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लड़ाकू विमानों के लिए सरकार के स्तर पर खरीद का मॉडल बेहतर

दोधारी तलवार
अजय शुक्ला /  November 12, 2018

राफेल लड़ाकू विमान को लेकर मचे विवाद ने एक बड़ी चिंता को जन्म दे दिया है। क्या राफेल को लेकर लग रहे राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप, कानूनी कार्रवाई, अंकेक्षण और जांच आदि रक्षा मंत्रालय की पहले से शिथिल निर्णय प्रक्रिया को और अधिक प्रभावित करेंगे  और लड़ाकू विमानों की खरीद प्रक्रिया में पूरी तरह ठहराव आ जाएगा? वायुसेना जो पहले ही 42 के बजाय 31 लड़ाकू विमान बेड़ों से काम चला रही है, स्वदेशी तेजस मार्क 1 के आगमन तक कहीं उसके बेड़े 20 के दायरे में तो नहीं आ जाएंगे? जिस तरह बोफोर्स मामले में भ्रष्टाचार के आरोपों ने तोपों की जरूरी रक्षा खरीद को स्थगित कर दिया था, ठीक वैसा ही अब लड़ाकू विमानों की खरीद के साथ हो सकता है। वायुसेना को अब तक मिग-21 और मिग-27 के आठ बेड़ों को सेवा से हटा देना चाहिए था। उनकी जगह हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड सुखोई-30एमकेआई के दो अंतिम बेड़े और तेजस मार्क 1 के दो बेड़े तैयार कर रहा है।

 
राफेल के दो बेड़े 2022 के मध्य तक शामिल करने ही होंगे। इस प्रकार आठ सेवानिवृत्त हो रहे बेड़ों के समक्ष छह ही नए बेड़े आएंगे और वायुसेना की कुल क्षमता 29 बेड़ों की रह जाएगी। इनमें भी तीन मिराज 2000 बेड़े अपने 18 विमानों की तुलना में कम ही विमान संचालित करते हैं। यानी वायुसेना के लड़ाकू विमान बेड़ों में 13 बेड़ों का अंतर है। अगर देश की रक्षा के लिए न्यूनतम 42 बेड़ों की जरूरत है तो वायुसेना चीन और पाकिस्तान के साथ दो मोर्चों की लड़ाई में बुरी तरह पिछड़ जाएगी। कुछ लोगों का कहना है कि भारत को अब 42 बेड़ों की जरूरत नहीं है क्योंकि समकालीन लड़ाकू विमान कहीं अधिक हथियार ले जा सकते हैं और ज्यादा सक्षम हैं। हवा में ईंधन भरने, हवाई चेतावनी और नियंत्रण जैसी व्यवस्थाओं ने उनकी क्षमता और बढ़ा दी है। पिछले रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने संकेत दिया था कि वायुसेना कुछ कम बेड़ों के साथ भी काम कर सकती है। उन्होंने जनवरी 2015 में इंडिया टुडे टीवी से कहा था कि अगर 35 लड़ाकू बेड़ों को समुचित आकार दिया जाए तो हमारे पास समय होगा अपनी ताकत बढ़ाने का। 13 अप्रैल 2015 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब पेरिस में घोषणा की कि उन्होंने फ्रांसीसी राष्ट्रपति से 36 राफेल लड़ाकू विमान भारत को बेचने की बात कही है तो पर्रिकर ने दूरदर्शन पर कहा था कि 42 बेड़े स्वीकृत हैं। हमारे पास कम से कम 37-38 अति सक्रिय बेड़े होने चाहिए। 
 
इसके बावजूद वर्ष 2022 के बाद लड़ाकू विमानों की जरूरत और उपलब्धता में 8 से 9 बेड़ों का अंतर रहेगा। इस कमी की भरपाई के लिए सरकार ने अप्रैल में 110 नए लड़ाकू विमान या छह नए बेड़ों की खरीद प्रक्रिया शुरू की थी। अगर इन अनुबंधों को अप्रत्याशित तेजी के साथ भी आगे बढ़ाया गया तो लड़ाकू विमानों का अंतर बरकरार रहेगा। इसकी वजह यह है कि प्रस्तावित 110 लड़ाकू विमानों में से पहले बेड़े की डिलिवरी पांच साल बाद यानी 2024 के अंत में होगी। अगले पांच बेड़ों का विनिर्माण भारत में होगा। ये अनुबंध पर हस्ताक्षर होने के 5 से 12 साल बाद यानी वर्ष 2024 से 2032 के बीच मिल पाएंगे। इसमें भी यह माना गया है कि अनुबंध पर 2019 के अंत तक हस्ताक्षर हो जाएं। 
 
