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मानव विकास पर असर डालती आय समानता

पार्थसारथि शोम /  November 14, 2018

मानव विकास के पैमाने पर भारत की स्थिति में सुधार नजर आ रहा है लेकिन अब भी यह अपने समकक्ष देशों से पीछे है। विश्लेषण कर रहे हैं पार्थसारथि शोम

 
पिछले साल मैंने शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन स्तर जैसे दस मानदंडों को समाहित करने वाले मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) के बारे में लिखा था। अब इस सूचकांक के बारे में नए आंकड़े जारी होने के बाद इस पर पुनर्विचार जरूरी हो जाता है। एक बार फिर मैं आय वितरण संबंधी आंकड़े आने के बाद ही एचडीआई पर लिखने जा रहा हूं क्योंकि स्थिर आय वितरण के संदर्भ में ही भारत के मानव विकास को समझा जा सकता है। वर्ष 2017 के एचडीआई सूचकांक में शामिल 188 देशों में से भारत की रैंकिंग 130 है जबकि 2015 में यह 131वें स्थान पर था। इस तरह भारत की एचडीआई रैंकिंग में बहुत मामूली सुधार हुआ है। भारत का एचडीआई सूचकांक 0.63 से बढ़कर 0.64 हो गया, जन्म के समय जीवन प्रत्याशा 68.3 वर्ष से बढ़कर 68.8 वर्ष हो गई, स्कूली शिक्षा में बिताए जाने वाले औसत वर्ष 6.3 से बढ़कर 6.4 हो गए और प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय उत्पाद (जीएनपी) 5691 से बढ़कर 6363 डॉलर हो गया। 
 
प्रति व्यक्ति जीएनपी में 12 फीसदी की वृद्धि एचडीआई संकेतकों में अहम सुधार दर्शाती है लेकिन आय वृद्धि के ये संकेत मूलत: ऊंचे दशमक पर निर्भर हैं।  दूसरी सारिणी के वर्ष 2012, 2015 और 2017 के आंकड़े भी इस तथ्य का समर्थन करते हैं। 2012-17 के दौरान भारत की एचडीआई रैंकिंग में केवल दो स्थान का सुधार हुआ है लेकिन तुलनात्मक सुधार के मामले में दक्षिण अफ्रीका (6), चीन (7) और ब्राजील (7) उससे आगे हैं। ऐसा लगता है कि 2012-15 के दौरान एचडीआई पैमाने पर भारत की स्थिति 2015-17 की तुलना में बेहतर थी।  अगला स्तंभ एटकिंसन के मानव असमानता गुणांक (सीएचआई) को दर्शाता है जिससे किसी देश में असमानता स्तर के बारे में पता चलता है।
 
सीएचआई से मापी जाने वाली असमानता का एचडीआई में समावेश किया जा सकता है। इस तरह एक समग्र असमानता समायोजित एचडीआई (आईएचडीआई) मिलती है। साफ है कि असमानता जब तक रहेगी वह एचडीआई को खराब करती रहेगी। इसका मतलब है कि आईएचडीआई का स्तर एचडीआई से कम होगा। दोनों की तुलना से यह नुकसान परिलक्षित होता है। एचडीआई और आईएचडीआई के बीच प्रतिशत नुकसान भारत (दक्षिण अफ्रीका को छोड़कर) के लिए सबसे अधिक है। उससे पता चलता है कि अन्य देशों की तुलना में भारत के मानव विकास पर असमानता का निराशाजनक असर जारी है। 
 
संयुक्त राष्ट्र की बहुआयामी गरीबी (एमडीपी) अवधारणा के हिसाब से देशों के बीच तुलनात्मक गरीबी अधिक स्पष्टता से नजर आती है। इस अवधारणा में वंचना के स्तर को भी ऊपर वर्णित मानदंडों में जोड़ा जाता है। मसलन, अगर किसी परिवार के 10 साल या उससे अधिक उम्र के किसी भी सदस्य ने पांच वर्षों की स्कूली शिक्षा पूरी न की हो तो उस परिवार को स्कूली शिक्षा से वंचित माना जाएगा। यूनेस्को की वर्ष 2017-18 रिपोर्ट में अकायर और कणगरत्नम ने कहा है कि स्कूल में उपस्थिति, बाल मृत्यु दर, पोषण, स्वच्छता, बिजली, पेयजल, फर्श वाला मकान, खाना पकाने का ईंधन और संपत्ति स्वामित्व के बिंदु वंचना स्तर को निर्धारित करते हैं। अगर कुल आबादी की 33 फीसदी संख्या वंचित है तो उसे बहुआयामी गरीबी कहते हैं जबकि 50 फीसदी आबादी के गरीब होने पर उसे गंभीर एमडीपी कहते हैं।
 
तीसरी सारिणी से पता चलता है कि भारत की 27.5 फीसदी आबादी एमडीपी के दायरे में है जबकि 8.6 फीसदी आबादी गंभीर एमडीपी की श्रेणी में है। ब्राजील, चीन और दक्षिण अफ्रीका में ये आंकड़े काफी कम हैं। हालांकि भारत ने पिछले दो दशकों में गरीबी और अतिशय गरीबी को कम करने में बड़ी कामयाबी हासिल की है लेकिन संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य 2030 के तहत किसी को भी अतिशय गरीब की श्रेणी में नहीं छोडऩे का मकसद हासिल करने के लिए भारत को तेजी दिखानी होगी।
 
बीबीसी ने आधुनिक समय की गुलामी पर अक्टूबर में प्रसारित अपनी सीरीज में भारत पर एक घंटे की कवरेज की थी। उसमें दिखाया गया था कि भारत के हजारों छोटे बच्चों-बच्चियों को उनके मां-बाप से दूर देश के दूसरे हिस्सों में ले जाया जाता है। उनके मां-बाप यह कहते नजर आए कि उनके पास अपने बच्चों की तलाश के लिए जरूरी पैसे नहीं हैं। जहां पर बच्चे अपने मां-बाप के साथ रहते हैं वहां पर भी हालात खतरनाक हैं। अपनी तीन साल की बेटी को अभ्रक जमा करने के लिए खदान में भेजने वाली एक मां कहती है कि उसके परिवार को कर्ज की भरपाई के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है। 
 
इस बायोस्कोप को पूरी दुनिया ने देखा था। पिछले महीने इस समाचारपत्र के अंग्रेजी संस्करण में संपादक के नाम प्रकाशित एक पत्र में भारत की बढ़ती आय असमानता को लेकर गहरी चिंता जताई गई थी। उसमें कहा गया था, 'आखिर आय समानता लाने में और कितने दशक लगेंगे? यह पीपीपी के मामले में भारत के दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने या भारत के दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था होने जैसे सवालों से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है।'
Keyword: human, salary,,
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