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भारतीय रिजर्व बैंक की स्वायत्तता बनाम राजनीति

नीति नियम
मिहिर शर्मा /  November 14, 2018

अभी भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) और सरकार के बीच टकराव से इतर शायद ही कोई ऐसा मुद्दा है जो बाजारों में उथलपुथल ला सकता है। दोनों के बीच रिश्ते गिरावट के नए स्तर पर पहुंच गए हैं। आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने पिछले महीने एक भाषण में केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता के सैद्घांतिक और व्यावहारिक कारणों का हवाला दिया था। जाहिर तौर पर उनका निशाना सरकार पर था। आचार्य ने आरबीआई के गवर्नर ऊर्जित पटेल सहित अपने सभी सहयोगियों को धन्यवाद दिया। इससे साफ है कि केंद्रीय बैंक का शीर्ष नेतृत्व संस्थान की स्वायत्तता को बचाने के लिए एकजुट है। 

 
यह स्थिति दो साल पहले नोटबंदी के तुरंत बाद बनी आरबीआई की छवि से एकदम अलग है। अब यह स्पष्टï हो चुका है कि नोटबंदी का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का फरमान भारतीय अर्थव्यवस्था के इतिहास में खराब फैसलों में से एक था। इसके कुछ ही स्थायी फायदे रहे। इनमें डिजिटलीकरण और करदाताओं की संख्या में बढ़ोतरी शामिल है लेकिन इसके लिए कई और बेहतर तरीके थे। लेकिन जिन लक्ष्यों के लिए नोटबंदी की गई थी वे हासिल नहीं हुए। इनमें काले धन पर रोक, नकली नोटों पर लगाम, आतंकवादियों की फंडिंग रोकना आदि शामिल थे। नोटबंदी की देश को भारी कीमत चुकानी पड़ी। नोटबंदी के कारण लाखों लोगों को नौकरी से हाथ धोना पड़ा जबकि देश की अर्थव्यवस्था युवाओं को रोजगार देने में संघर्ष कर रही थी। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू करने से ऐन पहले छोटे एवं मझोले उद्योगों को नोटबंदी का झटका नहीं दिया जाना चाहिए था।
 
आरबीआई को भी नोटबंदी का खमियाजा भुगतना पड़ा। यह धन आपूर्ति के संबंध में हाल के वर्षों में लिया गया बहुत बड़ा फैसला था और शायद ही कोई यह दावा कर सकता है कि इसमें आरबीआई की कोई भूमिका थी। नोटबंदी के बाद बैंकिंग व्यवस्था में वापस आए नोटों को गिनने में कई महीने लग गए। इस कारण केंद्रीय बैंक और उसके गवर्नरों को फजीहत का सामना करना पड़ा। उन्हें सरकार के हाथों की कठपुतली की तरह देखा जाने लगा।  अच्छी बात यह है कि आरबीआई की छवि बहाल हो गई है। कोई नहीं चाहता है कि पटेल अपने पद से इस्तीफा दें। लेकिन गवर्नर के इस्तीफा देने पर इसके भयावह परिणाम होंगे। इससे दुनियाभर के निवेशकों में यह संदेश जाएगा कि भारत के केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता को कमजोर किया गया है। यही स्वायत्तता बैंक का मजबूत स्तंभ है और बाजारों के लिए इसकी अपील का एक अहम पहलू है। अगर सरकार खुले तौर पर आरबीआई कानून की धारा 7 को लागू करती है और सरकार केंद्रीय बैंक पर अपना आदेश थोपती है तो पटेल के पास इस्तीफा देने के अलावा कोई चारा नहीं होगा। 
 
वे कौन से मुद्दे हैं जिन पर सरकार केंद्रीय बैंक पर दबाव बनाना चाहती है? देखना होगा कि वे सत्तारूढ़ पार्टी के चुनावी एजेंडे से कितने करीब से जुड़े हैं और सरकार की मंशा कितनी पारदर्शी है।  बिजली क्षेत्र को ऋण के सवाल पर विचार कीजिए। इस साल की शुरुआत में आरबीआई ने एक परिपत्र जारी कर कहा कि जिस ऋण की किस्त के भुगतान पर एक दिन की भी देरी हो, बैंकों को उसे डिफॉल्ट मानना चाहिए। यह बैंकों की बैलेंस शीट को दुरुस्त करने की कवायद का हिस्सा था। अलबत्ता सरकार का कहना है कि इससे बिजली क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित होगा। अगर सर्वोच्च न्यायालय ने दखल नहीं दिया तो 300 अरब रुपये का बैंक कर्ज डिफॉल्ट की श्रेणी में शामिल हो सकता है। सरकार चाहती है कि इन संयंत्रों को चलाने के लिए कोई भुगतान करे। अगर जरूरी हुआ तो उपभोक्ता ऐसा करें और इसके लिए वे पहले तय शुल्क से ज्यादा भुगतान करें। लेकिन राजनीतिक मुद्दा यह है कि बिजली क्षेत्र में दबाव जल्दी से जल्दी खत्म हो। सरकार का मानना है कि बिजली संयंत्रों को दिवालिया प्रक्रिया में ले जाना उनके हित में नहीं है। भाजपा चौबीसों घंटे बिजली देने का वादा करके सरकार में आई थी और अपने इस वादे को पूरा करने के लिए उसके पास बहुत कम समय बचा है। 
 
फिर त्वरित उपचारात्मक कार्रवाई (पीसीए) का मुद्दा है। आरबीआई ने कमजोर प्रदर्शन करने वाले कई सरकारी बैंकों पर पाबंदियां लगाई हैं। सरकार का मानना है कि इससे बैंकों के कर्ज की वृद्घि रुक गई है। सरकार खासकर छोटे और मझोले उद्यमों को ऋण को लेकर चिंतित है। आईएलऐंडएफएस के संकट के कारण गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) में नकदी संकट के कारण यह मुद्दा अहम हो गया है। इस संकट से पूरा बैंकिंग क्षेत्र प्रभावित होता है। सरकार मानती है कि अगर एनबीएफसी ने ऋण देना बंद किया तो इससे रोजगार की वृद्घि और प्रभावित होगी। सरकार चाहती है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक इसमें मदद करें। अगर आरबीआई अपने रुख पर अड़ा रहा तो यह संभव नहीं होगा। दूसरे शब्दों में कहें तो रोजगार वृद्घि की राजनीतिक अनिवार्यता आरबीआई के बैंकों की बैलेंस शीट दुरुस्त करने के एजेंडे के एकदम उलट है।
 
सरकार को पैसा चाहिए। सुधार के मोर्चे पर ढीले रवैये के कारण सरकार विकास को पटरी पर लाने में नाकाम रही है। मोदी सरकार के कार्यकाल में सरकारी खर्च से ही विकास का इंजन चल रहा है। अब यह पैसा खत्म हो रहा है, लिहाजा सरकार की नजर आरबीआई के खजाने पर है। सरकार समर्थक अर्थशास्त्री नोटबंदी के कारण लाखों करोड़ रुपये सरकारी खजाने में आने का दावा कर रहे थे लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जीएसटी से भी अपेक्षा के अनुरूप राजस्व नहीं मिला है। यहां टकराव आरबीआई के अपने भंडार के बारे में फैसला करने के अधिकार और चुनावों से पहले खर्च करने के लिए सरकार की नकदी की जरूरत के बीच है।
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