बिजनेस स्टैंडर्ड - एनबीएफसी संकट की आगे की पड़ताल
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एनबीएफसी संकट की आगे की पड़ताल

आकाश प्रकाश /  November 15, 2018

मुश्किल के दौर से गुजर रहीं गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां बाजार का भरोसा फिर से कैसे कायम कर सकती हैं। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं आकाश प्रकाश 

 
इन्फ्र्रास्ट्रक्चर लीजिंग  ऐंड फाइनैंशियल सर्विसेज (आईएलऐंडएफएस) के ऋण अदायगी में पहली बार चूक करने को करीब दो महीने हो चुके हैं। इस चूक से ऋण तथा वित्तीय बाजारों में खलबली पैदा हुई है और कुछ एनबीएफसी (हाउसिंग फाइनैंस कंपनियों सहित गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों) में थोड़ा डर पैदा हुआ है। यह खासकर एनबीएफसी स्टॉक और शेयर बाजारों के लिए बहुत मुश्किल दौर रहा है।  हमने इन पिछले दो महीनों में क्या सीखा है और आगे का रास्ता क्या है? पहला, सरकार ने आईएलऐंडएफएस के बोर्ड को हटाकर नया बोर्ड गठित किया है, जो सही कदम प्रतीत होता है। सरकार हालात को काबू में करने में सफल रही है। इससे आईएलऐंडएफएस को राहत की सांस मिली है और उम्मीद है कि कंपनी अपनी सहायक कंपनियों की संपत्तियों के मूल्य को सुरक्षित कर पाएगी। हालांकि इस मामले को सरकार के अपने हाथ में लेने से इसने राजनीतिक शक्ल अख्तियार की है। भारतीय स्टेट बैंक और भारतीय जीवन बीमा निगम जैसे सरकार के स्वामित्व वाले संस्थानों के लिए आईएलऐंडएफएस में पूंजी डालना मुश्किल हो सकता है। ये संस्थान नहीं चाहेंगे कि वे किसी निजी कंपनी को उबारें। अधिग्रहण न होने की स्थिति में उनके लिए नई पूंजी डालना काफी आसान हो सकता है। पूंजी न डाले जाने की स्थिति में समाधान में लंबा समय लग सकता है। इतने बड़े आर्थिक मुद्दे का राजनीतिकरण होने से इसमें अड़चन आएंगी। 
 
अभी यह साफ नहीं है कि आईएलऐंडएफएस के ऋणदाताओं को अपने बकाया कर्ज में कितना कम पैसा लेना पड़ेगा। क्या होल्डिंग कंपनी के ऋणदाता अपना बकाया वसूल पाएंगे? यह इस बात पर निर्भर करता है कि किसी विशेष सहायक कंपनी की अतिरिक्त गिरवी संपत्ति को होल्डिंग कंपनी को स्थानांतरित करने की मंजूरी दी जाती है या नहीं। क्या किसी एक सहायक कंपनी के ऋणदाताओं को अपने ऋण को सुरक्षित बनाने और उस विशेष परियोजना में अपने कर्ज को सीमित करने की मंजूरी दी जाएगी, जिसके लिए उन्होंने कर्ज दिया है? इस मामले में कुछ ऋणदाताओं को अपने बकाये में बिल्कुुल भी कटौती नहीं करनी पड़ सकती है, जबकि कुछ को अपने बकाये में 50 फीसदी राशि छोडऩे के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। यह उस विशेष परियोजना पर निर्भर करेगा, जिसके लिए ऋणदाताओं ने ऋण दिया है। यह गिरवी रखी गई संपत्ति की गुणवत्ता पर भी निर्भर करेगा। सभी सहायक कंपनियों को एक साथ मिलाने और ऋणदाताओं के बकाये में एकसमान कटौती का कदम भी उठाया जा सकता है। इसमें एक सहायक कंपनी की अतिरिक्त गिरवी संपत्ति को दूसरी सहायक कंपनी की फंडिंग में इस्तेमाल किया जा सकता है। यह बुनियादी रूप से सभी ऋणों को एकजुट करना है। यह मामला एक तरह से वह परंपरा स्थापित करेगा कि भविष्य में दिवालेपन के ऐसे मामलों का कैसे समाधान किया जाए। आईएलऐंडएफएस मामले से होल्डिंग कंपनी को ऋण देने को भी मुश्किल बना दिया है। इसमें बहुत से जोखिम हैं। कोई भी ऐसे कर्ज नहीं देना चाहेगा। 
 
