बिजनेस स्टैंडर्ड - तीन अहम मुद्दों पर आरबीआई और सरकार में मतभेद
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तीन अहम मुद्दों पर आरबीआई और सरकार में मतभेद

ईशान बख्शी /  November 18, 2018

सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के बीच मतभेद कई मुद्दों को लेकर हैं, जिन पर केंद्रीय बैंक की सोमवार को होने वाली बैठक में चर्चा होगी। माना जा रहा है कि इनमें से तीन मुद्दे अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है।  पहला, नकदी की किल्लत है, जिसका सामना आईएलऐंडएफएस संकट के बाद गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) को करना पड़ रहा है। दूसरा, आरबीआई ने बहुत से बैंकों को अपनी त्वरित उपचारात्मक कार्रवाई ढांचे में शामिल किया है, जिससे सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्यमों (एमएसएमई) को ऋण मिलने में अड़चनें पैदा हुई हैं। तीसरा, आरबीआई के पास अतिरिक्त पूंजी है या नहीं। 

 
नकदी की चिंताओं का समाधान
 
आईएलऐंडएफएस घटनाक्रम के बाद एनबीएफसी की वित्तीय हालत को लेकर चिंताएं पैदा हुई हैं। कुुछ का तर्क है कि वाणिज्यिक पत्रों के खरीदार सतर्क हो गए हैं, जिससे एनबीएफसी के पास नकदी कम हो रही है। इससे उनके लिए कर्ज के भुगतान के लिए नया ऋण लेना मुश्किल होगा। नवंबर का महीना विशेष रूप से अहम होगा क्योंकि एनबीएफसी का 1.53 लाख करोड़ रुपये का कर्ज परिपक्व होने जा रहा है। अगर नाबार्ड, एनएचबी, एलआईसी हाउसिंग जैसी तुलनात्मक रूप सुरक्षित संस्थाओं के कर्ज को शामिल नहीं भी करते हैं तो एनबीएफसी का 1.03 लाख करोड़ रुपये का कर्ज नवंबर में परिपक्व होगा। नवंबर के दो सप्ताह बीत चुके हैं और असामान्य सन्नाटा छाया हुआ है। 
 
बिज़नेस स्टैंडर्ड के आंकड़े दर्शाते हैं कि नवंबर के पहले पखवाड़े में एनबीएफसी 1.03 लाख करोड़ रुपये के वाणिज्यिक पत्र जारी करने में सफल रही हैं, जबकि इस अवधि में उनका परिपक्व होने वाला कर्ज 726.8 अरब रुपये था। इस अवधि में जारी वाणिज्यिक पत्रों के प्रतिफल से इस प्रणाली पर कोई दबाव नहीं होने के संकेत मिलते हैं। लेकिन ये आकंड़े हकीकत को बयां नहीं करते हैं। लेकिन बारीक आंकड़े दर्शाते हैं कि कुछ एनबीएफसी के लिए प्रतिफल 10 फीसदी तक पहुंच गया है। लेकिन कुल मिलाकर प्रतिफल में उतनी बढ़ोतरी नहीं हुई है, जितनी आशंका जताई जा रही थी। इसके अलावा एनबीएफसी अपने ऋण को आगे  बढ़ाने या चुकाने में सफल रही हैं। बुनियादी सवाल यह है कि कौन वाणिज्यिक पत्र खरीद रहा है? और क्या बाजार में हालात सामान्य हो गए हैं? बिज़नेस स्टैंडर्ड ने जिन बाजार भागीदारों से बात की, उन्होंने कहा, 'यह संभव है कि एसबीआई और एलआईसी जैसे वित्तीय संस्थान बाजार को शांत करने के लिए आगे आए हैं।' उन्होंने कहा, 'यह भी संभव है कि म्युचुअल फंडों ने भी कर्ज को आगे बढ़ाने में मदद की हो क्योंकि डिफॉल्ट का उन पर बुरा असर पड़ सकता है।'
 
