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नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बदलाव की बयार!

आर कृष्णा दास /  11 18, 2018

छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव

छत्तीसगढ़ में हाल में संपन्न हुए पहले चरण के विधानसभा चुनाव के दौरान आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की टीम, सुरक्षाकर्मी और शिक्षक लोगों को नक्सल प्रभावित इलाकों में निडर होकर मतदान करने के लिए प्रेरित कर रहे थे। बता रहे हैं आर कृष्णा दास

बिजनेस स्टैंडर्ड नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बदलाव की बयार!अक्टूबर के आखिरी हफ्ते की एक दोपहर छत्तीसगढ़ के अशांत जिला सुकमा के भेजी गांव में रहने वाली गृहिणी सुधा तांती के घर कुछ लोग आए। इन मेहमानों में महिलाओं का एक समूह था। ये महिलाएं उनके दरवाजे पर फूलों से सजी थाली लेकर खड़ी थीं। उस थाली में कसैली, चावल और हल्दी भी रखी थी। इस समूह की सदस्यों में से एक शीतल कुंजम ने कहा, 'अम्मा, हम आपको निमंत्रण देने के लिए आए हैं।' पिछले महीने ही तांती ने 70 साल पूरे किए। तांती उस वक्त थोड़ी भ्रमित सी दिखीं। वक्त बर्बाद किए बगैर ही कुंजम मुद्दे की बात पर आ गईं। उन्होंने मुस्कराते हुए तांती के माथे पर हल्दी और चावल का टीका लगाया और उन्हें कसैली का एक टुकड़ा देते हुए कहा, 'अम्मा हम अगले कुछ दिनों में लोकतंत्र का सबसे बड़ा त्योहार मनाने जा रहे हैं और हम आपको इसमें पूरे उत्साह के साथ हिस्सा लेने के लिए आमंत्रित करते हैं ताकि आप अपना कीमती वोट भी दे सकें।'

भेजी गांव कोंटा विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आता है जो देश में सबसे अधिक नक्सल प्रभावित क्षेत्र है। 18 विधानसभा क्षेत्रों के साथ-साथ कोंटा में भी छत्तीसगढ़ के पहले चरण का चुनाव 12 नवंबर को हुआ। वर्ष 2013 के विधानसभा चुनावों के दौरान भेजी के मतदान केंद्र पर एक भी वोट नहीं डाले गए क्योंकि नक्सलियों ने मतदान का बहिष्कार किया था। दिलचस्प बात यह है कि बागी इस बार भी ज्यादा मुखर रहे और उन्होंने मतदान से पहले लोगों में डर पैदा करने के लिए हिंसक घटनाओं को भी अंजाम दिया। लेकिन इससे तांती के हौसले कम नहीं हुए और उन्होंने अपने अन्य रिश्तेदारों के साथ बहिष्कार की अनदेखी करते हुए अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया।

इस नक्सल प्रभावित निर्वाचन क्षेत्र की आधी से ज्यादा आबादी ने इस बार मताधिकार का इस्तेमाल किया। कोंटा में 55.30 फीसदी मतदान हुआ और यह पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले लगभग 7 फीसदी की बढ़ोतरी थी। वैश्विक स्तर पर नक्सलियों का गढ़ माने जाने वाले बस्तर में 12 विधानसभा क्षेत्र हैं जहां भारी मतदान हुए। वर्ष 2013 के करीब 71 फीसदी की तुलना में 2018 में यहां 72.80 फीसदी मतदान हुए। 

कुंजम की टीम का भी इसमें योगदान रहा। लेकिन बदलाव इतनी आसानी से नहीं आता। स्थानीय प्रशासन ने बड़ी सफलतापूर्वक इन क्षेत्रों में लोकतांत्रिक प्रक्रिया पूरी की जिन पर नक्सली अपना दावा करते हैं। आंगनवाड़ी की स्वयंसेवियों को भी गांव के स्तर पर टीम बनाने की जिम्मेदारी दी गई ताकि वे लोगों को हल्दी-चावल देकर मतदान केंद्रों तक पहुंचने के लिए प्रेरित कर सकें। आदिवासी क्षेत्रों में आमंत्रण के लिए चावल-हल्दी देना परंपरा रही है।  मतदाताओं के उत्साह से चुनावकर्मियों की टीम में भी नई ऊर्जा का संचार हुआ। एक स्कूल शिक्षक दीपक पाठक को गोरखा बूथ में मतदान कराने की जिम्मेदारी दी गई। वह कहते हैं कि जब उन्होंने सुबह सात बजे स्कूल के दरवाजे खोले तब एक दर्जन लोग मतदान के लिए खड़े थे। वह याद करते हैं, 'लोगों के उत्साह को देखकर हम काफी उत्साहित थे और हमने अपनी पूरी क्षमता के अनुसार अपने कर्तव्य का पालन किया।' जब पाठक और उनकी टीम मतदान केंद्र पर 11 नवंबर की देर शाम पहुंची थी तब उन्होंने सोचा था कि यहां कोई भी मतदान के लिए नहीं आएगा और मतदान महज एक औपचारिकता होगी। वर्ष 2013 में इस मतदान केंद्र पर शून्य मतदान रिकॉर्ड किया गया था। 