शुरू में ये आशंकाएं जताई जा रही थीं कि आईएलऐंडएफएस के बॉन्डों में नुकसान और रेटिंग में गिरावट से डेट और लिक्विड म्युचुअल फंड खत्म हो जाएंगे। लेकिन ऐसा लगता है कि ये आशंकाएं बहुत हड़बड़ी में जताई गई हैं। हालांकि इन फंडों से सितंबर में 2 लाख करोड़ रुपये की निकासी हुई, लेकिन निवेशकों के शांत होने के बाद अक्टूबर में इन फंडों में 25 फीसदी राशि फिर आ गई है। मेरा मानना है कि इनमें आगामी महीनों में और पैसा आएगा क्योंकि अति धनाढ्य निवेशकों (एचएनआई) और कॉरपोरेट ट्रेजरी के लिए अन्य विकल्प बहुत कम हैं। 
 
ज्यादा आक्रामक फंड, जो एनबीएफसी बॉन्डों में स्वीकृत नियामकीय सीमा का पूरी तरह इस्तेमाल कर अपने प्रतिफल को ज्यादा से ज्यादा करने की कोशिश कर रहे थे, उन्हें नुकसान हुआ है, जबकि कंजर्वेटिव फंडों ने लाभ हासिल किया है। ऐसा भी लग रहा है कि म्युचुअल फंड उद्योग में एकीकरण हो रहा है। बड़े और स्थापित फंड हाउस छोटे प्रतिस्पर्धियों की हिस्सेदारी हासिल कर रहे हैं।  अल्पावधि के वाणिज्यिक पत्र बाजार गैर-एनबीएफसी निर्गमकर्ताओं के लिए फिर से खुल गए हैं। कुछ अच्छे एनबीएफसी निर्गमकर्ता भी धीरे-धीरे नए पत्र जारी करने के लिए आ रहे हैं। शुरुआती झटके के बाद बाजार एनबीएफसी निर्गमकर्ताओं में उनके कर्ज और संपत्ति गुणवत्ता के आधार पर विभेद कर रहे हैं। हालांकि डेट बाजार के सभी खिलाडिय़ों के लिए एनबीएफसी के पत्रों में निवेश की गई संपत्ति का प्रतिशत घटेगा। इसी तर्ज पर नियामकीय बदलावों की भी संभावना है। हालांकि फिलहाल चीजें सामान्य हो रही हैं, लेकिन अब भी एनबीएफसी के लिए लंबी अवधि का कर्ज लेना बहुत मुश्किल है। लंबे समय के लिए हालात सामान्य होने में वक्त लगेगा। 
 
अक्टूबर और नवंबर महीनों में अल्पावधि के डेट ऋणों का बड़ी मात्रा में भुगतान होना था। अक्टूबर में जिन डेट ऋणों का भुगतान होना था, उनका सफलतापूर्वक भुगतान हो गया और कोई डिफॉल्ट नहीं हुआ। नवंबर में भी ऐसी कोई समस्या नहीं आने की संभावना है। इसके बाद असली परीक्षा मार्च 2019 में होगी। ऐसा लगता है कि नकदी की चिंताएं दूर हो गई हैं। बड़ी एनबीएफसी अपनी देनदारियों को आगे बढ़वाने और या भुगतान करने में सफल रही हैं। वे इस चुनौती को पार कर चुकी हैं। हालांकि सभी एनबीएफसी को आगे नकदी का तगड़ा बफर स्टॉक रखना होगा। बाजार और रेटिंग एजेंसियां इसकी मांग करेंगे। उन्हें संपत्ति देनदारी अंतर (एएलएम) के मामले में ज्यादा रूढि़वादी बनना होगा। इस मामले में नियामकीय हस्तक्षेप की भी उम्मीद की जा सकती है। नियामक इसकी कोई परिभाषा तय कर सकता है कि कितना एएलएम स्वीकार्य है। इन सब का लाभ पर असर पड़ेगा। एएलएम और गीयरिंग पर आगे दबाव रहेगा। ये दोनों ही इक्विटी पर प्रतिफल बढ़ाने के जरिये हैं। 
 