बिज़नेस स्टैंडर्ड को विशेषज्ञोंं ने बताया कि बॉन्डों की अधिक खरीद-फरोख्त से भी भुगतान देनदारियों को पूरा करने में मदद मिल सकती है। क्रिसिल रेटिंग्स के मुताबिक अक्टूबर में बॉन्ड निर्गम 180 अरब रुपये पर पहुंच गए थे। नवंबर के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन इसमें भी बड़ी तादाद में बॉन्ड जारी होने की संभावना है। हालांकि प्रतिफल में इजाफा हुआ है।  भले ही हालात में सुधार आया हो, लेकिन यह कहना जल्दबाजी होगी कि बुरा दौर बीत चुका है। विशेषज्ञों ने कहा कि विशेषज्ञों ने कहा, 'एनबीएफसी का 720 अरब रुपये का कर्ज 19 से 30 नवंबर के बीच परिपक्व हो रहा है। एक भी डिफॉल्ट के बड़े असर हो सकते हैं।' यहां यह जिक्र करना महत्त्वपूर्ण है कि एनबीएफसी में नकदी की किल्लत का एमएसएमई को कर्ज मिलने पर असर पड़ सकता है। 
 
ट्रांसयूनियन सिबिल के आंकड़े दर्शाते हैं कि एमएसएमई को कुल कर्ज में एनबीएफसी का हिस्सा जून, 2016 में 8.4 फीसदी था, जो जून, 2018 में 11.3 फीसदी पर पहुंच गया। इसका मतलब है कि अगर एनबीएफसी की वित्तीय स्थिति खराब हुई तो एमएसएमई को कर्ज की उपलब्धता पर असर पड़ेगा। 
 
त्वरित उपचारात्मक कार्रवाई ढांचे में ढील 
 
सरकार और आरबीआई के बीच असहमति का एक अन्य मुद्दा केंद्रीय बैंक के पीसीए ढांचे को लेकर है। भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के 21 बैंक हैं, जिनमें से 11 इस समय पीसीए के तहत हैं। पीसीए के दायरे में आने से बैंक के कामकाज पर अंकुश लगता है। इसलिए सरकार का मानना है कि आरबीआई के इस कदम से एमएसएमई को ऋण मिलने में कमी आई है। बुनियादी सवाल यह है कि क्या आरबीआई को अपने पीसीए ढांचे में बदलाव करना चाहिए? क्या इसे पीसीए में शामिल बैंकों को एमएसएमई को ऋण देने की मंजूरी दी जानी चाहिए या कुछ बैंकों को इससे बाहर निकलने की मंजूरी दी चाहिए? क्या इससे एमएसएमई को ऋण मिलने में सुधार आएगा? 
 
तिमाही नतीजे दर्शाते हैं कि अब कुछ पीसीए बैंकों की वित्तीय स्थिति में सुधार आया है, लेकिन यह अब भी संकटपूर्ण स्थिति में बनी हुई है। केयर रेटिंग्स के आंकड़ों के मुताबिक इन बैंकों का कुल एनपीए मार्च, 2018 में अब तक के सर्वोच्च स्तर पर पहुंच गया था। लेकिन अब उनकी लोन बुक सिकुड़ गई है। इन बैंकों के कुल अग्रिम वित्त वर्ष 2019 की दूसरी तिमाही में घटकर 16.39 लाख करोड़ रुपये पर आ गए, जो वित्त वर्ष 2017 की चौथी तिमाही में 17.65 लाख करोड़ रुपये थे। उनका जीएनपीए अनुपात (अग्रिमों का प्रतिशत) बिगड़ा है। यह वित्त वर्ष 2018 की चौथी तिमाही में 20.45 फीसदी था, जो वित्त वर्ष 2019 की दूसरी तिमाही में 21.01 फीसदी हो गया। 
 
