बिजनेस स्टैंडर्ड - शिकायत की व्यवस्था नहीं पारदर्शी
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शिकायत की व्यवस्था नहीं पारदर्शी

अमृता पिल्लई, सचिन मामबटा और अद्वैव राव पालेपू /  11 15, 2018

कंपनियों में यौन शोषण

कई शीर्ष कंपनियों में यौन शोषण की शिकायत नहीं आई लेकिन व्यवस्था पर भी उठ रहे सवाल
बिज़नेस स्टैंडर्ड ने कंपनियों की सालाना रिपोर्ट से यौन शोषण शिकायत के आंकड़े हासिल किए
देश की शीर्ष 100 कंपनियों में से एक तिहाई में किसी भी महिला कर्मचारी ने यौन शोषण की शिकायत नहीं की
केपीएमजी का मानना है कि शायद इन कंपनियों में यौन शोषण शिकायत की व्यवस्था में खामियां हों

बिजनेस स्टैंडर्ड शिकायत की व्यवस्था नहीं पारदर्शीभारत में #टू अभियान शुरू होने के बाद सोशल मीडिया पर कोहराम मचा है लेकिन देश की शीर्ष 100 कंपनियों में से एक तिहाई में किसी भी महिला कर्मचारी ने यौन शोषण की शिकायत नहीं की है। इनमें छह ऐसी कंपनियां भी शामिल हैं जिनमें मार्च 2018 के आंकड़ों के मुताबिक 500 से अधिक महिला कर्मचारी हैं। इन कंपनियों में पिछले तीन वित्त वर्षों के दौरान यौन शोषण की एक भी शिकायत नहीं आई है। इन छह कंपनियों में कोल इंडिया, रिलायंस इंडस्ट्रीज, अरविंदो फार्मा, बजाज फाइनैंस, दिवीज लैबोरेटरीज और एनटीपीसी शामिल हैं। मार्च 2018 के आंकड़ों के मुताबिक इन कंपनियों में महिला कर्मचारियों की संख्या 24,960 थी। इस बारे में इन कंपनियों को भेजे गए ईमेल का कोई जवाब नहीं आया।

केपीएमजी जैसी ऑडिट कंपनियों का मानना है कि कोई शिकायत नहीं आने का मतलब यह भी हो सकता है कि इन कंपनियों में यौन शोषण शिकायत की व्यवस्था में खामियां हों। ऑडिट कंपनी ने बीएसई और एनएसई में सूचीबद्ध 100 शीर्ष कंपनियों का विश्लेषण कर जुलाई 2017 में अपनी रिपोर्ट में कहा कि अधिकांश कंपनियों में यौन शोषण की कोई शिकायत नहीं है, इससे इस तरह की शिकायतों के लिए बनाई गई व्यवस्था पर संदेह होता है। स्नेहा फाउंडेशन में प्रीवेंशन ऑफ वायलेंस अगेंस्ट वीमन ऐंड चिल्डन की प्रोग्राम डायरेक्टर नयरीन दारूवाला को अक्सर कंपनियों का फोन आता है। वे अपनी आंतरिक शिकायत समितियों में किसी बाहरी सदस्य को नियुक्त करना चाहती हैं। दारूवाला ने कहा, 'कई लोग कॉल करते हैं और कहते हैं कि वे एक समिति बनाना चाहते हैं लेकिन साथ ही कहते हैं कि चिंता मत करिए कोई शिकायत नहीं है।' उन्होंने कहा कि समिति का गठन करना एक औपचारिकता मानी जाती है।

बिज़नेस स्टैंडर्ड ने एसऐंडपी बीएसई 100 कंपनियों की सालाना रिपोर्ट के बिज़नेस रिस्पॉन्सिबिलिटी रिपोर्टिंग खंड से यौन शोषण की शिकायत के आंकड़े हासिल किए हैं। वित्त वर्ष 2018 में 93 कंपनियों ने शिकायतों के बारे में जानकारी का खुलासा किया। इनमें से 36 कंपनियों ने महिला कर्मचारियों की संख्या को भी साझा किया है। इन कंपनियों में यौन शोषण की कोई शिकायत नहीं मिली थी। वित्त वर्ष 2016 में भी यही स्थिति थी जहां 83 में से 36 कंपनियों ने संबंधित जानकारी का खुलासा किया था। इन कंपनियों में यौन शोषण की एक भी शिकायत नहीं थी। वित्त वर्ष 2017 में आंकड़े साझा करने वाली 97 में से 50 कंपनियों ने कोई शिकायत नहीं मिलने का दावा किया था।