इन सब के बावजूद यह भारत में लीमन जैसा नकदी नहीं चुका पाने का संकट नहीं बनेगा। हाउसिंग फाइनैंस कंपनियों के ऋण का अनुपात 7-8 है और अन्य प्रमुख एनबीएफसी में कर्ज का अनुपात 4 से 6 के बीच है। यह लीमन जैसा नहीं है, जिसमें बैंकों पर ऋण का अनुपात 20 से 30 के बीच था और वे जटिल डेरिवेटिव सौदे कर रहे थे।  संपत्ति की गुणवत्ता को लेकर चिंता रियल एस्टेट डेवलपरों को दिए हुए ऋण को लेकर है। इसका सूक्ष्म ब्योरा उपलब्ध नहीं है, इसलिए बाजार इस बात को लेकर चिंतित है कि एनबीएफसी ने उन्हें कितना ऋण दिया हुआ है, कितना ऋण छोडऩा पड़ेगा और किन पर यह ऋण है। वित्तीय प्रणाली आपस में जुड़ी होती है, इसलिए इन चिंताओं से सभी एनबीएफसी को लेकर धारणा पर असर पड़ रहा है। रियल एस्टेट ऋणों को लेकर आम भरोसे की कमी है। 
 
एनबीएफसी के लिए बाजार का भरोसा फिर से हासिल करने का एकमात्र तरीका यही है कि वे डेवलपरों को दिए हुए अपने ऋण के सूक्ष्म ब्योरे मुहैया कराएं। नियामक के लिए एक विकल्प यह है कि वह इस क्षेत्र की प्रमुख कंपनियों की संपत्ति गुणवत्ता पर दबाव की जांच करें। इससे अफवाहों पर लगाम लगेगी। बाजारों को यह भरोसा चाहिए कि जिन एक दो बड़ी एनबीएफसी ने रियल एस्टेट क्षेत्र को बड़ी मात्रा में ऋण दिया हुआ है, उनके खातों में कोई समस्या नहीं है। रेटिंग एजेंसियां अपनी पूरी साख खो चुकी हैं। हमें कोई अन्य संस्था चाहिए, जो संपत्ति की गुणवत्ता को लेकर स्वतंत्र राय दे सके। एनबीएफसी ने पिछले दो वर्षों में डेवलपरों को अपना ऋण 50 फीसदी से अधिक बढ़ाया है। रियल एस्टेट क्षेत्र को कुल 5 लाख करोड़ रुपये के ऋण से सिस्टम ध्वस्त नहीं हो सकता है, लेकिन इससे एक दो एनबीएफसी की बैलेंस शीट बुरी तरह प्रभावित हो सकती हैं। रियल एस्टेट को ऋण के कारोबारी मॉडल को न समझने और महंगी प्रॉपर्टी नहीं बिकने के सबूतों के कारण निवेशक आशंकित हैं। 
 
यह भरोसे का संकट है। आप ज्यादा बारीक जानकारियां देकर या अपनी संपत्ति की गुणवत्ता को लेकर किसी बाहरी स्वतंत्र संस्था की स्वीकृति हासिल कर भरोसे को बढ़ा सकते हैं। अन्यथा समय ही जख्म भरेगा और डर तथा अफवाहें धीरे-धीरे खत्म होंगी। लेकिन इस दौरान निश्चित रूप से और कई एनबीएफसी प्रभावित हो सकती हैं। क्या वे ऐसे माहौल में फल-फूल सकती हैं, जहां वे प्रतिस्पर्धी दरों पर तीन साल के बॉन्डों के जरिये पैसा नहीं जुटा सकती।
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