दूसरी तरफ इस अवधि में इन बैंकों के प्रावधान अनुपात में सुधार हुआ है। लेकिन उनका घाटा वित्त वर्ष 2019 की दूसरी तिमाही में घटकर 101 अरब रुपये पर आ गया है, जो वित्त वर्ष 2018 की चौथी तिमाही में 260 अरब रुपये था। इनमें से केवल तीन बैंकों- बैंक ऑफ महाराष्ट्र, ओरियंटल बैंक ऑफ कॉमर्स (ओबीसी) और कॉरपोरेशन बैंक ने वित्त वर्ष 2019 की दूसरी तिमाही में लाभ दर्ज किया है।  इनमें से भी ओबीसी और कॉरपोरेशन बैंक, बैंक ऑफ महाराष्ट्र की तुलना में बेहतर स्थिति में हैं। इन दोनों बैंकों का पूंजी पर्याप्तता अनुपात और उच्च प्रावधान अनुपात उच्च है। दोनों ने सकल एनपीए में भी गिरावट दर्ज की है। हालांकि उनका शुद्ध एनपीए क्रमश 10 फीसदी और 11.65 फीसदी के स्तर पर है, जो पीसीए जोखिम के पहले स्तर 6 फीसदी से काफी अधिक है। क्या इन बैंकों को पीसीए से बाहर करने और उनकी ऋण बंदिशों में ढील देने से एमएसएमई को ऋण उपलब्धता में सुधार आएगा? इसके बारे में कुछ कहना मुश्किल है। बिज़नेस स्टैंडर्ड के आंकड़े दर्शाते हैं कि पीसीए में शामिल 12 बैंकों (एक निजी बैंक सहित) में से 10 31 मार्च, 2018 को पहले ही प्राथमिकता क्षेत्र को 7.5 फीसदी ऋण का लक्ष्य हासिल कर चुके हैं। फिर इसमें डायरेक्शन ऋण को भी शामिल किया जाना चाहिए। आरबीआई के आंकड़े दर्शाते हैं कि औसत स्तर पर सूक्ष्म एवं लघु उद्योगों को बैंक ऋण सितंबर, 2018 में बढ़कर 9.9 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया, जो अप्रैल, 2014 में 7.2 लाख करोड़ रुपये था। 
 
लेकिन सेवा क्षेत्र में सूक्ष्म एवं लघु उद्योगों को ऋण में ज्यादा वृद्धि हुई है। इन उद्योग को ऋण आलोच्य अवधि में 3.7 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 6.3 लाख करोड़ रुपये हो गया। इसकी तुलना में उद्योग में सूक्ष्म एवं लघु उद्योगों को ऋण में इस दौरान मुश्किल से कोई वृद्धि हुई है। हालांकि यह हालत केवल सूक्ष्म एवं लघु उद्योगों में ही नहीं है। लघु एवं मझोली औद्योगिक कंपनियों की भी यही हालत है। इससे यह सवाल पैदा होता है कि अगर उद्योग को बैंक ऋण उसी स्तर पर बना रहता है, जिस पर वह चार साल पहले था तो क्या पीसीए ढांचे में बदलाव से एमएसएमई को ऋण मिलने में बढ़ोतरी होगी? 
 
आर्थिक पूंजी ढांचा 
 
एक अन्य विवादास्पद मुद्दा आरबीआई के आर्थिक पूंजी ढांचे से संबंधित है। सरकार आरबीआई के आर्थिक पूंजी ढांचे पर चर्चा करना चाहती है। इसका मकसद यह निर्धारित करना है कि आरबीआई के पास जो आरक्षित कोष (आकस्मिक कोष तथा मुद्रा और स्वर्ण पुनर्मूल्यांकन कोष) है, वह उसकी जरूरत से अधिक है या नहीं।  जून, 2018 के अंत में आरबीआई का मुद्रा और स्वर्ण पुनर्मूल्यांकन आरक्षित कोष 6.9 लाख करोड़ रुपये था, जो पिछले साल से 1.6 लाख करोड़ रुपये अधिक है। आरबीआई को इस दौरान रुपये में गिरावट का फायदा मिला है। कुछ का तर्क है कि इस कोष को आरबीआई की पूंजी गणना से बाहर किया जाना चाहिए क्योंकि यह नहीं मिलने वाला फायदा है। इसमें यह तर्क दिया जा सकता है कि इस मामले में होने वाले नुकसान की भरपाई आकस्किता कोष से होती है। इसके अलावा भी आरबीआई का 12 फरवरी का परिपत्र और बैंकों का पूंजी पर्याप्तता स्तर जैसे कई मुद्दे हैं। इन पर बोर्ड की बैठक में चर्चा होने की संभावना है। 
 
साथ में अभिषेक वाघमारे 
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