बिजनेस स्टैंडर्ड शिकायत की व्यवस्था नहीं पारदर्शीदारूवाला इस बात से सहमत हैं कि कोई शिकायत नहीं आने का मतलब यह है कि शिकायत करने की व्यवस्था में खामी है। उन्होंने कहा, 'इस प्रक्रिया में समय लगता है। कंपनियां इस जंजाल में नहीं फंसना चाहती हैं जिससे महिलाएं इस तरह की शिकायतें करने से झिझकती हैं। अगर कोई समिति बनी भी है तो इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि यह काम करेगी।' अभी एक मजबूत व्यवस्था बनाने में लंबा रास्ता तय करना पड़ सकता है क्योंकि कंपनियों को बिज़नेस रिस्पॉन्सिबिलिटी रिपोर्ट (बीआरआर) के तहत यौन शोषण मामलों की रिपोर्टिंग के  मानक ढांचे का पालन करने में संघर्ष करना पड़ रहा है। 

देश की सबसे बड़ी इंजीनियरिंग कंपनी लार्सन ऐंड टुब्रो को बीआरआर फॉर्मेट के प्रिसिंपल 3 के तहत वित्त वर्ष 2018 में यौन शोषण की कोई शिकायत नहीं मिली जबकि इसी रिपोर्ट के प्रिंसिपल 5 के तहत दो शिकायतें मिलीं। एक सवाल के जवाब में एलऐंडटी ने कहा कि कंपनी ने प्रिंसिपल 5 के तहत स्थायी कर्मचारियों और प्रिंसिपल 3 के तहत अनुबंध वाले कर्मचारियों का डेटा दिया है। इस बात पर विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है कि इस तरह के अंतर से कैसे निपटा जाना है। 

केएमपीजी में पार्टनर संतोष जयरामन ने कहा, 'प्रिंसिपल 3 और 5 में यह अंतर है कि प्रिंसिपल 3 संगठन के अंदर का मामला है जबकि प्रिंसिपल 5 इससे बाहर का मामला है।' लेकिन दारूवाला जैसे अन्य लोग मानते हैं कि ऐसा कोई अंतर नहीं है। अलबत्ता एलऐंडटी की रिपोर्ट में इस तरह के अंतर का उल्लेख नहीं है और न ही इसे किसी तरीके से साफ किया गया है।

नेस्ले इंडिया जैसी कुछ अन्य कंपनियों की बीआरआर लंबित और रिपोर्ट किए गए मामलों के संबंध में अनियमितताओं से भरी हुई हैं। 2016 और 2017 में नेस्ले ने अपनी बीआरआर में केवल लंबित मामलों का जिक्र किया जिनकी संख्या शून्य थी। कंपनी ने उस खंड में ताजा मामलों का जिक्र नहीं किया जबकि यह जरूरी है। कंपनी में 2017 में पांच और 2016 में दो ताजा मामले आए थे लेकिन उसने उन्हें अलग खंड में जगह दी। जयरामन ने कहा, 'बीआरआर फॉर्मेट के मुताबिक उन्हें दोनों तरह के मामलों की जानकारी देनी थी। इसमें एक साल में आई शिकायतें और लंबित शिकायतों की संख्या शामिल है।'

बिजनेस स्टैंडर्ड शिकायत की व्यवस्था नहीं पारदर्शीकैडिला हेल्थकेयर ने पिछले वित्त वर्ष अपनी बीआरआर में कोई शिकायत नहीं मिलने की बात कही जबकि उसकी सहयोगी कंपनी जायडस हेल्थकेयर की डायरेक्टर्स रिपोर्ट में यौन शोषण के एक मामले का जिक्र किया गया था। कैडिला ने अपने जवाब में कहा, 'पिछले साल हमारी आतंरिक शिकायत समिति में एक शिकायत आई थी। इस समिति का गठन विशाखा समिति के दिशानिर्देशों के मुताबिक किया गया था। चूंकि यह जायडस हेल्थकेयर से जुड़ा मामला था, इसलिए इसे डायरेक्टर्स रिपोर्ट में जगह दी गई। जायडस हेल्थकेयर पूरी तरह कैडिला हेल्थकेयर के स्वामित्व वाली कंपनी है। आंतरिक समिति ने जांच की और जरूरी कदम उठाकर एक कर्मचारी को बर्खास्त किया गया।'

जयरामन ने कहा, 'इसमें कोई स्पष्टता नहीं है। प्रिंसिपल 3 के तहत खुलासे में साफ नहीं है कि इसमें सहयोगी कंपनियों को भी शामिल किया जाएगा या नहीं जबकि प्रिंसिपल 1 के पहले सवाल में पूछा जाता है कि इसमें पूरा समूह और संयुक्त उपक्रम शामिल हैं या नहीं।' शिकायतों की संख्या में कमी का एक कारण यह भी है कि देश में महिला कामगारों की संख्या बहुत कम है। प्रॉक्सी एडवाइजरी फर्म इनगवर्न में प्रबंध निदेशक श्रीराम सुब्रमण्यन ने कहा, 'कोई शिकायत नहीं होने के मामले में इस बात की जांच करने की जरूरत है कि नियमों का कितनी सख्ती से पालन किया जा रहा है और महिला-पुरुष अनुपात क्या है।' 
Keyword: sexual harassment, ME too, social media,,
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