैसे जब संप्रग सरकार को संसद में विश्वास मत का सामना करना पड़ता था तो अखबारों के पहले पन्नों पर मुलायम सिंह यादव और मायावती के खिलाफ जांच में प्रगति के किस्से सामने आने लगते थे। एक बार मतदान होने के बाद ये किस्से भी ठंडे पड़ जाते थे।
 
गुजरात में नरेंद्र मोदी, अमित शाह तथा उनके वफादार पुलिस अधिकारियों के खिलाफ भी इसे ऐसे ही इस्तेमाल किया गया। यहां तक कि इशरत जहां मामले में तो एक शीर्ष खुफिया ब्यूरो अधिकारी तक को घसीट लिया गया। इस मामले पर आपका नजरिया चाहे जो भी हो अहम यह है कि हुआ क्या? मामला खिंचता रहा। एजेंसी के मुखिया को लग गया कि संप्रग कमजोर पड़ रहा है। मोदी के आगमन के साथ ही मामला ठंडे बस्ते में चला गया। ध्यान रहे कि जब चंद्रबाबू नायडू भाजपा के सहयोगी थे तब सीबीआई ने उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी वाई एस जगनमोहन रेड्डी के खिलाफ मामलों को अपनी सबसे बड़ी प्राथमिकता बनाया। इनकी शुरुआत उस समय हुई थी जब संप्रग का शासन था और वह कांग्रेस से दूर हो रहे थे। आज, नायडू भाजपा से दूर और कांग्रेस के करीब हो रहे हैं जबकि रेड्डी भाजपा के सहयोगी बनने की ओर अग्रसर हैं तो सारे मामले भुला दिए गए हैं। इससे पहले सीबीआई उनको जमानत पर बाहर नहीं आने दे रही थी और अब सारे मामले ठप हो रहे हैं। वह अच्छे व्यक्ति बन गए हैं। नायडू की चिंता जायज है कि अब उनकी बारी आ सकती है।
 
सीबीआई में सुधार की हर कोशिश नाकाम होने के पीछे एक वजह यह है कि इसके डिजाइन में सुधार की गुंजाइश ही नहीं है। दिल्ली के मझोले दर्जे के नौकरशाह बीके बंसल और उनके परिवार ने इसलिए सामूहिक आत्महत्या कर ली क्योंकि वह सीबीआई की पूछताछ झेल नहीं पाए। अगर किसी भी पुलिस बल के पास इतनी शक्ति होगी, खासकर ऐसी व्यवस्था में जहां न्यायपालिका इतनी धीमी गति से काम करती हो और सजा होने में इतना अधिक वक्त लगता हो, वहां सीबीआई जैसे बल में संस्थागत अनुशासन की खासतौर पर आवश्यकता है।
 
अदालतों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसका एकदम उलट काम किया है और राजनेताओं ने इसका फायदा उठाया है। विनीत नारायण मामले में अपने पहले ऐतिहासिक आदेश में सर्वोच्च न्यायालय ने न केवल सीबीआई की शक्ति और उसके प्रमुख का कार्यकाल बढ़ाया बल्कि यह भी कहा कि हर वह मामला जिसमें आरोपित बरी हो रहा हो, उसका परीक्षण पैनल के एक अधिवक्ता से कराया जाए और जवाबदेही तय की जाए। अगर किसी तरह की कमी पाई जाती है तो संबंधित अधिकारी के खिलाफ सेवा में कमी का मामला चले। जाहिर है ऐसा कुछ नहीं हुआ क्योंकि राजनेताओं ने अदालती आदेश में से अपनी पसंद की चीजें उठाईं और उनका फायदा लिया।
 
ऐसे में आश्चर्य नहीं कि सीबीआई के पिछले चार में से तीन भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहे हैं। इनमें से दो की नियुक्ति लोकपाल कानून 2013 के तहत नई व्यवस्था में हुई जहां देश के प्रधान न्यायाधीश की भी भूमिका चयन में होती है। इस बात की भी कोई गारंटी नहीं है कि अगला निदेशक पिछलों से बेहतर होगा। इस कार्यालय में अधिकारों की कमी नहीं है और जवाबदेही बेहद कम है। ऐसे अस्तव्यस्त सांस्थानिक ढांचे में केवल एक सुपरमैन ही असली सीबीआई होने का दावा कर सकता है।
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