भारतीय वायुसेना के एक हेलिकॉप्टर ने उन्हें जहां छोड़ा वहां से टीम को 15 किलोमीटर पैदल यात्रा करनी पड़ी क्योंकि मतदान केंद्र ऐसे इलाके में था जहां पहुंचना आसान नहीं था और यह सुकमा के नक्सल प्रभावित इलाके में भी आता है। पाठक याद करते हैं, 'हम काफी थके और जकड़े हुए से थे लेकिन अच्छे मतदान की वजह से हम अपनी मुश्किलें भूल गए।' कुछ चुनावकर्मी माओवादी हिंसा खत्म करने के अभियान से प्रेरित दिखे। सुकमा में एक 25 वर्षीय आंगनबाड़ी कार्यकर्ता ने किसी भी मतदान केंद्र में ड्यूटी पर जाने का प्रण किया। वह कहती हैं, 'मैं सुदूर इलाकों में लोकतंत्र को मजबूत होते हुए देखना चाहती हूं क्योंकि नक्सलियों ने मेरे पिता और भाई को बड़ी बर्बरता से मार दिया था।' वह पूरी सक्रियता के साथ लोगों को चुनावी प्रक्रिया में हिस्सा लेने के लिए प्रेरित कर रही थीं। सुकमा में 30 वर्षीय शिक्षक सोढ़ी मरकम चुनावी ड्यूटी में लगे थे। वह कहते हैं कि वह अपने छात्रों को यह पढ़ाते रहे हैं कि उन्हें अपनी मातृभूमि के लिए कुछ करना चाहिए। वह कहते हैं, 'अब यह मेरी बारी है। अगर आप मुझसे पूछेंगे कि मुझे कैसा महसूस हो रहा है तो मेरे पास कोई जवाब नहीं होगा लेकिन निश्चित तौर पर मुझे यह अहसास हुआ कि मैं कुछ अच्छा कर रहा था।'

चुनावकर्मियों की कोशिशों में सुरक्षाकर्मियों का समर्थन भी मिला जो बड़ी सावधानी बरत रहे थे। विशेष पुलिस महानिदेशक (नक्सल विरोधी अभियान) दुर्गेश माधव अवस्थी का कहना है, 'हमने इसे एक चुनौती के तौर पर लिया ताकि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराए जा सकें।' पूरी चुनावी प्रक्रिया के सफल निष्पादन के लिए यह अहम था कि राज्य प्रशासन में लोगों का भरोसा बनाया जाए जिनमें सुरक्षा बल भी शामिल हैं ताकि वे  खुले तौर पर निडर होकर अपना मत डाल सकें। 

सुरक्षाबलों के लिए चुनौतियां बहुआयामी थीं। देश के विभिन्न हिस्सों से यहां अद्र्धसैनिक बल भेजे गए जो इस बात से वाकिफ नहीं थे कि गुरिल्ला युद्ध कैसे लड़ा जाए जिनमें नक्सलियों को महारत हासिल है। इनमें से ज्यादातर को केवल सामान्य कानून व्यवस्था बहाल करने का प्रशिक्षण मिला था। इन सबमें से 12,5000 सुरक्षाकर्मी बस्तर के जंगलों के भीतर थे जो जनता और चुनावकर्मियों की सुरक्षा में जुटे थे। अवस्थी कहते हैं, 'हमने सबसे पहले जवानों को बुनियादी प्रशिक्षण और जानकारी दी।' उन्हें प्रिंट किए गए दस्तावेज मुहैया कराए गए जिनमें इस बात का जिक्र था कि उन्हें नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। सबसे अहम बात यह थी कि जहां तक संभव हो वे पैदल यात्रा करें क्योंकि वाहनों को बड़ी आसानी से तत्काल तैयार किए जाने वाले विस्फोटकों की मदद से निशाना बनाया जा सकता है। 

बस्तर के राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि लोगों का ज्यादा मतदान करना बदलाव का संकेत दे रहा है। पर्यवेक्षक राजेंद्र वाजपेयी कहते हैं, 'इस क्षेत्र में जब भी लोग बदलाव चाहते हैं उस वक्त बाहर निकलने और बड़ी तादाद में मतदान करने की परंपरा रही है।' बस्तर के चुनावी नतीजे कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) दोनों के लिए अहम होंगे जिनकी आदिवासी वोट बैंक पर से पकड़ ढीली हुई है। सत्तासीन दल वर्ष 2013 में महज चार सीटें ही रख पाया जबकि 2008 के चुनावों में इसे यहां 11 सीटें मिली थीं। हालांकि भाजपा के नेताओं का दावा है कि बस्तर का मतदान उनके पक्ष में हुआ है। 

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता जोर देकर कहते हैं, 'राजनीतिक विश्लेषक यह दावा कर रहे हैं कि बस्तर में हुआ भारी मतदान बदलाव के लिए था जबकि भाजपा सत्ता में है और इस क्षेत्र की ज्यादातर सीटें कांग्रेस के खाते में हैं। अब आप ही बताएं कि मतदाता आखिर किसमें बदलाव चाहते हैं, उम्मीदवार या सरकार में?' इस बात में एक तर्क जरूर है लेकिन इसका जवाब तब स्पष्ट होगा जब 11 दिसंबर को वोटिंग मशीने खुलेंगी।
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