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सियासत के मिजाज को बखूबी समझने वाले नेता हैं गहलोत

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  November 16, 2018

राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का भी नाम कांग्रेस उम्मीदवारों की सूची में शामिल है और वह विधानसभा चुनाव लडऩे जा रहे हैं। गुजरात चुनाव में गहलोत के असर के बाद उनकी केंद्रीय भूमिका को देखते हुए यही माना जा रहा था कि उन्हें केंद्र की राजनीति में ही रखा जाएगा और राजस्थान की कमान युवा कंधों पर डाली जाएगी। लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी साफ तौर पर यह नहीं चाहते हैं कि अपने पाले में आने के लिए तैयार नजर आ रहे राज्य में किसी भी तरह का जोखिम लिया जाए। इसके लिए वह हर तरह के साधनों का इस्तेमाल कर रहे हैं।

 
गहलोत एक सहज, शालीन एवं मितभाषी व्यक्ति के तौर पर सामने आते हैं लेकिन वह एक विकट विरोधी भी हैं। हाल-फिलहाल तक पूर्व केंद्रीय मंत्री सी पी जोशी के तौर पर राजस्थान में उनका केवल एक दुश्मन हुआ करता था। वर्ष 2008 के विधानसभा चुनावों के बाद गहलोत की मौजूदगी में हुई एक बैठक में जोशी ने कहा था, 'मैं अशोक गहलोत का अनुयायी हुआ करता था लेकिन अब मैं उनका सहयोगी हूं। पहले हमारा रिश्ता नेता और अनुयायी का था लेकिन अब यह नेता और सहयोगी का है।' जोशी उस चुनाव में महज एक मत से अपनी सीट गंवा बैठे थे। अगर ऐसा नहीं हुआ रहता तो गहलोत के बजाय जोशी ही मुख्यमंत्री बने होते।
 
दोनों नेताओं के बीच मतभेद होने के बावजूद वे दोनों साथ मिलकर एक दुर्जेय टीम बन गए। गहलोत और जोशी की टीम ने न केवल 2008 का राज्य विधानसभा चुनाव (200 में से 96 सीट) जीता बल्कि कुछ समय बाद हुए लोकसभा चुनाव में भी अपनी पार्टी को राज्य की 25 में से 19 सीटें जिताकर शानदार कामयाबी दिलाई। कई लोगों का मानना है कि विधानसभा में कांग्रेस के बहुमत से थोड़ा दूर रह जाने से घमंडी एवं दबंग विधायकों के आगे झुकने की अपनी काबिलियत के चलते गहलोत ही सरकार चला पाने की स्थिति में थे। गहलोत ने जल्द ही विधानसभा के भीतर कांग्रेस की स्थिति मजबूत कर दी। बहुजन समाज पार्टी के छह विधायक कांग्रेस के पाले में आ गए। इसके अलावा निर्दलीय विधायकों को भी साथ लाकर उन्होंने अपनी सरकार की स्थिरता सुनिश्चित कर दी थी। लेकिन यह वजूद जोखिम से भरा हुआ था।
 
वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में गहलोत की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की ऐतिहासिक लहर का सामना करना पड़ा और कांग्रेस महज 21 सीटों पर सिमटकर रह गई। यह राजस्थान में कांग्रेस का अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन है। गहलोत ने 2013 के चुनाव में मिली करारी शिकस्त के बाद कहा था, 'हमने समाज के हरेक तबके के लिए कुछ न कुछ किया और यह ध्यान रखा कि कोई भी छूट न जाए। अगर हम अच्छा शासन देने के बावजूद नहीं जीत पाए तो मुझे नहीं मालूम कि क्या करने की जरूरत है? अब यह आत्म-निरीक्षण  का विषय है।' 
 
गहलोत के लिए यह महज शाब्दिक आडंबर नहीं था। बेहद रियायती दर पर दवाएं देने की उनकी योजना शुरू में काफी लोकप्रिय हुई थी। उन्होंने महिलाओं को सरकारी परिवहन साधनों के किराये में भी छूट दी। गरीबी रेखा के नीचे जीवन बसर करने वाले, बुजुर्गों, विधवाओं, तलाकशुदा महिलाओं और विकलांगों को 500 रुपये से लेकर 1,000 रुपये तक की मासिक पेंशन देने की योजना उन्होंने शुरू की थी। 18-60 साल की उम्र के कामगार एक बार में 100 रुपये तक का अंशदान पेंशन योजना में कर सकते थे। सरकार सेवानिवृत्ति के समय कुल अंशदान पर आठ फीसदी की दर से ब्याज देती। गहलोत ने एक विनियमित फंड प्रबंधक को इसका प्रबंधन सौंपने या पेंशन कोष की देखरेख का जिम्मा पेंशन कोष नियामकीय एवं विकास प्राधिकरण को देने की बात कही थी।
 
लेकिन किसी ने भी इन योजनाओं की अहमियत नहीं समझी। मुफ्त दवा वितरण योजना में बड़े स्तर पर घोटाला हुआ। असली जेनरिक दवाओं की जगह नकली दवाओं की आपूर्ति की गई थी। कांग्रेस की जगह सत्ता में आई भाजपा ने इस योजना को आखिरकार बंद कर दिया। इसकी जगह पर वसुंधरा राजे ने भामाशाह स्वास्थ्य बीमा योजना शुरू की थी जो एक तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आयुष्मान भारत योजना का पूर्वरूप है। कोई भी परियोजना सफल या नाकाम हो सकती है। लेकिन गहलोत को सत्ता से बेदखल कर देने वाले राजस्थान में किसी को भी उनके इरादों की शिद्दत को लेकर संदेह नहीं रहा। एक दुर्लभ सार्वजनिक स्वीकारोक्ति में गहलोत ने एक बार राजनीति में अपने सफर की शुरुआत के बारे में बताया था। गहलोत के पिता एक नगरपालिका के चेयरमैन थे और जोधपुर के एक छोटे कस्बे पीपर में खाद बेचने के लिए उन्हें पैसे दिए थे। लेकिन गहलोत ने अपना माल खत्म करने के बाद राजनीति का रुख कर लिया। जाट नेता परसराम मदेरणा राजनीति में गहलोत के मार्गदर्शक बने। हालांकि खुद मदेरणा को शुरु में यही लगा था कि राजनीति में सफल होने के लिहाज से गहलोत काफी मुखर हैं लेकिन बाद में उन्होंने अपना समर्थन दे दिया। गहलोत ने अपना पहला चुनाव आपातकाल के बाद देश भर में उभरी जनता पार्टी लहर का सामना करते हुए लड़ा था।
 
गहलोत भले ही एक अच्छे वक्ता नहीं हैं लेकिन ध्यान से सुनना उनकी खासियत है। वह जमीन से जुड़े हुए नेता हैं और उन्हें बखूबी पता है कि जूता पैर में कहां पर चुभता है?  कांग्रेस की राजस्थान इकाई के कई लोग धीरे-धीरे सचिन पायलट के गुट की तरफ खिसकते जा रहे हैं। अजमेर लोकसभा उपचुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार रघु शर्मा पहले गहलोत खेमे में ही थे लेकिन आखिरी मौके पर उन्होंने पायलट खेमे में पलटी मार ली थी। लेकिन गहलोत बखूबी जानते हैं कि यह नुक्ताचीनी का वक्त नहीं है। राजस्थान विधानसभा चुनाव के नतीजे जैसे भी रहें, गहलोत कांग्रेस के अंदरूनी खेमे का हिस्सा हैं और लंबे समय तक रहेंगे।
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