प्रस्तावित तेजस मार्क 1ए के भी जल्द सेवा में शामिल नहीं होने की संभावना है ताकि लड़ाकू विमानों के अंतर की खाई को पाटा जा सके। रक्षा मंत्रालय ने वर्ष 2020-21 से 83 तेजस मार्क 1ए यानी लड़ाकू विमानों के 4 बेड़ों का विनिर्माण शुरू करने के लिए दिसंबर, 2017 में 33,000 करोड़ रुपये मंजूर किए थे। एचएएल हर साल 16 लड़ाकू विमानों या करीब एक बेड़े का उत्पादन कर रही है। लेकिन भारतीय वायु सेना की बढ़ती मांगों के चलते तेजस मार्क 1ए में पहले ही देरी हो रही है। प्रारंभ में वर्तमान तेजस मार्क 1 की क्षमता में चार बढ़ोतरी की जानी थी। इनमें ऐक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे रडार, एक इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर स्वीट, एक सेल्फ-प्रोटेक्शन जैमर, हवा में ईंधन भरने की क्षमता और आसान मरम्मत एवं रखरखाव शामिल हैं। इस साल भारतीय वायु सेना ने 'स्मार्ट मल्टी-फंक्शन डिस्पले', मित्र और दुश्मन विमान में विभेद के लिए एक 'कंबाइंड इंटेरोगेटर ऐंड ट्रांसपोंडर', एक डिजिटल मैप जेनरेटर और एक परिष्कृत रेडियो एल्टीमीटर जैसी खूबियों की अतिरिक्त मांग की। इन सिस्टम को तेजस मार्क 1ए में शामिल करने के लिए उसके मिशन कंप्यूटर की डिजाइन में बड़ा बदलाव करना होगा, जिसका मतलब है कि इनके विनिर्माण में तीन-चार साल की देरी  होगी। 
 
ऐसी अकुशल योजना की वजह यह है कि सेना और रक्षा मंत्रालय सैन्य उपकरणों की सेवानिवृत्ति का अनुमान लगाने में अक्षम हैं। वे इन कमियों को पूरा करने के लिए जरूरी उपकरणों की पहचान करने, मूल्यांकन करने, बजट और उनकी खरीद में अक्षम हैं। जिस तरह 126 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद नाकाम रही, उसी तर्ज पर 110 लड़ाकू विमानों की खरीद की मुहिम शुरू करने के बजाय हमारे खरीद रिकॉर्ड की पड़ताल करने की जरूरत है। अब तक भारत केवल खरीद की तीन श्रेणियों में सफल रहा है। पहली, बैलिस्टिक मिसाइल जैसे रणनीतिक हथियार सिस्टम का पूरी तरह घरेलू स्तर पर विकास है। दूसरे सफल खरीद मॉडल के तहत डीआरडीओ विदेशी तकनीक साझेदारों और भारत के निजी क्षेत्र के साथ मिलकर काम कर रहा है। ऐसे सफल उदाहरण भारत-रूस की साझेदारी में बनी ब्रह्मोस आदि हैं। तीसरा सफल खरीद मॉडल में सरकारों के स्तर पर होने वाले सौदे हैं। इनके उदाहरण टी90एस टैंक, सी-17 ग्लोबमास्टर 3 एयरक्राफ्ट आदि हैं। पहला मॉडल अप्रासंगिक है, जबकि दूसरा मॉडल तेजस मार्क 1ए में अपनाया जा चुका है। ऐसे में 110 लड़ाकू विमानों की जल्द खरीद के लिए सबसे बेहतर मॉडल सरकारों के स्तर पर सौदा है। सरकार को अपने स्तर पर फैसला लेने के बजाय सेना के साथ व्यापक विचार-विमर्श करने की जरूरत है। सरकार का अपने स्तर पर ही फैसला लेना उसके लिए राफेल खरीद में नुकसानदेह साबित हुआ है। 
Keyword: rafale, court, congress, BJP,,
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